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ढुलमुल वांगचुक यानी थाली के बैंगन

सरकार ने बैठाया और सरकार ने ही उठाया

 

अनिल तिवारी 

 

राहत और स्वागत की बात है कि पिछले 25 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक अपनी पत्नी गीतांजलि की मौजूदगी में केंद्र सरकार के निचले पायदान के दो मंत्रियों के हाथ से जूस पीकर अपना अनशन समाप्त कर दिया है। आमरण अनशन के सुखांत पटाक्षेप पर जारी बयान में कहा है कि 65 सांसदों के आग्रह को सिर माथे धर अन्न जल ग्रहण करने पर राजी हुए है। मनुष्य जीवन अनमोल है, इसलिए उनके इस कदम का स्वागत हो रहा है और होना भी चाहिए। बताते हैं कि स्वयं प्रधानमंत्री ने भी सराहना की है तथा वांगचुक को चिकित्सकों की मदद से अपना खोया हुआ वजन फिर से प्राप्त करने की नेक राय दी है। वांगचुक की घोषणा से किसी को ताज्जुब नहीं हुआ। विपक्षी दलों का मानना है कि सरकार के इशारे पर बैठे थे, सरकार के कहने पर खत्म कर दिया।

धुर कांग्रेसी नेता रहे सोनम वांग्याल के पुत्र सोनम बांगचुक पर्यावरण प्रहरी है और अपनी दूसरी पत्नी गीतांजलि के साथ मिलकर लद्दाख के दुर्गम इलाकों में शिक्षा और पर्यावरण रक्षा को लेकर एक संस्थान चलाते हैं।

आभासी जगत से जन्मी कॉकरोच जनता पार्टी की जमीनी गतिविधियां बढ़ी तो वांगचुक भी जुड़े और उन्होंने कॉकरोचों को समर्थन देने का ऐलान किया तथा भूख हड़ताल पर बैठ गए। पूर्व में बिना किसी बुलावे के जिस तरह वे अपने स्वयं के निर्णय से पार्टी को समर्थन देने आए ठीक उसी तरह बीती रात बिना किसी सलाह मशविरा के उन्होंने अपना फैसला सुना दिया। इसमें कोई बुराई नहीं है। व्यक्तिगत तौर पर यह स्वतंत्रता सभी को है। लेकिन जब व्यक्तिगत निर्णय पर सामूहिक बोध का दावा किया जाने लगे तो जाहिर है की सवाल भी खड़े होंगे। अनशन समाप्ति के बाद उन्होंने जो बयान जारी किया है उसकी भाषा के निहितार्थ खोजे जा रहे हैं। चिंतन मनन, बहस विमर्श के साथ खंडन मंडन भी हो रहा है। बयान की भाषा चीख-चीख कर कह रही है की सब कुछ ‘स्क्रिप्टेड’ है। मैं स्वयं भाषा से जुड़ा हुआ हूं। भाषा माध्यम है — सूचना का और संवेदना का। सूचना के लिए सरल, सीधी और इकहरी भाषा चाहिए। उससे वही अर्थ निकले जो लिखा या कहा गया हो! गणित और कानून की भाषा ऐसी ही होती है। पर संवेदनाएँ अतल, असीम, अनंत, अरूप और अमाप्य होती हैं। भाषा को उनकी गहराइयाँ, ऊँचाइयाँ और अरूप भावनाएँ व्यक्त करनी होती हैं। इसलिए मीरा दर्द में इतना ही कह पाती हैं –
मेरो दर्द न जाने कोय।
परन्तु भाषा हार नहीं मानती। वह अकथ्य को कहने के लिए कुछ-न-कुछ तरीके खोज लेती है। संवेदना की अतल गहराइयों तक पहुँचने के लिए उसे दिव्य प्रक्षेपास्त्र बनाने पड़ते हैं। कभी शब्द को प्रक्षेपास्त्र बनाना पड़ता है, कभी पदबंध को तो कभी पूरे वाक्य को।

शब्द को प्रक्षेपास्त्र बनाएँ तो उपमान या प्रतीक बनता है । पदबंध को सुदूर अर्थ तक प्रक्षेपित किया जाए तो उसे बहुव्रीहि समास या मुहावरा कहते हैं। और वाक्य को दूरभेदी बनाएँ तो उसे सूक्ति, अन्योक्ति, लोकोक्ति या समासोक्ति कहते हैं।

किसी मोटे को *मोटा* कहने में वह बात नहीं है, जो उसे *हाथी* कहने में है ; मूर्ख को गधा कहने में है, शिशु को फूल कहने में है या सुंदरी को हरसिंगार कहने में है। इन्हें प्रतीक कहें या उपमान, ये दिव्यास्त्र हैं जो किसी के गुण को अनंत फैलाव दे देते हैं। ये शब्द या पद जब एकत्र होकर पदबंध या मुहावरा बनते हैं और एक वाक्य के अंग बनते हैं तो इनकी धार देखने योग्य होती है। किसी *ढुलमुल* को *थाली का बैंगन* या *बेपैंदी का लोटा* कहने में जो बात है, अकारण बात बढ़ाने को तिल का ताड़ बनाना कहने में जो बात है, वह सरल अभिव्यक्ति में कहाँ! ये भी भाषा के दिव्यास्त्र हैं।

भाषा के दिव्यास्त्र अनंत हैं ; क्योंकि भाषा ऐसी दिव्य सुंदरी है जो संसार के सभी परिधानों को धत्ता बताकर अपने लिए नित नए परिधान खोज लेती है। वाक्य-रचना में जब वह तीखी मिर्च-सी तेज और प्रभावी हो जाती है तो सूक्ति कहलाती है। है तो वह उक्ति ही, परंतु उसकी चुस्ती, कलात्मकता और संक्षिप्तता के कारण हम उसे सूक्ति कहते हैं। थोड़े में बहुत कहना या गागर में सागर भरना –यह सूक्ति की करामात है।

और जब कोई उक्ति अपने संकेतों के द्वारा खुद अपने आप को नहीं व्यक्त करती बल्कि अपने बहाने से औरों पर वार करती है ; ‘कहना बेटी को सुनाना बहू को’ के अंदाज में जब बातें करती है तो उसे अन्योक्ति कहते हैं। बिहारी की एक अन्योक्ति प्रसिद्ध है। कच्ची उम्र की नई पत्नी के संग विलास में डूबे राजा जयसिंह को जब कोई नहीं चेता सका तो बिहारी की इस एक अन्योक्ति ने चेताया। उन्होंने लिखा –
नहीं पराग नहिं मधुर मधु, नहीं विकास इहिं काल।
अली कली ही सो बंध्यो, आगे कौन हवाल।
कहते हैं राजा जयसिंह इस दिव्यास्त्र की चोट से दरबार में लौटे। यह अन्योक्ति है।
इसी की एक दुधारी बहन है– समासोक्ति। वह दोनों तरफ धार रखती है। अपने लिए भी जीती है और औरों पर भी दूर तक मार करती है। जब पद्मावती की सखियाँ पद्मावती को कहती हैं —
ए रानी! मन देखु बिचारी।
एही नैहर रहना दिन चारी।

वे केवल अपने मायके में रहने की बात नहीं कर रही, अपितु इस नश्वर संसार में रहने की भी बात कर रही हैं ।

अन्योक्ति और समासोक्ति कितना भी संकेत उठा लें, किंतु वे दोनों किसी एक लक्ष्य से बँधी होती हैं। परंतु *लोकोक्ति* स्वतंत्र है, मुक्त विचरण करती है और लोगों की जुबान पर भी विहार करती है। इसलिए उसे *कहावत* भी कहते हैं। जब कोई सांकेतिक उक्ति स्वयं अपना अर्थ न देकर किसी और तरफ इशारा करती है तो उसे लोकोक्ति कहते हैं। यह स्वयं में पूरा वाक्य होती है। यह वाक्य पर निर्भर नहीं होती बल्कि किसी कथन को पुष्ट करती है या उसका समर्थन करती है। जैसे — *अधजल गगरी छलकत जाय*। कोई अपटु, अकुशल व्यक्ति कुशलता पर बढ़-चढ़कर बातें करने लगे तो बस इतना ही कहना काफ़ी है — *थोथा चना बाजे घना।*

कुल मिलाकर परीक्षाओं में गड़बड़ी और उसकी जवाब देही तय करने के लिए वर्तमान शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर आयोजित वांगचुक की भूख हड़ताल बगैर लक्ष्य प्राप्ति के समाप्त हो गई है। उन पर सरकारी आंदोलन-जीवी होने के आरोप हैं। उनके विदेशी फंडिंग का भी मामला बताया जाता है। उनकी ओर से एक बयान जारी किया गया है। देश, काल परिस्थिति के हिसाब से बयान की भाषा, विषय- वस्तु, भाव-भंगिमा आदि के आधार पर साधारण भाषाई समझ यही कहती है की दूसरे कोने में लुढ़का दिए जाने के डर से बैगन ने खुद ही करवट बदल ली है। हालांकि जंतर मंतर पर बैठे कॉकरोच दल ने वांगचुक के निर्णय से अपने को अलग किया है। लेकिन सरकारी अमलों की देह भाषा बता रही है कि केंद्र की सरकार को भी थोडी राहत मिली है।

सरकार के संतुलनकारों को लगता है राम मंदिर में चढ़ावा चोरी, और गाड़ियों में मिलावटी एथेनॉल का मामला नेपथ्य में चला गया है। शिक्षा के मुद्दे पर हो रही विपक्षी एकता को तहस-नहस करने में लगभग कामयाबी मिल गई है। भारत अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर मोहर लग चुकी है। झारखंड में पीसीएस की परीक्षा देने गए प्रतियोगी छात्र निराश होकर एक बार फिर अपने-अपने घरों को लौट गए हैं। भारतीय जनता पार्टी आने वाले दिनों में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई है। संघ और विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों की मौजूदगी में अयोध्या में सैकड़ो संत बैठक कर राम मंदिर चढ़ावा चोरी के कथित सरगना संपत बंसल को ससम्मान फिर से ट्रस्ट में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने के लिए रास्ता बनाने में जुट गए हैं। नीट धांधली के मुख्य आरोपी मुखिया को सीबीआई ने क्लीन चिट दे ही दिया है।

हम सभी जानते हैं आंदोलन के लिए दिल्ली सहित देश के अन्य हिस्सों में बच्चे सड़क पर उतरे, पुलिस की लाठी खाए। वे एक बार और ठगे गए। अब आश्वासनों की खेती होगी, बड़े-बड़े वादों के बीज बोये जाएंगे। अन्ना, अरविंद, वांगचुक की नस्ल का कोई नया बैगन तलाश लिया जाएगा जो जरूरत के हिसाब से थालियों में लुढ़कने लुढ़काने योग्य होगा।

जनता बहुत समझदार है। जनता द्वारा चुने गए नेता और अधिक समझदार हैं। पढ़े लिखो की समझदारी पर मुझे कोई शक नहीं है। आइए, गोरख की ‘समझदारों का गीत’ कविता पढ़ते हैं-
हवा का रुख़ कैसा है, हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं, हम समझते हैं
हम समझते हैं ख़ून का मतलब
पैसे की क़ीमत हम समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है, हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं

चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम
हम बोलने की आज़ादी का
मतलब समझते हैं
टूटपुँजिया नौकरियों के लिए
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरोज़गारी अन्याय से तेज़ दर से बढ़ रही हो
हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के
ख़तरे समझते हैं
हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्यों बच जाते हैं, यह भी हम समझते हैं
हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह
सिर्फ़ कल्पना नहीं है
हम सरकार से दुखी रहते हैं
कि समझती क्यों नहीं
हम जनता से दुखी रहते हैं
कि भेड़ियाधंसान होती है
हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी
हम समझते हैं
यहाँ विरोध ही वाजिब क़दम है
हम समझते हैं
हम क़दम-क़दम पर समझौता करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिए तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क को गोल-मटोल भाषा में
पेश करते हैं, हम समझते हैं
हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी
समझते हैं

वैसे हम अपने को किसी से कम
नहीं समझते हैं
हम स्याह को सफ़ेद और
सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं
हम चाय की प्यालियों में
तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं
करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमज़ोर हो
और जनता समझदार
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं
हम क्यों नहीं कुछ कर सकते हैं
यह भी हम समझते हैं।

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  • दिव्य प्रस्तुती

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