Sunday , 18 October 2026
काव्य कोना

ग़ज़ल

हक

मुझे सिर्फ मेरा हक चाहिए,
इश्क-विश्क तुम रख सकते हो।
राहें इतनी भी कांटे भरी नहीं मेरी,
तुम चाहो तो साथ भी चल सकते हो।
तू मिल जाती जिंदगी में तो कोई गम नहीं होता,
मेरे आंखों का समुंदर कभी नम नहीं होता,
दिखा देते हम तुझे अपने चाहने की तलब,
तो सूरज का निकलना तुझे मालूम नहीं होता ।।

तलब

वह जो हंसता रहता था एक लड़का,
आंसुओं से रो लिया क्या? जिसकी मिसाल दिया करता था मैं,
वह भी बेवफा हो लिया क्या? खूबसूरत था वह, एक दिन सब होना था यह लाजमी,
मुझे फिर वही पूछना है वह बेवफा हो लिया क्या ?
सुना है चांद कीमत पर बिका है, मेरे साथ तो मंहगा था
मुझे यह पूछना है, इतना सस्ता हो लिया क्या?
कभी देखे बिना चैन नहीं आता था उसको,
आज मुझे देखकर मुंह फेर लिया क्या ?
मुझको फिर वही सब पूछना है, वह बेवफा हो लिया क्या?

जी करता है तुमसे मिलने आऊं, आईना तुझे अपनी आंखों में दिखाऊं।
तुम यूं ही झुठलाती रहो बातों को,
बातें तुम्हें अपनी सब मन की बताऊं।
तेरी हां में भी मैं झूमू, नाचू, गाऊं,
या तेरी ना में बैठकर शोक मनाऊं!
जी करता है तुमसे मिलने आऊं या बदल जाऊं!
या मैं भी खेलना सीख जाऊं!
यूं ही बातें करता रहूं या इन पर भी विराम लगाऊं!
धड़कन बनकर धड़कन चाहता हूं तेरे दिल में,
बता क्या तुझे सिर्फ यूं ही गले लगाऊं!
जी करता है तुझसे मिलने आऊं ।।

कुणाल शर्मा
भारद्वाज कॉलोनी, अनूपशहर बुलंदशहर उत्तर प्रदेश
संपर्क- 95282-510 35

1 Comment

  • अच्छा है भाई ।
    पढ़ते रहो सीखते रहो लिखते रहो।

    भविष्य के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं।

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