डा. जयशंकर
रामायण कालीन श्रेष्ठ चरित्रों में से एक चरित्र हैं उर्मिला जो विदेहराज राजा जनक और सुनयना की छोटी पुत्री और सीता की अनुजा थी। उनको पुराणों में शेषनाग की पत्नी नागलक्ष्मी तथा क्षीरसागरा का अंश बताया गया। उनका जन्म जया एकादशी के दिन मिथिलापति राजा जनक और सुनैना की दूसरी कन्या के रूप में हुआ था।कहा जाता है कि उनको एक ही साथ तीन- तीन रूप- शरीरों में कर्म करने और जीवन जीने का वरदान प्राप्त था। जब सीता स्वयंवर संपन्न हो गया तो महामुनि विश्वामित्र ने वेद-वेदांग के प्रकाण्ड पण्डित, महातपस्वी राजा जनक की हृदयेच्छा को पढते हुए सलाह दिया कि यदि अपनी छोटी पुत्री उर्मिला का विवाह लक्ष्मण से संपन्न करा देंगे तो सोने में सुहागा साबित होगा। राजा जनक ऋषिवर की सलाह को सिर माथे पर लगाते हुए प्रसन्नता के साथ तत्काल संपन्न कराने का आदेश दे दिया। “सीतहि चितइ कही मृदु बाता, अहह कुमार मोर लघु भ्राता। गई लछिमन रिपु भगिनी जानी, प्रभु विलोकि बोले मृदु बानी।।, जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानिकै। सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल विधि सनमानिकै।।” उर्मिला अत्यंत रूपवती, लावण्यवती, कुशाग्, प्रज्ञावती और दृढचरित्र संपन्ना थी। उन्होंने आजीवन अपने पति महावीर, महाधनुर्धर, आज्ञापालक लक्ष्मण के जीवन मार्ग को निष्कंटक बनाने में अपने सुख-चैन, गृहस्थ जीवन आदि को मौनभाव से समर्पित कर दिया। वे अपने अतुलनीय त्याग, कर्त्तव्य, निःस्वार्थ सेवा और समर्पण के लिए सुप्रसिद्ध हैं।
जब कैकेयी के वरदान के कारण चक्रवर्ती राजा दशरथ ने राम के लिए चौदह वर्ष के वनवास की घोषणा की तो केवल राजभवन में ही नहीं अपितु संपूर्ण अयोध्या में शोक की लहर दौड़ गई, सरयू माँ प्रवाहित होना छोड़कर ठिठक गई, सभी गुल्म लताएं मुरझा गई, हरे भरे छतनार वृक्ष सूखने लगे, घुडसाल में बधे अश्वों ने चारा खाना बंद कर दिया, हाथियां चिघाडना छोडकर अश्रुपात करने लगीं। यही नही गायों के बछड़े दूध नही पी रहे थे, गायों के दूध स्वतः घटने लगे। मृग छौनों के साथ- साथ अन्य जितने पाल्य जीव-जन्तु थे सबके सब मुंह गिराये दुबके पडे थे। कैकेयी के कक्ष को छोड़कर संपूर्ण महल में सन्नाटा पसरा हुआ था। राम और सीता के साथ साथ राम आत्मा प्रिय लक्ष्मण भी वल्कल वस्त्र धारणकर जाने की तैयारी में व्यस्त थे। अपने पति को देखकर कुछ ही दिनों पहले महल में ब्याह कर आयी राजा दशरथ की सेवा भाव से संपन्न बहू उर्मिला भी अपने सुहाग का साथ देने और ज्येष्ठ जी और ज्येष्ठानी जी अर्थात धीर- गंभीर,बडी बहन सीता की वन में सेवा शुश्रूषा करने के लिए वनगमन हेतु वल्कल वस्त्र धारण कर तैयार होने लगी। अपने कक्ष से जैसे ही दर्पण के माध्यम से लक्ष्मण ने देखा, तुरंत उर्मिला के कक्ष में जाकर उनके चिबुक को सहलाते हुए निवेदन करने लगे, प्रिये तुम यह क्या कर रही हो, तुम्हारी वहां जरूरत नही है,वन में भ्राता श्री और भाभी श्री के आगे तुम्हारा ध्यान नहीं रख पाऊंगा। मेरी सौगंध, जाने की जिद्द मत करों, यहीं रहकर सभी माताओं एवं पिताजी की इसतरह से सेवा शुश्रूषा करना जिससे उनलोगों का रंचमात्र भी हमलोगों का अभाव महसूस न हो, कभी यदि ये कुलदीपक भईया राम और दीपशिखा भाभी मां सीता के वियोग से व्याकुल और दुखी दिखे तो इस तरह से आचरण करना जिससे वे सर्वदा इस बार्धक्य अवस्था में प्रसन्न रहें। जैसे जैसे लक्ष्मण समझा रहे थे वैसे ही वैसे चौदह वर्ष के दीर्घ एकाकी, नीरस और बिना सुहाग के तडपन भरे जीवन की कल्पना से उसके आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा और मूर्छित होकर उनकी बाहों में नि:चेष्ट लुढक गई।शीतल जल के छीटों से चेतना आते ही वह विलाप, करूण क्रंदन,रूदन करते-करते मर जाने की बात कहने लगी और आंसुओं को समेटते हुए वनवास से आने तक रोते रोते प्राण त्याग देने की बात कहने लगी। यह सुनते ही लक्ष्मण भी अपने को रोक नहीं पाए तथा उर्मिला के कंपित कंधे पर मुंह रखकर फफककर रो पड़े और कहने लगे, उर्मिले मैं तुम्हारा हूँ तुम मेरी श्वांस हो, प्राण हो,तुम्हारे बिना एक क्षण भी जीवन की कल्पना नहीं कर सकता। यदि तुम इसी तरह का आचरण करोगी तो जिस महत् उद्देश्य के लिए भईया भाभी के साथ वन में जा रहा हूँ उसको तुम्हारे सहयोग,आत्मबल के बिना पूर्ण नही कर पाऊँगा। इसी तरह से तुम करूण क्रंदन करती रहोगी तो टूट जाऊँगा,क्या चाहती हो कि हमदोनों का नाम इतिहास में स्वार्थी युगल के रूप में कुख्यात हो। परिवारिक ताने-बाने एवं परंपराओं के कारण यह युगल वैवाहिक जीवन का इस समय तक एक क्षण भी आनंद नहीं अनुभव कर पाया था। सासु-ससुर, भईया-भाभी की सेवा-शुश्रूषा,अवधेश राजपरिवार की रीतियों-नीतियों को समझने में, शीर्ष से सेवकों के अन्तरतम में स्थान बनाने, एक-एक कोने की अहमियत जानने में ही व्यतीत हो गया। स्वामी अभी तो हम एक -दूसरे के अन्त:स्थल को, मानसिकता को जीने के रंग- ढंग को भी नहीं जान पाये, एक दूसरे के भौतिक शरीर को भी स्वतंत्रता पूर्वक नहीं देख पाये, तब तक यह एक नही दो महीने का नही चौदह वर्ष के अन्तहीन पहाड़ जैसे समय के विकट विछोह को कैसे सहन कर पाऊंगी, दीदी रहती तब भी हम दोनों मिलकर इस असह्य वेदना को सहन कर लेती, इस मरघट जैसे मातम से आपूरित अंधकारमय सन्नाटे में बिलखते हुए महल में कैसे रह पाऊँगी?, वे भी तो भईया राम के साथ जा रहीं हैं, उनको तो उन्होंने मना नही किया, फिर आप क्यों मुझे साथ न ले जाने की जिद्द पर अडे हुए हैं। वहां आप भईया की सेवा करिएगा, मै भाभी की, विश्वास मानिए, आपकी ही अर्धांगिनी हूँ। सदैव आपके कर्तव्य निर्वहन में बाधक नही अपितु सहायक बनूंगी। लक्ष्मण उसके सधे हुए तर्कसंगत बातों के सामने निरूत्तर अश्रुओं की आंधी में बहने लगे। तभी उन्हें नियत का विलेख याद आ गया और त्वरित गति से अपने को संभालते हुए बोले, उर्मिले, प्राणेश्वरी! मेरी बल बुद्धि विवेक सर्वस्व तुम्हीं हो,जो कुछ भी दृश्य अदृश्य मैं हूँ उसकी अन्त:शक्ति तुम्हीं हो, तुम्हारे बिना मैं शून्य हूँ। एक और सौगंध मेरे वनगमन पर और जब तक अयोध्या वापस न आ जाऊं तब तक रोना तो दूर तेरी आंखों से अश्रु अमृत की एक भी बूंद बाहर छलकनी नही चाहिए। यह समझ लेना कि तुम्हारे अश्रु की एक बूंद मेरे रक्त की बूंद है। जितने तुम्हारे अश्रुमोती बाहर छिटकेंगे, उतना ही रक्त मेरे शरीर से कम होगा। परमेश्वर की यह बात सुनते ही उर्मिला के शिख से नख तक की शिराओं में एक अगम्य सनसनाहट दौड़ गई। वह विगत क्षणों के सारे आलाप विलाप वेदना को विस्मृत कर अखंड पतिव्रता, वीरस्विनी क्षत्राणी, अदम्य साहस से परिपूर्ण कुलभूषण कुलरक्षिका की भांति बाहर खडी दासी को आरती दीप के साथ केसर- चन्दन, अक्षत- पुष्प से सजाकर पूजा थाली के साथ शक्कर युक्त शुभ गौ दही लघु पात्र में, को लाने का संकेत किया। शुभ गमन आगमन का टीका लगाकर, दही शर्करा का पान कराकर लक्ष्मण को एक क्षण के लिए विद्युत की स्फूर्ति से आलिंगन में बांधकर गले लगते हुए सहत्र शुभकानामओं के साथ मुस्काराते हुए विदा किया। राम सीता आगे आगे और लक्षम्ण शस्त्र-सज्जित होकर बार बार पीछे मुडकर उर्मिला को अतृप्त नेत्रों से देखते हुए अनुगमन करते त्रिमूर्ति आंखों से ओझल हो गए। उन लोगो जाने के तुरंत बाद उर्मिला सबसे पहले शोकाकुल पलंग पर औधें मुंह पडे माता कौशल्या और अयोध्या नरेश महाराज दशरथ के कक्ष में जाकर दोनों को ढ़ाढस बंधाते हुए जलपान कराने का दासी को इशारा करते हुए कैकेयी मां के कक्ष में गई जहां ज्येष्ठ आया मंथरा सायं- सायं की आवाज में उनको कुछ समझा रही थी, लेकिन वहां से हालचाल पूछते हुए तीव्र गति से व्याकुल मां सुमित्रा के कक्ष में जाकर उनको धैर्य बधाते हुए सब ठीक हो जाएगा, और जलपान भिजवाने की बात कहकर अपने कक्ष में जाकर बिखरे हुए सामानों को सुव्यवस्थित करने में जुट गई। श्वसुर जी, तीनों सासु माताओं की सेवा के साथ घरेलू कार्यों की देखभाल करते हुए आवश्यकता अनुसार राज-काज के कार्यो में भी कौशल का परिचय देती थी। जहां कहीं राजकार्य संबंधी कोई गूढ विषय उलझता था जिसमें महामंत्री, मंत्री आदि किसी की बुद्धिमत्ता काम नही आती थी वे विषय पहले चक्रवर्ती राजा दशरथ और बाद में भरत भईया के आदेशानुसार उर्मिला के समक्ष लाए जाते थे। राज्य की गरिमा को ध्यान में रखते हुए प्रजा के हित को प्राथमिकता देते हुए तटस्थ भाव से सुलझा देती थी। इन सबके उपरांत जो समय शेष रहता उसको पाल्य पशु पक्षियों, शशक बृंद और मृगछौनों के साथ क्रीडा करने में, उनकी देखभाल करने में व्यतीत करती थी। कोई-कोई प्यारे, दुलारे पशु-पक्षियों के शिशु उर्मिला से इतने हिल मिल गए थे कि जबतक वह स्वयं अपने हाथों से इन्हें दाना-पानी, चारा नहीं खिलाती- पिलाती थी तबतक वे सुंघते भी नहीं थे। चुपचाप मौन- कातर भाव से निहारते हुए उन्हीं की बाट खोजते रहते थे। उर्मिला भी इनसे बहुत घुल मिल गई थी। जिस दिन अति व्यस्तता के कारण वह इनके साथ खेल कूद, भागदौड़ कुलांचे नहीं भर पाती थी उस दिन न भोजन स्वादिष्ट लगता था न ही अच्छे ढंग निद्रा देवी का आशीर्वाद मिलता था। इनकी आदतों और जीवनचर्या का उसे इतना बारीक अनुभव हो गया था कि उर्मिला उनके अशाब्दिक ध्वनियों से ही उनके सटीक मनोभावों को सफलता पूर्वक पढ लेती थी। गौ वत्सों,शशक वृंद, शुक-समूहों और पंडुक, गौरेया काग वृंदों से तो हुबहू उन्हीं की भाषा में उनसे संवाद करने में उसे प्रवीणता हासिल थी। उर्मिला अपनी इस दिनचर्या में इतनी व्यस्त रहतीं थी कि उनके मन में और किसी भाव को प्रवेश करने की रंचमात्र भी गुंजाईश नहीं थी। इधर जब दशरथ की तबीयत दिन पर दिन खराब होने लगी तो उर्मिला माता कौशल्या और सुमित्रा के कहने पर भी एक क्षण के लिए भी उनसे विलग नही होती थी। चौबीसों प्रहर उनकी सेवा शुश्रूषा में लगी रहती थी। लेकिन होनी को कौन टाल सकता था। रात्रि के आखिरी प्रहर में दशरथ की आंख लगने पर दोनों माताएं जब उर्मिला को बलात साथ लेकर यह कहते हुए कक्ष से बाहर निकली कि एकांत पाकर महाराज थोड़ा आराम कर लेगें, जाओ तुम भी पलंग पर अल्पकाल के लिए निश्चिंत भाव से आराम कर लो। लेकिन कक्ष में शकून कहां था, लक्ष्मण के सारे वस्त्र आभूषणों को देखकर उनकी विरह वेदना में डूब गई और बार-बार अंक मे उनको भरकर सिसकने लगी। उसका मन अभी चिल्लाकर रोने को कर ही रहा था तब तक कौशल्या माँ की रूदन की आवाज सुनकर अपने असह्य दुख को झटक कर किसी अनहोनी की आशंका से विद्युत की भांति अपने कक्ष से बाहर निकली और देखते ही सबकुछ समझ गई। माताएँ, बहने मांडवी जी श्रुतिकीर्ति, उपस्थित सेवक गण, सुमन्त जी आदि सभी श्वास रहित पृथ्वी पर औंधे मुंह पडे मृत महाराज को देखकर रो रहे थे, उससे भी रूदन क्रंदन रोका नही जा रहा था लेकिन उनकी सौगंध को यादकर निष्ठुर भाव से भीड़ को चीरती हुई जाकर महाराज को सीधा लिटाकर कुलगुरू वशिष्ठ जी और पिता जनक जी को परिस्थिति से अवगत कराने के साथ निवेदनात्मक भाव से तत्काल आने का संदेश भिजवाई। गुरूदेव के निर्देशानुसार क्रिया करम संपन्न हो जाने और कुछ दिन बीत जाने के बाद पिताजी ने कुछ समय के लिए अनवरत टूट रहे दुखों के पहाड़ से दूर विश्रांति हेतु जनकपुर चलने का आग्रह किया। लेकिन ‘पिताश्री भाग्य में जो कुछ भी लिखा है उसको कौन बदल सकता है, जो भी विकट समय आए, उसका डटकर सामना करना ही श्रेष्ठ धर्म है।’ यही तो आपने भी सीख दी है। तो फिर अपने परिवार को इस दुख की घडी में छोड़कर जाना मेरे लिए उचित होगा? विदेहराज धैर्य और साहस की प्रतिमूर्ति अपनी पुत्री के इस वचन को सुनकर शांत भाव से जनकपुरी के लिए प्रस्थान कर गए।
माता कैकेयी के इस आचरण से जहाँ उनके प्रति भरत क्रोधाग्नि में जल रहे थे वहीं उनको स्वयं से ग्लानि भी हो रही थी। इन सबसे मुक्ति पाने हेतु अपनी स्थिति को स्पष्ट करने और मनाकर भईया भाभी, लखन को किसी तरह अनुनय-विनय करके अयोध्या वापस लाने की योजना में जुट गए। उर्मिला इस योजना की जानकारी पाते ही साथ में चलने की जिद्द पर अड़ गई। भरत रास्ते के कष्टों, राज काज के दैनिक उत्तरदायित्वों को पूरा करने और परिवारिक परंपरा के प्रतिकूल आचरण न करने का हवाला देते हुए इस आश्वासन से कि “मै परिवार के तीनों अहम प्राणवत सदस्यों को लेकर ही शीघ्र ही वापस लेकर आ रहा हूँ,उनके स्वागत की तैयारी करो” कहकर आश्वासन देते हुए उर्मिला को न चलने की बात के लिए मनाकर स्वयं दल के साथ चित्रकूट चल दिए। लेकिन लौटाने में असफलता और उससे ऊपजी ग्लानि और अपराध बोध के साथ अयोध्या आते ही उर्मिला को लक्ष्मण के सानिध्य से वंचित रहने का मूलकारण स्वयं को मानते हुए बडे होने के बावजूद भी भरत उससे निगाह को नीचे कर दोनों करों को जोड़कर याचना भाव से क्षमा मांगने लगे।वह अपने दर्द भरी तड़पन को छुपाकर,’कोई बात नहीं भईया’ कहकर उस दिन एकांत में जाकर दोनों हाथों से मुंह को ढककर खूब रोई थी। पति विछोह से उत्पन्न अपनी वेदना, पीडा, एकाकीपन तड़पन को कभी अपनी दैनिक उत्तरदायिवों के पूर्णता के मार्ग बाधा नही बनने दिया न तो उनसे कभी पलायनवादी स्वभाव अपनाकर सुदूर भागने की कोशिश की। पूरे दिन की वेदना को एकत्रित कर पशु -पक्षियों के बाडे में जाकर उनसे सुख-दुख बांटते हुए संवाद कर सारे दर्द को बाहर निकालकर अपने को हल्काकर उन्हीं से नई ऊर्जा प्राप्त कर प्रतिदिन अपने को तरोताजा कर लेती थी।
एक दिन अर्धरात्रि में भईया राम और भाभी माँ सीता की सुरक्षा में कुटिया के बाहर लक्ष्मण खडे ही थे कि उनकी आंखे निद्रादेवी के दबाव से बन्द होने लगी। इसको देखकर लक्ष्मण बहुत चिन्तित हो उठे और दोनों हाथों से आंखों को मलकर इधर-उधर देखने लगे। सामने खडी स्त्री स्वरूपा माता को प्रणाम कर अपने परम कर्तव्य में बाधा न बनने का निवेदन करने लगे। निद्रा देवी बोली कि ‘पुत्र तुम अपना धर्म निभा रहे हो हम अपना, यदि तुम मुझसे मुक्ति चाहते हो तो तत्काल मुझे स्वयं के जगह पर दूसरा आश्रय दो नहीं, तो मै तो तुम्हारे साथ रहूंगी ही।’ चौदह वर्षों तक निवृत रखने का अनुनय करते हुए लक्ष्मण ने अपनी धीरा- गंभीरा, पतिपरायणा पत्नी उर्मिला को इसके लिए सर्वोचित समझा तथा माता से उन्हीं के पास जाने को कहा। सुबह में निद्रा माता के अति दबाव को देखकर उर्मिला को समझने में देर नही लगी और अपने कर्तव्य पथ में लीन जीवनाधार पति परमेश्वर की आज्ञा को सहर्ष गले लगा लिया। चौदह वर्षों तक जबतक तीनों लोग अयोध्या लौट नही आए तब तक लक्ष्मण के हिस्से की निद्रा को लेकर अनवरत उन्हीं में विलीन रहते हुए सोती रही।। इस समय बडी बहन और भाभीश्री के उस वरदान को यादकर जिसमें उन्होंने एक साथ तीन रूपों में रहने का आशीर्वाद दिया था, बहुत भावविह्वल हो गई और आदरपूरित आत्मा से सोचने लगी कि यदि माँ समान दीदी ने इस शक्ति को नहीं दिया होता तो मै इतने दायित्वों का एक साथ कैसे निर्वहन कर पाती? जब अतुलित बलशाली उद्भट विद्वान ब्राह्मण लेकिन कर्म से विपथ रावण से युद्ध हो ही रहा था कि उसके पुत्र मेघनाद ने गर्जना करते हुए ऐसा अमोघ शक्ति बाण से हमारे पति देवता पर प्रहार किया कि मध्य युद्धभूमि में जल्दी समाप्त न होने वाली शक्ति के प्रभाव से अचेत होकर गिर पडे। इस अवसर पर विष्णु-अवतार, मनुज शरीर धारी बडे भईया भी इस विकट स्थिति को देखकर विचलित हो गए तथा अनुज प्रेम में विह्वल होकर अपने अश्रुओं और करुण विलाप को रोक नहीं पाए। उसी दिन ठीक उसी समय मेरे हाथ से दीपदान फिसलते-फिसलते बच गया था मै आगम अनिष्ट से तो घबरा गई थी लेकिन अटूट विश्वास के कारण बिना बिचलित हुए स्थिति पर तुरंत नियंत्रण कर लिया। इसी बीच संजीवनी बूटी को आकाश मार्ग से लेकर जाते हुए रात्रि के तीसरे/चौथे प्रहर में हनुमान को दुश्मन होने के भ्रम में अचूक बाण से निर्गति कर भूमि पर गिरा दिया। अंजनी सूत के द्वारा भरत भैया से मेरे नाथ के प्राण संकट में होने और सूर्योदय से पूर्व पहुंचने की विवशता को बताकर मुक्त करने का अनुनय विनय करते देख एकांत कक्ष में मंत्रणा के लिए भईया को जाते देख कर अपने को रोक नही पाई तथा अंजनि सुत से बोली ‘मेरे पति राम की गोद में हैं, योगेश्वर की शरण में। यम क्या महाकाल भी मेरे पति का कुछ भी अहित नहीं कर सकते। जहाँ तक सूर्योदय की बात है आप अयोध्या में जितने दिन चाहे विश्राम कर सकते हैं मैं पातिव्रत्य और तप के बल से सूर्य को उदित नही होने दूंगी।’ इतने में शत्रुघ्न भईया भी इस दुर्घटना को सुनकर जब आकुल-व्याकुल होने लगे तो कार्तिकेय जी की माता भवानी से शक्ति प्राप्त कर उनसे भी बोली ‘भईया निश्चिंत रहिए जब तक पृथ्वी सूर्य तथा चन्द्र अटल हैं उनके पति को कोई हानि नही हो सकती।’ अन्तत: हनुमान अयोध्या के सेवा-सत्कार से गदगद होकर भईया भरत के आश्वासन और मार्मिक संदेश को संजोए हुए संजीवनी बूटी लेकर पिता पवन की अद्भुत गति से लक्ष्मण भईया के प्राण बचाने हेतु युद्ध क्षेत्र के निकट ही निर्मित शिविर के लिए प्रस्थान कर गए। सब कुछ ठीक होने के उपरांत भयंकर युद्ध पुनः प्रारंभ हो गया। इसबार भईया और प्रभु राम की सहमति प्राप्त करते ही अपने अचूक बाण से वरदान प्राप्त मेघनाद का धड से पूर्ण रूप से ऐसा शिरोच्छेद कर दिया जो सीधे रावण के समक्ष जाकर गिरा। उसी दिन सायंकाल में युद्ध के रूकने के पश्चात क्रोध से दहन होती हुई, भयंकर विषधारिणी सर्पिणी की भांति फुफकारती हुई, शोक से आकुल-व्याकुल आपा खो चुकी, सुलोचना जब त्रिलोकी राम जो उस समय शत्रु की भूमिका में थे के शिविर में श्वेत वस्त्राच्छादित प्रवेश करते ही इस उम्र में ही विधवा बनाने के लिए धिक्कारना शुरू कर देती है, राम तो उसकी असह्य वेदना का अनुभव करते हुए मूर्तिवत सिर झुकाए खडे थे लेकिन उसकी कर्कश प्रताड़ना से लक्ष्मण का चेहरा क्रोध से तमतमाने लगा, अभी कुछ प्रत्युत्तर में वे कहने ही जा रहे थे कि सुलोचना अपने आंसुओं और अथाह वेदना को संभालते हुए गंभीर स्वर में कहने लगी, ‘हे महारथी तुम इस भुलावे में मत रहना कि मेरे पति का वध तुमने किया है,वरदान के कारण तुम्हारे सामर्थ्य से बहुत ऊंची बात थी, ये तो दो सतियों के अपने अपने भाग्य का परिणाम है। यदि महान तपस्विनी, तुम्हारे पीछे कवच की भांति सदैव खडी,प्रतिपल सात्विक भाव में रहने वाली मौन वीरांगना बहन उर्मिला ने निद्रा देवी को स्वीकार नहीं किया होता तो तीनों लोक मेरे पति के प्रतिपक्ष मे खडा होकर भी उनका बाल बांका नही कर सकता था।’
वनवास की अवधि समाप्त होने पर एक महत उद्देश्य राक्षसों का समूल विनाश कर जब अयोध्या सभी लौटे तो सर्वप्रथम सीता अपने मन मंदिर में प्रिय की प्रतिमा स्थापित कर संपूर्ण भोगों को त्याग कर, योगमय जीवन जीने वाली, विरह व्यथा को जीव जंतुओं के प्रति सहानुभूति में परिवर्तित कर समय को संतुलित भाव से व्यतीत करने वाली उर्मिला को गले लगाकर उसके कक्ष में ले जाकर रोते हुए कहने लगी “बहन कोई समझे न समझे मुझे पता है कि इस वनवास से यदि किसी ने सबसे ज्यादा कष्ट झेला है तो वह तुम हो, हे सखि!तुम्हारे दु:ख का ज्ञान भला लक्ष्मण को क्या होगा? मै एक स्त्री होने के नाते समझ सकती हूँ। चौदह वर्ष मैने चाहे वन में ही गुजारे किन्तु तब भी पति का सानिध्य प्राप्त था। लेकिन तुमने 14 वर्ष अपने पति के विरह में व्यतीत किए हैं। इसलिए तुम्हारा त्याग मेरे त्याग से बहुत बडा है। जितना शीघ्र, बहुत अल्प समय में तुमने संपूर्ण अयोध्या का दिल जीतकर विपरीत परिस्थितियों में भी सब कुछ ठीक कर लिया था, वह तुम्हारे सिवा अन्य के लिए संभव नही था।” लक्ष्मण उर्मिला के त्याग से इतने अभिभूत थे कि कक्ष में पहले से उपस्थित वह उर्मिला के प्रवेश करते ही घुटनों के बल बैठकर युगल हाथों को जोड़कर कहने लगे, ‘मै तो तुम्हारा दास हूँ,’ कुशाग्र, प्रज्ञासंपन्न, विकट से विकट गंभीर परिस्थितियों को हल्का-फुल्का करने में प्रवीण उर्मिला हंसकर बोली, ‘दास किसलिए? मुझे दासी बनाने के लिए? अच्छा तो आप देवता ही रहें और मुझे देवी ही रहने दें।’
उर्मिला और लक्ष्मण को दो पुत्र क्रमशः अंगद, चंद्रकेतु तथा एक पुत्री सोमदा थी। सीता के न रहने पर उनसे किए गए वादे के अनुसार अपनी तीनों संतानों और लव, कुश का पालन पोषण भी उर्मिला ने ही किया था। सभी उत्तरदायित्वों को पूराकर अवस्था बढने पर उर्मिला का भी अधिकांश समय योग- ध्यान, भगवत भजन पूजन में ही व्यतीत होता था। वह अंतिम समय में सरयू जी की गोद में सदा- सदा के लिए समाधिस्थ हो गई…। कुछ शब्दों में कहा जा सकता है कि क्षत्राणी गुणों से संपन्न उर्मिला और लक्ष्मण का पारस्परिक प्रेम एक दूसरे को पूर्णता की ओर अग्रसर करता है। इस युगल का प्रेम शुद्ध, सात्विक और आत्मिक है। उसमें उच्छृंखलता, विलासिता और पार्थिवता का कहीं भी लेशमात्र का भी स्पर्श नही है। वह मौन के महान त्याग(Silent Sacrifice) की अद्भुत मिशाल है। महान तपस्विनी वह रामकथा की अनसुनी वीरांगना(Unsung Heroine) है।
लेखक – डा. जयशंकर शेरपुरवासी
वर्तमान मे निवास – लखनऊ
संपर्क सूत्र– 6394192621
संदर्भ ग्रंथ –
- वाल्मीकि रामायण ।
- कम्ब रामायण ।
- आध्यात्म रामायण ।
- रामचरित मानस ।
- रामानन्द सागर निर्मित रामायण सीरियल ।
- बज्जिका रामाएन ।
