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बल, बुद्धि, विद्या के सागर हनुमान

अतुलित विद्या के सागर, अष्ट सिद्धि नवनिधियों के दाता हनुमान वनवासी आदिम कपीस जनजाति में पैदा हुए थे। इनके पिता का नाम केसरी और माता का नाम अंजना था। ये अपने माता पिता के छ पुत्रों मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान, धृतिमान और स्वयं हनुमान में से सबसे बडे थे। ज्योतिष गणना के अनुसार इनका जन्म 85 लाख 58 हजार 112 वर्ष पूर्व त्रेता युग के अंतिम चरण में चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्रा नक्षत्र मेघ लग्न में प्रातः छ बजकर तीन मिनट पर वर्तमान के महाराष्ट्र प्रदेश के नाशिक जिला में अवस्थित अंजनेरी पर्वत पर हुआ था जिसे पुराणों, कथाओं आदि में ऋषिमुख पर्वत नाम से भी संबोधित किया गया है। वायुपराण में इनके जन्म के संबंध में लिखा है कि आश्विनस्यासिते पक्षे स्वात्यां भौमे च मारुतिः। मेषलग्ने अंजनागर्भात् स्वयं जातो हरः शिवः ।। अर्थात् आश्विन (चान्द्र मास-कार्तिक) के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को स्वाति नक्षत्र और मेघ लग्न में माता अंजना के गर्भ से स्वयं भगवान शंकर ही प्रगट हुए। 1 ये बचपन में बहुत चंचल, शरारती और नटखट थे। बचपन से ही इनका शरीर बज्र के समान था। ये अक्सर आस-पास के ऋषि आश्रमों में छुपकर जाकर उनके दैनिक चर्या और पूजा के सामानों को इधर-उधर बिखेर कर और उनमें से कुछ लेकर चले भी आते थे। एक दिन एक ऋषि ने आश्रम में पूजा पाठ के सामानों को फेकते और तोडते- देखकर आग बबूला हो उठे तथा क्रोध के वशीभूत हो फडकते हुए नथुनों से दीर्घ श्वांस भरते हुए श्राप दे दिया कि जिन शक्तियों में चूर होकर तुम आश्रमों में उत्पात मचाते रहते हो, वे सभी की सभी शक्तियां आज से तुम्हारे अवचेतन में चली जाएंगी, जब तक तुम्हें कोई स्मरण नही दिलाएगा तब तक तुम उनसे दूर ही रहोगे, उनका उपयोग नहीं कर पाओगे तथा स्वयं को किसी के द्वारा स्मरण न दिलाने तक अपने को शक्ति-विहीन अनुभव करोगे। इसके बाद हनुमान को उनकी सारी शक्तियां विस्मृत हो गई। हनुमान को शैव धर्म में जहां पर शिव का अवतार कहा जाता है वहीं पर वैष्णव परंपरा के अनुसार इनको वायु-देवता का पुत्र या अवतार माना जाता है। वायुपुत्र के संबंध में शास्त्रों में कई कथाएं मिलती हैं। एक कथा के अनुसार जब माता अंजना और केसरी संतान प्राप्ति के लिए तपस्या कर रहे थे तब वायुदेव ने ही भगवान शिव की शक्ति के अंश को माता अंजना के गर्भ तक पहुंचाया था। इन्हीं के माध्यम से हनुमान जी का जन्म हुआ। इसलिए उन्हें पवन देवता का मानस पुत्र कहा जाता है और साथ ही पवन देवता ने हनुमान को शक्ति, वेग और सामर्थ्य का वरदान देते हुए उनको गति बल और तेज प्रदान किया। बचपन में जब हनुमान ने उदित सूर्य को मीठा, रसीला, सुस्वादु फल समझकर खाने के लिए के लिए दौड़ लगाई उसी समय पूरे ब्रह्माण्ड में अनर्थ घटने से रोकने के लिए उनकी गति को भंग करने के लिए इन्द्र देवता ने अपने अमोघ अस्त्र बज्र से प्रहार किया जो उनके जबडे से जा टकराया जिसके कारण उनके जबडे की हड्डी टूट गई। जब पवन देव ने बालक के ऊपर इन्द्र द्वारा बिना सोचे-विचारे भयंकर प्रहार को देखा तो वे अत्यंत कुपित हो गए और संपूर्ण संसार की वायु को रोक दिया। वायु के रुकते ही स्वर्ग से लेकर धरती पर चारो तरफ हाय-तौबा मच गई। वायुदेव के क्रोधित होने पर देवताओं को पता चला की यह कोई साधारण बालक न होकर वायु देवता के पुत्र हैं और सभी देवता इन्द्र को साथ लेकर पवन देवता के यहां गए और इन्द्र के साथ साथ सभी देवतागणों ने भी उनकी तरफ क्षमा याचना कर उनको प्रसन्न किया। इस संबंध में 16वीं शताब्दी में रचित ‘भावार्थ रामायण’ में एक और कथा मिलती है कि जिस समय माता अंजना पुत्र-प्राप्ति के लिए शिव से प्रार्थना कर रहीं थी उसी समय अयोध्या नरेश दशरथ भी पुत्र कामना से पुत्रकाम यज्ञ कर रहे थे, भगवान शिव अयोध्या नरेश के यज्ञ से प्रसन्न होकर आशीर्वाद के रूप में हलवे का प्रसाद दिया। जिसे दशरथ की तीनों रानियों को प्रसाद स्वरूप ग्रहण करना था। जिस समय ये रानियाँ प्रसाद ग्रहण कर रहीं थी उसी समय दैवीय शक्ति संपन्न एक चील पक्षी आया और झपट्टा मारकर हलवे का कुछ अंश चोंच मे दबाकर वहां से भाग निकला और उस टुकड़े को जंगल में माता अंजना जब अपनी कुटिया से बाहर कुछ कार्य कर रहीं थी तो उनकी हथेली पर गिरा दिया। अंजना ने उस हलवे के अंश को भगवान का प्रसाद समझकर ग्रहण कर लिया। उसी चमत्कारी हलवे के प्रभाव से माता अंजना के गर्भ से हनुमान का जन्म हुआ। वाल्मीकि रामायण के अनुसार अंजना नामक अप्सरा को बंदर का रूप धारण करने श्राप मिला था। उसने श्राप से मुक्ति के लिए भगवान शिव की घोर तपस्या की। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने वरदान दिया कि वह एक ऐसे पुत्र संतान की मां बनेगी जो उनकी दिव्य शक्ति का अवतार होगा। यही कारण है कि हनुमान को मारुतिनंदन और शंकरसुवन दोनों ही कहते हैं। ऐसा भी मिलता है कि जन्म के बाद हनुमान की शक्ति और सामर्थ्य को समृद्ध करने में पवन देव ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। हनुमान के जन्म के संबंध में एक और कथा मिलती है। एक बार धर्मदेवता पुल्कसी (वन्य नीच स्त्री) का रूप धारण कर जहां अंजना निवास कर रहीं थी आए। उनके एक हाथ में बेंत तथा दूसरे में सुतली थी। वह जोर-जोर से चिल्लाकर लोगों को अपना भाग्य जानने को पुकार लगा रही थी। जब अन्य लोगों का भाग्य बताते हुए वह अंजना के पास पहुंची तो उन्होंने उसको सुन्दर आसन प्रदान कर उसके समक्ष सुवर्णपात्र में मौत्तिकरूपी तण्डुल रखकर संतुष्ट करते हुए पूछा- हे देवि! मेरे भाग्य में पुत्र सुख है या नहीं? यदि मुझे एक बलवान पुत्र हो जाएगा तो मैं तुम्हारी संपूर्ण मनोकामनाएं पूरी कर दूंगी। तब पुल्कसी बोली- तुझे ऐसा ही पुत्र अवश्य प्राप्त होगा। श्री वेंकटाचल पर्वत पर सात हजार वर्ष तक अनवरत तपस्या करने पर तुम्हें मनोवांछित पुत्र प्राप्त होगा। इतना कहकर वह वहां से चली गई। उस कथा के अनुसार सिद्धमहात्माओं के वास स्थान वेंकटाद्रि पर्वत पर आकाशगंगा के पास केवल वायु का भक्षण करते हुए पवनदेवता का ध्यान करती हुई अंजना दारुण तप करने लगी। कुछ समय के पश्चात् आकाशगंगा से आकाशवाणी हुई कि पुत्री निश्चिंत होओ, तुम्हारा भाग्य खुल गया।” अत्याचारी, दुराचारी रावण का विनाश करने के लिए रघुकुल में जब श्रीहरि राम के रूप में अवतार लेंगे तो उनकी सहायता के लिए पराक्रमी, बलशाली धैर्यवान, जितेन्द्रिय और अप्रमेय गुणों वाला एक तुम्हारा भी पुत्र होगा। इस आकाशवाणी को सुनकर अंजना गदगद हो उठी तथा सारी बात केसरी को बताया। कमलनयनी अंजना ने दस मास पूर्ण होने पर श्रावण मास की एकादशी के दिन श्रवण नक्षत्र में सूर्योदय के समय कानों में कुण्डल और यज्ञोपवीत धारण किए हुए, कौपीनधारी, सुवर्णवर्णा जिसका रूप, मुख, पूंछ और अधोभाग बन्दर के समान था सुन्दर पुत्र रत्न को जन्म दिया। वैसे “आत्मा वै जायते पुत्रः इस शास्त्र-वचनानुसार वानरराज केसरी के औरस पुत्र होने के कारण इन्हें केसरीनन्दन कहना ही सुसंगत ही है।”2 “महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने, अंजनी पुत्र, पवनसुत, शंकरसुवन, केसरीनन्दन आदि।”. “नाम हनुमान जी के लिए प्रयुक्त किए हैं। “3 इसके अलावा इनके अनेकों नाम रामेष्ट, वर्धनराज, बजरंगबली, महाबली महावीर, फाल्गुनीसखा, संकटमोचक, सीताशोक विनाशक, लक्ष्मण-प्राणदाता, कपीश, हनुमान, पिगांक्ष, अमितविक्रम, दशग्रीवदर्पहा, उदधिक्रमण मिलते हैं जिसमें से कुछ नामों का उल्लेख आनंदरामायण में भी मिलता हैं यथा “हनुमान अंजनीसुनूर्वायुपुत्रो महाबलः। रामेष्टः फाल्गुनसखः पिंगाक्षो अमितविक्रमः ।। उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः। लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा।। “हनुमान को तारसारोपनिषद में रुद्र का अवतार भी कहते हैं मकराक्षरसम्भूतः शिवस्तु हनुमान स्मृतः।” हनुमान जी सप्त चिरंजीवियों में एक हैं। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि द्वापर और कलियुग के संधिकाल में महाबली भीम ने गंधमादन पर्वत पर विचरण करते हुए हनुमान को देखा था। उनकी अंग-कान्ति गिरती हुई बिजली की भांति पिंगल वर्ण की विद्युत्पाद के समान चंचल, चकाचौध पैदा करने वाली और उनकी गर्जना वज्रपात के गडगडाहट जैसी थी। उनके कंधे चौड़े पुष्ट, शरीर का मध्यभाग और कटि प्रदेश पतला, घनी रोमावली, छोटे ओष्ठ दल, मुख और जिह्वा ताम्रवर्ण के कान लाल वर्ण के, मुख में श्वेत दन्त पंक्तियां, दाढ तीखे श्वेत अग्रभाग से सुशोभित थे। उनको देखकर ऐसा लगता था जैसे केसर की क्यारी में अशोक पुष्प का गुच्छा रखा हुआ है-‘केसरोत्करसमिश्रमशोकानामिवोत्करम्।’ 

हनुमान का शरीर बज्र के समान था। वे बुद्धि-बल में श्रेष्ठ, वाकपटु, निर्भयता के सागर हैं। हनुमान आजीवन ब्रह्मचारी थे। लेकिन एक कथा ऐसी भी है जिसका उल्लेख कई स्थानों पर मिलता है। उसमें बताया गया है कि पाताललोक का द्वारपाल मकरध्वज हनुमान का ही पुत्र था जिसको यह तो पता था कि उसके पिता हनुमान हैं लेकिन उसे उनकी पहचान नहीं थी। लेकिन उसके जन्म की कहानी भी साधारण नहीं हैं अजीबो गरीब विचित्रता लिए हुए है। जब हनुमान लंका दहन कर समुद्र की जलराशि में अपनी पूंछ में दहक रही आग को बुझाने के लिए कूद रहे थे तो पसीने से तरबतर उनके शरीर से पसीने की एक बूंद जल में स्थित एक विशालकाय मछली के मुंह में टपक गई जिसका पान कर उसने मकरध्वज नामक शक्तिशाली, बहादुर, युद्धकला में प्रवीण पुत्र को जन्म दिया, जिसका आधा शरीर मछली (मकरा का था) का था और आधा हनुमान (पिता के समान) जैसा। इसी तरह वर्तमान तेलंगाना राज्य के खम्मम जिले के एलंदु नामक स्थान पर स्थित एक मंदिर है जिसमें हनुमान के विग्रह के साथ उनकी पत्नी कही जाने वाली सुवर्चला का भी विग्रह है। यहां हनुमान के साथ साथ उनकी पत्नी की भी पूजा की जाती है। इस मंदिर का निर्माणकाल लगभग 21 वर्ष पूर्व का ही है। इसके संबंध में “पराशर संहिता” में एक कथा मिलती है कि जब हनुमान सूर्यदेव को अपना गुरु मानकर उनसे नौ विद्याओं को सिखाने का आग्रह करने लगे तो उन्होंने हनुमान के ब्रह्मचारी होने की बात को समझते हुए विद्या देने से मना कर दिया। लेकिन हनुमान कहां मानने वाले थे वो भी विद्या के संबंध में, गुरुदेव से विद्या सिखाने के लिए जिद्द करने लगे। हनुमान को पीछे न हटते हुए देखकर सूर्यदेव ने बताया कि तुम्हें ब्रह्मचारी होने के कारण इन विद्याओं को नही सिखा सकता क्योंकि इनमें से चार का ज्ञान केवल विवाहित पुरुष ही ले सकता है। दूसरा तथ्य यह कि ये एक साथ समूह में सीखने पर ही प्रभावी और सार्थक होती हैं। गुरुदेव की यह बात सुनकर हनुमान बहुत उदास हो गए और उन्हें लगा कि इनके ज्ञान के अभाव में मैं अधूरा ही रह जाऊंगा। हनुमान की विद्याओं के प्रति उत्कट आस्था, सीखने की ललक तथा मुरझाए चेहरे को देखकर सूर्यदेव बोले-विवाह कर लो और सीख लो। इस कार्य में मैं भी तुम्हारी सहायता कर दूंगा। विद्याज्ञान के पश्चात जिस तरह से तुम चाहोगे अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हो। विद्याज्ञान की पिपासा को शान्त करने के लिए हनुमान ने विवाह के लिए हामी भर दी और वहीं पर सूर्यदेव ने अपनी पुत्री सुवर्चला से उनका विवाह कराकर उनको अपनी नौ विद्याओं के ज्ञान से संपन्न किया। ऐसा भी मिलता है कि विवाह संपन्न होने के बाद ही जिस समय में हनुमान विद्या सीख रहे थे उसी समय सुवर्चला अपनी तपस्या में लीन हो गई और हनुमान भी विवाह के बंधन से मुक्त हो गए तथा वे आगे भी ब्रह्मचारी बने रहे। इन विद्याओं से संपन्न होने के कारण ही हनुमान को “अष्ट सिद्ध नौ निधि के दाता” कहते हैं। यहां पर एक और प्रसंग आता है कि विद्याओं में पारंगत होने के पश्चात हनुमान सूर्यदेव से गुरुदक्षिणा लेने की प्रार्थना करने लगे। इसके लिए उन्होंने सूर्यदेव से बहुत अनुनय-विनय किया लेकिन सूर्यदेव नकारते रहे। जैसे ही सूर्यदेव को संकट में जीवन व्यतीत कर रहे अपने पुत्र सुग्रीव की याद आई तत्काल गुरुदक्षिणा स्वरूप सुग्रीव की रक्षा और प्रतिपल मदद करने का वचन लेकर प्रसन्नतापूर्वक हनुमान को वहां से विदा कर किया। हनुमान अखण्ड आजीवन ब्रह्मचारी थे। उनमें ब्रह्मचर्य का गुण इतना भरा हुआ था कि सीता को खोजते हुए जब रावण के अनतःपुर में प्रवेश किए तो वहां अचेतावस्था में रूप गुण की खान पड़ी हुई स्त्रियों को, जिनके वस्त्र अंगों से खिसक गए थे, मधुपान के अनन्तर जिनके केश बिखर गए थे, किन्हीं के कोमल अंगों पर उभरी हुई आभूषणों की सुंदर रेखाएं नये गहनों की भांति सुशोभित हो रहीं थी “मृदुष्व अंगेषु कासांचित कुचाग्रेषु चच संस्थिता।” किन्हीं की करधनी की लड टूट गई थी। पर्यंको पर अचेतावस्था में पडी हुई वे युवतियाँ बोझ ढोकर थकी हुई अश्वजाति की नई बछडियों के समान दिखाई दे रहीं थी ‘मुक्ताहारवृताश्चन्याः काश्चित् प्रस्त्रस्तवाससः। व्याविद्धरशनादामाः किशोर्य इव वाहिताः। ‘5, देखकर उनके मन में बहुत ग्लानि हुई और सोचने लगे कि इस तरह स्त्रियों को देखना पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य आचरण के विपरीत है। लेकिन पुनः विचार आया कि मै तो माता सीता की खोज में निकला हूं, मेरा उद्देश्य स्त्रियों को देखना नहीं था। इससे मेरे अन्तःकरण में भी कोई विकार नही पैदा हुआ। क्योंकि ऐसी एकल विकट स्थिति में स्व का अनतःकरण ही सबसे बडा साक्षी होता है। मेरी तो भावना भी दूषित नही हुई। इतना कुछ सोचने के पश्चात उनको संतोष मिला। गोस्वामी तुलसीदास जी इनके गुणगणविशिष्ट स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि “अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानं ज्ञानिनामग्रण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ।। “4 इनके स्वामी स्वयं रामजी अगस्त मुनि के समक्ष इनकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं “शौर्य दाक्ष्य बलं धैर्यं प्राज्ञता नवसाधनम्। विक्रमश्च प्रभावश्च हनूमति कृतालयाः ।।” 5 अर्थात् शूरवीरता, दक्षता, बल, धैर्य, विद्वता, नीति ज्ञान, पराक्रम और प्रभाव इन सभी सदगुणों ने हनुमान जी के भीतर घर कर रखा है। “6 स्कन्दपुराण में वर्णन मिलता है कि साक्षात् भगवान शिव ने हनुमान को अजर, अमर, अजेय और समस्त अस्त्र शस्त्रों से अवध्य, शत्रुओं के लिए घोर भय प्रदाता और मित्रों के लिए सभी प्रकार से अभयदाता होने का वरदान दिया था- “आयुधानां ह सर्वेषामवध्यो अयं भविष्यति। अजरश्चामरश्चैव भविष्यति न संशयः ।। अमित्रभयदो वेष मित्राणामभयप्रदः। अजेयो भविता युद्धे लिंगनोक्तं पुनः पुनः ।।” हनुमान को वज्रकाय (वज्रसंहनोपेतो वैनतेयसमो जवे।। वाल्मीकि रामायण) और बृहतकाय बृहत्कायो बृहद्यशाः।।-श्री हनुमत्सहस्त्रनाम) के साथ-साथ इच्छाधारी का भी वरदान प्राप्त था। वे नराकार (तथेति हनुमांस्तत्र मानुषं वपुरास्थितः।-अध्यात्म रामायण में भरत को भगवान श्रीराम के आगमन का संदेश देने के लिए अयोध्या में मनुष्य रूप में गए थे।), वानराकार, सूक्ष्म (मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरि। तुलसीकृत रामचरितमानस), विकट (लंका जाते समय हनुमान जी ने महेन्द्र पर्वत पर अपना विशालकाय रूप प्रकट किया था।) आदि अनेक रूपों को समय-समय पर धारण करने की शक्तियों से संपन्न थे। महाकवि क्षेमेन्द्र ने अपने ग्रंथ “रामायणमंजरी” में वर्णन किया है कि अशोक वाटिका मे हनुमान ने सीता को अपने पराक्रम पर विश्वास दिलाने के लिए विन्ध्याचल पर्वत के समान रूप दिखाया था- “प्रवर्धमानः सहसा पुनर्विन्ध्य इवोत्थितः। “7 अठारहवीं उन्नीसवीं सदी के मैसूर राज्य के शासक महाराजा कृष्णराज वोडेयर तृतीय ने अपने “श्रीतत्वनिधि” नामक ग्रंथ में हनुमान के स्वरूप के बारे में वर्णन करते हुए लिखा है- “स्फटिकाभं स्वर्णकान्ति द्विभुजं च कृतांजलिम्। कुण्डलद्वयसंशोभिमुखाम्बुजमहं भजे।।”8 अर्थात अम्बुज के समान मुख वाले, दोनों कर्णों में शोभायमान कुण्डल वाले, स्फटिक के आभा से युक्त स्वर्णकान्ति संपन्न हनुमान जी का भजन करता हूँ। हनुमान जी पीताम्बरधारी हैं, कहीं-कहीं पर उनको श्वेतवस्त्रधारी भी बताया गया है। हनुमान जी कानों में कुण्डल और सिर पर मुकुट धारण करते हैं, उनका गला मणिजडित स्वर्णहार से सदैव विभूषित रहता है। शास्त्रों और पुराणों में हनुमान का पंचमुख, पन्द्रह नेत्रों से युक्त दस भुजाओं वाले स्वरूप का भी वर्णन मिलता है (पंचवक्त्रं महाभीमं त्रिपंचनयनैर्युक्तम्। बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकाम्यार्थसिद्धिदम्।।) ।

हनुमान जी का सुप्रसिद्ध आयुध गदा को माना गया है। गदा सदैव उनके साथ रहता है। इसलिए उनका एक नाम “गदाग्रही” भी है। “मंत्रमहार्णव” नामक ग्रंथ में उल्लेख है कि “वामहस्तगदायुक्तम” अर्थात उनके बांये हाथ में रहने वाला गदा उनका प्रमुख आयुध है। गिरि, नख, तरू भी उनके आयुधों में गण्य हैं। स्कंदपुराण में उनकी “वज्रायुधधारी” कहकर वन्दना की गई है “नमो रक्षःपपुरीदाहकारिणे वज्रधारिणे”। केवल अपनी मुष्टिका और पूंछ की ही नही आवश्यकता पडने पर थप्पड़ का भी आयुध के समान वे प्रयोग करते हैं यथा- “तलप्रहारैः पवनात्मजः कपिः।” श्रीविद्यार्णवतन्त्र के हनुमत्प्रकरण में कहा गया है कि “पंचमुखी हनुमान जी दस आयुधों से सदैव अलंकृत रहते हैं”- “खड्गं त्रिशूलं खटवागं पाशमंकुशपर्वतम् ।। ध्रुवमुष्टिगदामुण्डं दशभिर्मुनिपुंगव। एतान्यायुधजालानि धारयन्तं यजामहे ।।” इसी ग्रंथ में हनुमान जी के पंचमुखी स्वरूप का भी वर्णन मिलता है इनके पूर्व दिशा का मुख करोड़ों सूर्य की प्रभा से युक्त वानर का है, दक्षिण की ओर का मुख महान अद्भुत, भीषण भय को विनष्ट करने वाला अत्यंत उग्र तेज से प्रदीप्त नरसिंह आकार का, पश्चिम दिशा का मुख समस्त रोगों का का शमन करने तथा विष का निवारण करने वाला गरुड़ का और उत्तरदिशा का मुख ज्वरविनाशक नीले नभ के समान श्याम वर्ण सूकर का तथा ऊर्ध्वमुख दानवविनाशक हय के आकार का है।

 

दैवीय शक्तियों से संपन्न हनुमान रामकथा के विशिष्ट पात्रों में से एक हैं। इस कथा को आगे बढाने में जितनी महती भूमिका इनकी है उतनी राम, सीता, लक्ष्मण के अलावा संपूर्ण रामायण में और किसी चरित्र की नहीं दिखाई देती। रामायण में इनका प्रकटीकरण तब होता है जब छल से रावण द्वारा अपहृत सीता की खोज करते हुए धनुर्धर राम लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत के तलहटी में पहुंचते हैं जहां शिखर पर भाई बाली द्वारा भगाये गए अतुलित बलशाली वानरराज सुग्रीव रहते हैं। पम्पासरोवर के निकट भ्रमण करते हुए जब सुग्रीव उन अद्भुत दर्शनीय वीर श्रीराम और लक्ष्मण को उसी दिशा में आते देखकर वाली के द्वारा इनको भेजे गए समझकर अत्यंत भयभीत हो उठे और उनकी भूख-प्यास सब समाप्त हो गई- “तावृष्यमूकस्य समीपचारी चरन् ददर्शाद्भुतदर्शनीयौ। शाखामृगाणामधिपस्तरस्वी वितत्रसे नैव विचेष्ट चेष्टाम् ।।” 9 उद्विग्न सुग्रीव को हनुमान अनेक प्रकार से धैर्य बधाते रहे लेकिन उनके मन से दीर्घ भुजाओं वाले विशाल नेत्रों से सुशोभित धनुष बाण, तलवार अस्त्रधारी वीरत्व से परिपूर्ण कुमारों को देखकर भय निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था और अन्ततः हनुमान को साधारण पुरुष के वेश में जाकर इनके बारे में सही जानकारी करने के लिए आदेशित किया। हनुमान ने उनके रूप गुण, वीरत्व धारण किए गए अस्त्र-शस्त्र की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए अपने आने का आशय और अपना परिचय विशुद्ध संयमित भाषा में वाकपटुता के साथ बताते हुए उनके विषय में जानने की उत्कण्ठा व्यक्त की। यहां पर वाल्मीकि जी जहाँ हनुमान का साधारण पुरुष के रूप में प्रकटीकरण दिखाते हैं वहीं पर मध्यकालीन महकवि गोस्वामी तुलसीदास ब्राह्मण के रूप में वर्णन करते हैं विप्र रुप धरि कपि तँह गयऊ। माथ नाइ पूछत अस भयऊ। 10 लेकिन परिचय देने, आशय बताने और आगमन के उद्देश्य को जानने के लिए जिस परिशुद्ध व्याकरण सम्मत हाव भाव के साथ सधी हुई अर्थगाम्भीर्य युक्त भाषा का प्रयोग हनुमान ने किया उसको सुनकर सकल ब्रह्माण्ड के स्वामी मानुषतनधारी लीला में रत श्रीराम आश्चर्यचकित हो गए, उन्हें पूर्णरूप से विश्वास हो गया कि यह भी कोई असाधारण गुण-संपन्न व्यक्तित्व हैं- “ननृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः। नासामवेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितुम् ।। नूनं व्याकरणं कृतस्रमनेन बहुधा श्रुतम्। बहु व्याहरतानेन न किंचिदपशब्दितम्।।” 11 और श्रीराम को बुद्धि के आगार वेद-वेदांग में निष्णात् वाककला में पटु हनुमान से अपने इधर आने के अभिप्राय को बहुत ही संक्षेप में समझा दिया। सीता की खोज में सहायक होने की बात को जानकर अग्रज का संकेत समझते हुए सुमित्रानंदन लक्ष्मण ने कहा- हे साधुसिरोमणि हनुमान जी सुग्रीव की मैत्री हमें स्वीकार है।

 

सुग्रीव के कठोर आदेशानुसार वानरों की अनेक टोलियां विभिन्न दिशाओं में सीता की खोज में लग गई। सम्पाती की त्रिकूट पर्वत पर लंका के अशोक वाटिका में सीता के होने की सूचना के आधार पर वानरों का एक दल ऋक्षराज जामवंत जी के नेतृत्व में हनुमान, अंगद आदि का, विशाल समुद्र के दक्षिण किनारे पर गया। ऋक्षपति जामवंत स्वयं के वृद्ध होने और अंगद के लौटने में संदेह जताने पर हनुमान के तरफ देखते हुए बोलने पर “कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।।, राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा ।। ” 12- हनुमान सिंहनाद करते हुए खेल-खेल में खारे जलराशि वाले समुद्र को पारकर सीता का पता लगाकर सभी सूचनाओं को लेकर आवागमन के लिए तत्पर हो उठे। इसी के साथ और इसके बाद की संपूर्ण रामकथा में रघुपुंगव नरश्रेष्ठ श्रीराम के राज्याभिषेक तक शायद ही कोई ऐसी घटना घटी हो जिसमें अतुलितबलधामं, हेमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानं, ज्ञानिनामग्रगण्यम्, सकलगुणनिधानं, वानराणामधीशं, रघुपतिप्रियभक्त, वातजातम् हनुमान की महत्वपूर्ण भूमिका न हो। प्रतिपल प्रत्येक अवसर पर राम की साया की तरह नतमस्तक मौन भाव में रामकाज की पूर्णता में हनुमान सर्वत्र अटूट लगन तथा निष्ठा-निश्छलता के साथ सुरत ही दिखाई देते हैं। चाहे वह विभिषण को प्रसन्न कर अशोक वाटिका में पहुंचना, वहां शाखाओं के बीच में छुपकर बैठे रहना, उपयुक्त समय पर सीता के समक्ष मुद्रिका डालना, माता सीता के मन में रावण को पराजित करने में संदेह होने पर “कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।”13 अर्थात विराट रूप धारण कर, वीरत्व को दर्शाते हुए विश्वास जीतकर उनको धैर्य बंधाना, अक्षयकुमार आदि का संहार कर मेघनाद को परास्त करने की शक्ति होने के बावजूद भी उसके द्वारा प्रक्षेपित ब्रह्मास्त्र में विनय के साथ बंधकर जानकारी हासिल करने हेतु रावण की सभा में पहुंचना, वहां अदभुत साहस-बुद्धिमत्ता के साथ श्रीराम की महिमा तथा उनके कृपा सिंधु स्वरूप का परिचय देना हो या अभिमान में चूर रावण का उपहास करना हो, अपनी पूंछ में प्रसन्नता के साथ रामकाज की पूर्ति हेतु आग लगवाना हो, लंका दहन करना हो, पुनः लौटकर माता सीता द्वारा प्रदत्त चूडामणि को राम को सौंपना हो, युद्ध में लक्ष्मण को शक्ति बाण लगने पर सुषेण नामक वैद्यराज को और संजीवनी बूटी को सूर्योदय से पूर्व ले आना हो, युद्धकाल में रात्रि में निद्रा मंत्र के माध्यम से राम-लक्ष्मण सहित संपूर्ण सैन्यदल को अचेतकर पातालनरेश अहिरावण के द्वारा रामलक्ष्मण को अपहृत करने की घटना के पश्चात उसका वधकर उन दोनों भाईयों को मुक्त कराना, सीता को परमविश्वास के साथ राक्षस कुल के विनाश और लंका विजय की सूचना देना हो, ज्यादा अवधि लगने पर भरत भईया के प्राण त्यागने की शंका से चिन्तित राम को धैर्य बंधाना तथा भरत को राम के अयोध्या आने की त्वरित सटीक सूचना देना हो सर्वत्र सभी रामकाज को पूर्णता प्रदान करते हुए हनुमान ही मुख्य भूमिका में अवलोकित होते हैं। इन सभी का गंभीरता के साथ विवेचन करने पर साबित होता है कि जिस कुशलता के साथ निर्वाध रूप से अपने जीवन का समूल सार उत्तरदायित्व समझते हुए जिम्मेदारीपूर्वक पवनपुत्र, शंकरसुवन, रूद्रावतार केसरीनंदन हनुमान ने रामलीला को गति और पूर्णता प्रदान की है वह सब किसी अन्य के लिए मुश्किल ही नही बल्कि असंभव था।

हनुमान परोपकारी, शीलवान, दयालु, सहिष्णु, परदुः ख से अभिभूत होकर समस्त दुखों को हरने वाले, संकटमोचक हैं। श्रीरामसीता के प्रति जैसा समर्पण भक्तिभाव हनुमान के हृदय में दिखाई देता है वैसा कहीं अन्यत्र नहीं मिलता। जब श्री राम राज्याभिषेक के पश्चात युद्ध में सहायक सभी कपीस जनजाति के सदस्यों को विभिन्न उपहारों से सम्मानित करते हुए हनुमान के यहां उनको सम्मानित करने पहुंचते हैं तो उनके अद्भुत त्यागपूर्ण, समर्पित सेवा की तुलना में सम्मान के लिए रखी गई सभी वस्तुएं, सभी उपहार बहुत लघु दिखाई दे रहे थे। इसलिए श्रीराम ने सीता की तरफ देखकर उनको गले से लगा लिया। सीता ने झटपट अपने सबसे प्रिय, बेशकीमती मणिहार को उतारकर हनुमान को सौंप दिया। हनुमान जी उस मणिमाला के मनकों को तोड़-तोड़ कर और फोड़ फोड़कर अपने प्रभु और माता को देखने लगे। सभा में उपस्थित कतिपय जन हनुमान के इस कृत्य को देखकर उपहासात्मक ढंग से मुस्करा रहे थे। इस संबंध में प्रत्युत्तर में हनुमान ने बताया कि ‘जिस वस्तुतत्व में सीताराम नहीं विराजते वह चाहे जितनी भी अमूल्य हो मेरे लिए निरर्थक है। इस सत्य-सतत्व को अनदेखा कर लोग मुस्कुराते ही रहे। उनकी इन हरकतों से क्रोधित हो हनुमान अपने वक्षस्थल को फाड़कर जैसे ही उसमें विराजमान रामसीता के युगल विग्रह को दिखाया पूरी सभा आश्चर्यचकित हो उठी और सभी परम भक्त हनुमान तथा सीताराम का जयकारा लगाने लगे। हनुमान की इसी अखण्ड भक्ति और श्रीराम के चरणों में समर्पित अनुराग को देखते हुए भगवान भूतेश्वर शिव ने हनुमान के विषय में पार्वती से प्रशंसा करते हुए कहा है- “हनुमान सम नहि बडभागी। नहि कोउ रामचरन अनुरागी।।” आगे कहते हैं कि उनके इसी भाव को देखकर भगवान राम भी उनकी प्रशंसा करते नहीं अघाते है- “गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई।।” सीता माता का पता लगाकर कुशलक्षेम बताते हुए जब चूडामणि कंगन प्रभु के समक्ष हनुमान ने रखा तो उनके कर्मयोग-संपन्न, सेवा-भक्ति से प्रभु श्रीराम इतने गदगद हो उठे कि सजल आंखों के साथ उनके मुख से बरबस ही निकल पडा – “सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।, सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेऊँ करि विचार मन माहीं।।” 15 अर्थात हे पुत्र ! हमने सभी प्रकार से चिन्तन मनन करके देख लिया कि तुम अतुलनीय हो। ऐसा थी हनुमान की राम के प्रति समर्पित सेवा भक्ति। सर्वार्थी साधक हनुमान एक अप्रतिम भक्त के साथ साथ बलवंत, विवेकवंत, भक्तिवैराग्य ज्ञानवंत भी हैं। साहस तो उनके अंग प्रत्यंग में कूट-कूटकर भरा हुआ हैं। जब लंका के समर में श्रीलक्ष्मण जी की मूर्छा समाप्त होने का नाम नही ले रही थी तब बहुत सारी बातों को सोचते हुए अपने प्रभु श्रीराम के चेहरे की गहरी चिन्ताओं को देखकर हनुमान जी बोले- “पातालतः किमु सुधारसमानयामि निष्पीडय चन्द्रममृतं किमुताहरामि। उद्दण्चण्डकिरणं ननु वारयामि कीनाशपाशमनिशं किमु चूर्णयामि।।” 16 (हनुमान्नाटक 13116) अर्थात् यदि आपकी आज्ञा प्राप्त हो तो यमराज के पाश को चूर-चूर करते हुए, सूर्य को रोककर, चंद्रमा को निचोड़कर अमृतरस ले आऊं चाहे इसके लिए मुझे पाताललोक की ही यात्रा क्यों न करनी पडे। उनकी इस बात को सुनकर भगवान भी प्रलय की आशंका से व्यग्र हो कह उठे – ” परंतु तत्करणादकाले अपि महाप्रलयः स्यात् ‘(हनुमान्नाटक)। हनुमान के पराक्रम को बताने के लिए महाकवि तुलसीदास जी अपने हनुमानबाहुक में महाभारत के महावीर दृढप्रतिज्ञाधारी हस्तिनापुर के राजसिंहासन के संरक्षक पितामह भीष्म के उस कथन का उल्लेख करते हैं जिसमें उन्होंने पवनपुत्र को त्रिकाल में, त्रिलोक में सर्वश्रेष्ठ वीर कहा है भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान/सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो।।’

 

हनुमान जी जितने श्रीराम के प्रिय हैं उतने ही माता सीताजी के लिए भी हृदय से प्रिय हैं। जगत पिता श्रीराम के साथ साथ जगतमाता सीता के चरणों में भी वैसी ही उनकी अनुरक्ति है। जब हनुमान अशोक वाटिका में राक्षसियों से घिरी हुई माता सीता को रावण वध और उनकी मुक्ति की सूचना देने गए तो वहां वह भावातिरेक में विह्वल वाणी की अवरूद्धता के कारण और कुछ कहने में अपने को असमर्थ पाकर केवल ‘माता’ कहते हुए उनके चरणों में लेट गए। उनके सजल नेत्रों और अवरुद्ध कंठ से सीताजी हनुमान के सूचित करने से पूर्व ही उनके आशय अर्थात शुभ समाचार को जान गईं और प्रसन्नता में आकण्ठ निमग्न हो कहने लगीं ‘वत्स हनुमान ! इस संदेश के समान त्रैलोक्य की अन्य कोई वस्तु मुझे सुख नहीं दे सकती। इस अवसर पर तुम्हें मै क्या दूँ, मुझे समझ नहीं आ रहा है। तुमने मेरा अद्भुत उपकार किया है, मैं तुमसे कभी उऋण नहीं हो सकती।’ तब हनुमान बोले -‘माता! मैं शत्रुविनाशक स्वस्थ चित्त से विराजमान विजयी श्रीराम का दर्शन कर रहा हूँ, यह मेरे लिए नाना रत्नराशियों और स्वर्ग से भी बढकर है- रतनौघाद् विविधाद् वापि देवराज्याद् विशिष्यते। “(अध्यात्म रामायण) मेरी कामना है कि मैं आपके साथ परमप्रभु के चरणों की छाँव में पडा रहूँ, आपकी सेवा का अवसर प्राप्त होता रहे, बस, यही मेरी लालसा है।” केसरीनंदन की श्रद्धा-भक्ति से परिपूर्ण विनीत वाणी को सुनकर वैदेही कह उठी ‘शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा। ऊहापोहो अर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः ।।’ अर्थात् हे वीरवर तुम्हारी वाणी तो उत्तम लक्षणों से संपन्न, माधुर्य गुण से भूषित तथा बुद्धि के अष्ट अंगों से विभूषित है। ऐसी वाणी तुम्हारे अलावा कोई नहीं बोल सकता। “अति लक्षणसंपन्नं माधुर्यगुणभूषणम्। बुद्धया हृष्टांगया युक्तं त्वमेवार्हसि भाषितुम ।। वाघनीयो अनिलस्य त्वंसुतः परमधार्मिकः। बलं शौर्यं श्रुतं सत्त्वं विक्रमो दाध्यमुत्तमम् ।। तेजः क्षमा धृतिः स्थैर्य विनीतत्वं न संशयः। एते चान्ये च बहवो गुणास्त्वय्येव शोभनाः ।। “7 तुम वायुदेवता के प्रशंसनीय पुत्र तथा धर्मात्मा हो। शारीरिक बल, शूरता, शास्त्रज्ञान, मानसिक बल, पराक्रम, उत्तम दक्षता, तेज, क्षमा, धैर्य, स्थिरता, विनय तथा बहुत से सुन्दर गुण केवल तुम्हीं में एक साथ विद्यमान हैं, इसमें संशय नहीं है।

 

इस प्रकार हम देखते हैं कि रामकथा के हनुमान ऐसे चरित्र हैं जिनकी सनातन साहित्य, वेद-पुराण में विभिन्न रूपों में सर्वाधिक वर्णन मिलता हैं और सबमें जो समानता दिखाई देती है वह यह कि इनके बल-बुद्धि, विद्या, शौर्य पराक्रम, ज्ञान-विज्ञान का विशद वर्णन और इनमें आराध्य पिता श्रीराम और माता सीता के प्रति समर्पित सेवा भक्तिभाव की पराकाष्ठा ही दिखाई देती हैं। केसरीनंदन संकटमोचक, बजरंगबली हनुमान को अखिल ब्रह्माण्ड के नियन्ता, अधिश्वर श्रीराम के द्वारा यह वरदान स्वरूप दिया गया आशीर्वाद- “यत्र यत्र रघुनाथ कीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकांजलिम्। वाष्पवारिपरिपूर्णालोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम् ।। ” 18 युगों-युगों से फलित होता आ रहा है, वर्तमान में भी हो रहा है और आगे भविष्य में भी पंचतत्व की जब तक सत्ता-महत्ता-विद्यमानता रहेगी तब तक होता रहेगा।

 

लेखक – डॉ. जयशंकर
निवास- 6/120, विनीत खण्ड, गोमती नगरलखनऊ,
संपर्क सूत्र- 6394192621

 

संदर्भ सूची-

 

1. पृ. 18 कल्याण हनुमान-अंक संख्या-1 गीता प्रेस गोरखपुर
2. लोक सं. उपृ. सं. 615 सुन्दरकाण्ड, रामचरितमानस
3. लोक सं. 52,46 नवम सर्ग पृ. सं. 883-882 सुन्दरकाण्ड, वाल्मिकी रामायण
4. पृ. सं. 22 कल्याण हनुमान अंक सं-1 जनवरी 1975 गीता प्रेस गोरखपुर
5. श्लोक सं-356 सुन्दरकाण्ड रामायण मंजरी-महाकवि क्षेमेन्द्र कृत
6. पृ. सं-59 श्रीतत्वनिधि, कृष्णराज वोडेयर कृत
7. श्लोक सं-128 पृ. सं-677 प्रथम सर्ग किष्किन्धाकाण्ड वाल्मीकि रामायण
8. चौ. 3 सोरठा 1,2 पृ. सं. 586 किष्किंधाकांड, रामचरितमानस
9. श्लोक सं. 28,29 पृ. सं. 681 तृतीय सर्ग किष्किन्धाकाण्ड वाल्मीकि रामायण
10. चौ. सं. 3 दोहा 21 किष्किन्धाकाण्ड, रामचरितमानस
11. चौ. 4 दोहा-15 पृ. सं. 629 सुन्दरकाण्ड, रामचरितमानस
12. चौ. 3,4 दोहा-31पृ. सं. 641 सुंदरकांड रामचरितमानस
13. पृ. सं-225 कल्याण हनुमान अंक जनवरी 1975 गीताप्रेस गोरखपुर
14. श्लोक सं-26-28 सर्ग-113पृ. सं-1408-9 युद्धकाण्ड वाल्मीकि रामायण

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