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स्वत:स्फूर्त या सत्ता समर्थित!

आलोक जयहिंद

 

प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक निकोलो मैकियावेली ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘डिसकोर्सेज आन लिवी’ में राजनीतिक व्यवहार के लिए हाथी के प्रतीक का इस्तेमाल किया है। उनकी राय में जिस तरह हाथी के खाने के दांत और तथा दिखाने के दांत कुछ और होते हैं उसी तरह राजनीति में पर्दे पर जो कुछ दिखता है पर्दे के पीछे के कार्य व्यवहार में कुछ अलग हो रहा होता है।
जुम्मे जुम्मे दो हफ्ते पहले आभासी मंच पर जन्मी कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक ने अपनी पार्टी को आभासी दुनिया से बाहर निकाल कर हाड़ मांस की पार्टी बनाने का दावा करते हुए अमेरिका से भारत के लिए उड़ान भरी है। वीडियो संदेश और उनकी पार्टी के प्रवक्ताओं के मुताबिक वे एयरपोर्ट से सीधे संसद मार्ग थाने पहुंचकर जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन की अनुमति चाहेंगे। लेकिन पल-पल बदलती उनकी कार्य योजना से लोगों के मन में कई तरह के शक भी पैदा हो रहे हैं। राजद के सांसद को गुमराह कर बीपी हाउस में प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर लेने के बाद से ही तरह-तरह के अफवाहों का बाजार भी गरम है। कॉकरोच पार्टी के इस मूव के पीछे सत्ताधारी दल भाजपा और उनके अन्य संगठनों का हाथ होने की भी आशंका व्यक्त की जा रही है। आंदोलन में सोनम वांगचुक के शामिल होने की घोषणा के बाद इस तरह की कयासों को और अधिक बल मिला है।
सत्ता पक्ष के लोग अपनी सधी हुई टिप्पणी में लोकतांत्रिक आंदोलन के प्रति आस्था जाता रहे हैं वही विपक्षी दलों के नेता पूछने पर व्यंग्यात्मक लहजे में कह रहे हैं कि अन्ना हजारे के बाद आंदोलन के लिए खोजे गए नए गांधी यानी वांगचुक साहब का भी करिश्मा देखने के लिए देश तैयार है।
कॉकरोच दल के आंदोलन को लेकर आम लोगों में भी कौतूहल है। बार-बार स्टैंड बदलने के कारण असमंजस भी है। पार्टी प्रवक्ताओं ने पहले कॉकरोचों को हवाई अड्डे पर एकत्रित होने का ऐलान किया था लेकिन अभी इसे मुल्तवी कर दिया गया है। पार्टी प्रमुख ने वीडियो जारी कर कहा है कि जनता को होने वाली असुविधा को ध्यान में रखते हुए कार्यकर्ताओं को एयरपोर्ट नहीं पहुंचने की सलाह दी गई है। इसके आगे के बारे में कोई स्पष्ट रूप रेखा अभी सामने नहीं आई है। पार्टी प्रमुख पहले ही आशंका जता चुके हैं कि एयरपोर्ट पर उतरते ही सरकार उन्हें गिरफ्तार कर सकती है? अगर सरकार उन्हें गिरफ्तार नहीं करती तो क्या वह वहां से अकेले प्रदर्शन की अनुमति के लिए संसद मार्ग थाने आएंगे? क्या उनकी पार्टी के कार्यकर्ता बिना किसी घोषणा योजना के ही संसद मार्ग या जंतर मंतर पहुंचेंगे? और सबसे बड़ा सवाल कि उनके पार्टी प्रवक्ताओं ने उनके आने से पहले ही संसद मार्ग थाने में जाकर अनुमति की अर्जी क्यों नहीं दी? आंदोलन के लिए अफरा तफरी में बिना किसी पूर्व तैयारी के 6 जून की तारीख का ही ऐलान क्यों किया गया? इस तरह के अनेक अनुत्तरित सवाल हैं जो शक पैदा कर रहे हैं।‌ इस प्रस्तावित आंदोलन को लेकर संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी सुनील अंबेकर की शुभकामनाओं के अलग निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं। कुछ लोग खुलकर सत्ता समर्थित आंदोलन की संज्ञा दे रहे हैं।
मालूम हो कि पहले उड़ीसा फिर बिहार और अब हाल ही में बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड जीत के बाद विपक्षी दलों का सिराजा पूरी तरह से बिखर सा गया है। लगातार हार के कारण प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस का मनोबल तो गिरा ही है क्षेत्रीय दलों के सामने अस्तित्व बनाए रखने का संकट खड़ा हो गया है। सारे दलों की नजर एक बार फिर इंडिया गठबंधन को पुनर्जीवित करने पर लगी हुई है। बीते 29 मई को इंडिया गठबंधन के नेताओं ने घोषणा की थी कि 8 जून को दिल्ली में बैठक आयोजित होगी जिसमें गठबंधन के सभी दल विचार विमर्श कर आगे की रणनीति तय करेंगे। इस बीच नीट परीक्षा के पेपर आउट होने तथा सीबीएसई परीक्षा की धांधली को लेकर युवाओं में देशव्यापी आक्रोश बढ़ा है। देश के कई हिस्सों में इसके खिलाफ नौजवान उठ खड़े हुए हैं। विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है। एनएसयूआई के कार्यकर्ता सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं तथा जगह-जगह लाठी भी खा रहे हैं।
दूसरी तरफ ईरान युद्ध के कारण महंगाई और बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है। डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। रिजर्व बैंक द्वारा सोना बेचने और राजेश एक्सपोर्ट के मार्फत 15 लाख करोड़ से ऊपर के घोटाले का मामला सुर्खियों में है। विपक्षी नेता सभी मामलों पर मुखर हैं तथा सरकार को घेरने के लिए लामबंदी कर रहे हैं।
जानकार लोगों का कहना है कि इन सब से ध्यान हटाने के लिए सरकार के इशारे पर नित नए मुद्दे उछाले जा रहे हैं। कुछ लोग कॉकरोच पार्टी के आंदोलन को भी ध्यान भटकाने के रूप में ही देख रहे हैं। चूंकि पार्टी की ओर से कोई राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक दृष्टिकोण अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। पार्टी ने अभी यह भी नहीं बताया है कि लोकतंत्र पर उसकी राय क्या है, महिला किसान, कामगार, छात्र, नौजवान, मेहनतकश मजदूर को लेकर क्या योजना है, रोटी कपड़ा मकान पढ़ाई और दवाई जैसी बुनियादी जरूरतों के सवाल का हल क्या होगा? महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, परिवारवाद आदि से निपटने की नीति क्या होगी? इस तरह के अनेक बड़े सवालों को छुए बगैर अचानक सीधे आंदोलन में कूदने की घोषणा आसानी से लोगों के गले नहीं उतर रही है।
ज्ञात हो की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जरिए परम वैभव के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सदैव तत्पर एक विशुद्ध भारतीय संगठन आरएसएस का आंदोलनों से बहुत नजदीक का संबंध रहा है। सन 74 में गुजरात और बिहार हुए मूल्य वृद्धि के खिलाफ नौजवानों के गुस्से को लोकनायक जयप्रकाश के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति आंदोलन में तब्दील करने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वर्ष 1989 में बोफोर्स घूसकांड के खिलाफ बीपी सिंह द्वारा चलाए गए आंदोलन को भी संघ का साथ मिला था। विश्व हिंदू परिषद के राम मंदिर आंदोलन में भी बढ़ चढ़कर भागीदारी थी। वर्ष 2012 में कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन में भी‌ प्रमुख सहयोगी के तौर पर लोगों द्वारा चिन्हित किया गया। कुछ लोग अटकलें लगा रहे हैं कि कॉकरोच आंदोलन खड़ा करने के पीछे भी दम और दिमाग दोनों सत्ता समर्थित संगठनों का ही है।
हालांकि यह सब अटकलें हैं। विपक्षी दलों के आरोप-प्रत्यारोप है। कॉकरोच दल के अगुआ अमेरिका से भारत आने वाली सीधी उड़ान में सवार हो चुके हैं। चढ़ते दिन के साथ दूध का दूध पानी का पानी सब स्पष्ट हो जाएगा। कॉकरोच पार्टी के नेता अभिजीत तथा आंदोलन में शामिल होने की घोषणा कर चुके सोनम वांगचुक ने लोकतांत्रिक ढंग से प्रदर्शन का आह्वान किया है। नौजवानों से धैर्य बनाए रखने की अपील की गई है। वांगचुक ने तो कार्यकर्ताओं को यह भी संदेश दिया है कि अगर कोई उन पर जुल्म या दमन भी होता है तो उसे कार्यकर्ता बर्दाश्त करें और दमन करने वाले को फूल भेंट करें। विरोध-प्रतिरोध में यकीन रखने वाले लोगों के लिए आज का दिन खास हो सकता है। दिलचस्प यह भी होगा कि वांगचुक की गांधीगिरी क्या रंग दिखाती है? राजनीतिक लोग यह भी जानना चाहते हैं किआभासी मंच पर दर्ज सवा दो करोड़ में से कितने काकरोच आज अपने हक और हुकूक के लिए जमीन पर उतरते हैं? और सबसे बड़ी बात की सरकार का रवैया कैसा रहने वाला है? हालांकि सरकार में बैठे उच्च पदस्थ पदाधिकारी और जानकार सूत्रों की माने तो सरकार फिलहाल आंदोलन का दमन कर अपयश लेने की बजाय आंदोलन को अनुमति देकर यश का वरण करने को तवज्जो देने की रणनीति पर काम कर रही है। कुछ मामलों में असमंजस है लेकिन सरकार इस एक दिन के जलसे में कोई विघ्न बाधा खड़ा करने की बजाय अपने हिसाब से निपटाने के लिए मुस्तैद है।

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