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मिलजुल कर ही होगा पर्यावरण का संरक्षण

अनिल तिवारी

हर साल 5 जून को समूचा विश्व पर्यावरण दिवस मनाता है और बदलती जलवायु की समस्या से पार पाने के लिए सार्थक और सटीक उपाय करने के लिए नए सिरे से प्रतिबद्धता जाहिर करता है। पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग का सामना कर रही है। तमाम कारण बनाए गए हैं जिन्हें ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। बेशक यह कारण मानव व्यवहार से ज्यादा बावस्ता है, लेकिन हम ऐसा कोई कारगर उपाय नहीं खोज पाए हैं जिससे इस समस्या से उबर सके। वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है और बढ़ोतरी का रुझान बराबर बना हुआ है। जानकारों का कहना है कि एक-दो सेंटीग्रेड भी तापमान बढ़ता है तो गेहूं जैसे खाद्यान्न गायब हो सकते हैं। अन्य खाद्यान्न वनस्पतियां फल सब्जियां अपने वे गुणसूत्र खो सकती हैं जिनसे स्वाद और पौष्टिकता तय होती है। यानी गर्मी के बढ़ने से जीवन के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो सकता है। इस संकट को रोकने के लिए हमें मिलजुल कर खड़ा होना होगा।

 

चार दिन देर से ही सही पर देश में मानसून ने दस्तक दे दी है। अमूमन एक जून को दक्षिण के केरल राज्य मैं पहुंचने वाला मानसून अबकी 4 जून को उपस्थित हुआ है। कल दोपहर बाद से ही दक्षिण के इलाके में झमाझम बरसात चल रही है हालांकि दिल्ली सहित शेष भारत के कुछ इलाकों में अचानक आई आंधी पानी से तापमान में हल्की गिरावट दर्ज हुई है लेकिन कई राज्यों में गर्म हवाओं के तेवर अब भी कड़े और तीखे बने हुए हैं।
गर्मी के मौसम में सूरज की तपिश का यह अंदाज हमारे देश के लिए नया नहीं है लेकिन साल दर साल बढ़ते तापमान और लू तथा गर्म हवाओं के थपेड़े झेलने के लिए मजबूर हुए लोगों का जीवन कठिन हुआ है। मौसम की मार से भारत ही नहीं दुनिया के अधिकांश देश परेशान है।
भारत की बात करें तो इस साल देश में 160 से अधिक बार लू चली जो पिछले साल की तुलना में अधिक है। आमतौर पर गर्मी के मौसम में तापमान की बढ़त धीरे-धीरे होती है लेकिन इस बार शुरुआत में ही पर 40 के पार पहुंच गया। शुरूआती लू का दायरा एक साथ कई राज्यों को चपेट में ले लिया था। महाराष्ट्र के पुणे जैसे शहर में जहां कि अमूमन मार्च अप्रैल से बारिश और अच्छी हवाएं चलने लगती है, मई के आखिरी दिनों तक आग की भट्टी बना रहा। 15 मई को बांदा का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के पास पहुंच गया।
हालांकि मौसम विशेषज्ञ अब तक इस बदलाव में ग्लोबल वार्मिंग की भूमिका का कोई सटीक विवरण नहीं दे पाए हैं, लेकिन आपसी संबंध काफी स्पष्ट हैं। भारत समेत दक्षिण एशिया में प्रचंड गर्मी का यह दौर अब दशकों में एक बार आने वाली घटना नहीं रही, बल्कि साल-दर-साल की नियमित पहचान बनती जा रही है। निश्चित रूप से ग्लोबल वार्मिंग की इसमें प्रमुख भूमिका है, लेकिन यह अकेली वजह भी नहीं है। बढ़ती जनसंख्या और इसके कारण संसाधनों पर बढ़ते दबाव का अपना रोल है। वनों की कटाई और परिवहन को चलाने के लिए ईंधन का बेतरतीब उपयोग स्थिति को और खराब कर रहा है।
गर्मी बढ़ाने में कंक्रीट की बनी सड़कें और इमारतों का भी बड़ा हाथ है जिसके कारण सतह से उठे बिना गर्मी अंदर फंस जाती है, जो हवा को और गर्म करती है। अंतरराष्ट्रीय सांचे में फिट होने की होड़ में आज देश की ज्यादातर इमारतों में आधुनिक शैली के लिए स्थानीय जलवायु और देसी संसाधनों को नजरअंदाज किया जा रहा है। मोटी दीवारों और आंगनों के लिए पारंपरिक मिट्टी के ब्लॉक के उपयोग की तुलना में स्टील और कंक्रीट का उपयोग कर गगनचुंबी इमारतें बनाना वैसे भी तेज और आसान होता है। विभिन्न क्षेत्रों के मौसम के अनुकूल आवास के लिए हजारों वर्षों में विकसित की गई स्थानीय परंपराओं को त्यागने का नतीजा यह हुआ है कि पुणे हो या पटना, बेंगलूरु हो या गुरुग्राम, मैनचेस्टर हो या न्यूयॉर्क, सभी जगह की इमारतें एक जैसी दिखती हैं, और गर्मी से निजात पाने के लिए एसी को ही सर्वमान्य हल मान लिया गया है।
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में यह एकरूपता दरअसल, एक बहुत बड़ी चूक बनती जा रही है। एक अमेरिकी स्टडी के अनुसार दफ्तरों और घरों में धड़ल्ले से चल रहे एसी स्थानीय तापमान को लगभग दो डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ा सकते हैं। यह आने वाले वर्षों में भारत के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018 में केवल 8 फीसद भारतीयों के घरों में एयर कंडीशनर थे।
सरकार के नेशनल कूलिंग प्लान के मुताबिक यह आंकड़ा 2038 तक 40 फीसद तक बढ़ने की उम्मीद है।
इस साल के शुरुआती पांच महीनों में देश ने और भी दूसरी असामान्य स्थितियों का अनुभव किया है। अरब सागर के किनारे बसे होने के बावजूद मुंबई ने भी इस बार असामान्य गर्मी झेली जिसकी बड़ी वजह अरब सागर में अफगानिस्तान और पाकिस्तान से चली धूल भरी आंधी रही। मार्च में भारत के आसपास के महासागरों में दो उष्णकटिबंधीय कम दबाव के क्षेत्र भी बने, जो कि साल की शुरुआत में दुर्लभ हैं।
सवाल केवल गर्मी का ही नहीं है, देश की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण दखल रखने वाले मानसून की चाल भी लगातार टेढ़ी होती गई है। हाल के वर्षों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के रुझानों से पता चला है कि अनिश्चित होती जा रही बारिश का दरअसल, अब सामान्यीकरण हो चुका है। पिछले साल जून में जब पश्चिमी हिमालय अत्यधिक वर्षा से हलकान था, तब मध्य और दक्षिणी भारत के बड़े हिस्से में सूखे के हालात बन रहे थे। अगस्त, 2021 ने तो 1901 के बाद से छठा सबसे सूखा महीना बनकर इतिहास रच दिया। 24 फीसद कम बारिश के साथ मानसून अगस्त में ही एक तरह से ‘गायब’ हो गया और देश को साल 2009 के बाद पहली बार व्यापक सूखे का सामना करना पड़ा। पिछले 130 वर्षों में पहाड़ी राज्यों में बादल फटने की संख्या में भी तेज वृद्धि हुई है। साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर एंड पीपल का विश्लेषण बताता है कि पिछले साल ऐसे कई मौके आए जब उत्तराखंड में जून से सितम्बर के दौरान बादल फटे।
इन बदलावों ने भारत को वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के लिए 5वां सबसे संवेदनशील देश बना दिया है। आज 80 फीसद से ज्यादा भारतीय आबादी अत्यंत जलवायु-संवेदनशील जिलों में रह रही है। 1901-2025 के दौरान भारत का औसत तापमान लगभग 0.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। तापमान में वृद्धि से गंभीर नुकसान के बीच कार्य उत्पादकता में भी कमी आई है, जिसने जीवन और आजीविका दोनों को बुरी तरह प्रभावित किया है।
इसके प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई भी दे रहे हैं। किसानों का कहना है कि तापमान में अप्रत्याशित उछाल ने उनकी गेहूं की फसल को प्रभावित किया है। गर्मी ने बिजली की मांग में भी वृद्धि की है, जिससे कई राज्यों में तो बिजली ही गुल हो गई है, और इस संकट के बीच कोयले की कमी की आशंका भी खड़ी हो गई है। बढ़ते तापमान के कारण आग का जोखिम भी कम नहीं हो पा रहा है। देश की राजधानी दिल्ली सहित अन्य शहरों में आए दिन आग लगने से होने वाली जन धन के हानि की खबरें लगातार बढ़ रही है।
पर्यावरण को संतुलित रख करके ही जीवन को स्वस्थ और समृद्ध बनाया जा सकता है। अधिक से अधिक पेड़ लगाकर आम नागरिक अपना अमूल्य योगदान दे सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए जरूरी है कि सरकार और समाज दोनों मिलजुल कर भावी पीढ़ी को एक अच्छा पर्यावरण देने के लिए मिलजुल कर सकारात्मक पहल करें।

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