ढोंगी बाबाओं की जमात में एक और नाम अशोक खरात
अनिल तिवारी
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हमारे देश में इन दिनों ज्ञान परंपरा का उत्सव चल रहा है। अच्छे-बुरे, राजा-प्रजा संत-असंत सभी अपनी-अपनी ज्ञान गंगा में गोता लगा रहे हैं। राजा नाले से गैस पैदा करने और राडार से बचने का ज्ञान दे रहा है तो प्रजा ईंधन की कमी से निपटने के लिए मीम बनाकर ज्ञान बांट रही है कि ‘गोबर केवल खाने के ही नहीं, जलाने के काम भी आता है’। छोटे-बड़े मठों ,आश्रमो, गुरुकुल से लेकर बड़े-बड़े शिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालयों में आए दिन भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा-परिचर्चा आयोजित की जा रही है। ऐसी चर्चाओं में एक ही जाति-प्रजाति के कुछ चुनिंदा स्वयंभू विद्वान लोग रटी रटाई बातें बघारते हुए पाए जाते हैं। प्रतिक्षण बदलती देश, काल, परिस्थिति से इतर प्राचीन वैभव पुरानी विरासत को याद करते हुए उसे फिर से हासिल करने के सपने बोये जाते हैं पर प्राचीन ज्ञान का लबादा ओढ़े उग आते हैं ढोंगी ठग। ऐसे आयोजनों से एक राज्य के रूप में नागरिकों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ के सवाल को हम कुछ देर के लिए नजरअंदाज भी कर दें, लेकिन अंध ज्ञान से विकृत हो रही समाज व्यवस्था से कोई अछूता कैसे रह सकता है। ठीक ठीक कहें तो नतीजा सबके सामने है। आसाराम, राम रहीम, रामपाल, राधा मां की कड़ी में महाराष्ट्र का अशोक खरात ऐसे ही अद्भुत अंध ज्ञान का एक नया संस्करण है।
खरात बताता है कि वह नेवी में अधिकारी था। प्राचीन ज्योतिष का मर्मज्ञ है, राशि के हिसाब से ग्रह नक्षत्र का मिलान करता है। अंक शास्त्र का भी उसे अलौकिक ज्ञान है। अपने इसी चुटपुटिया ज्ञान के जरिए वह चुटकी में परिणाम का दावा करते हुए मोटी रकम वसूलता है। ताज्जुब तो यह है कि अपनी मनचाही इच्छाओं की पूर्ति के लिए औरतें लहा-लोट हैं, वही समाज के सम्भ्रांत बड़े लोग इसके प्राचीन ज्ञान के झांसे में आकर उठाने गिराने के खेल में शामिल रहे हैं। खरात पर आरोप है कि रत्न-आभूषणों के पारखी लोगों को भी इसने अपने प्राचीन ज्ञान के सहारे इमली के बीजों को बेशकीमती हीरा जवाहरात बताकर ऊंचे दाम पर चेंपता रहा है। हमारे यहां कहावत है लालचियों के देश में ठगों को किसी चीज की कमी नहीं होती, लेकिन यहां मामले में उसके प्राचीन शास्त्रीय ज्ञान का पुट भी है।
मोटे तौर पर भारत में बाबाओं की जड़ें अंधश्रद्धा में हैं जिसका वे बहुत कुटिलता से इस्तेमाल करते हैं और आम लोगों का शोषण कर धन-संपदा और औरतें हासिल करते हैं। आसाराम बलात्कार के मामले में सजा काट रहे हैं। राम रहीम हत्या और दुष्कर्म के दोषी पाये गए हैं और जेल में हैं। इन दोनों के राजनीतिक रसूख हैं इसलिए इनके पेरोल मिलने की खबरें आती रहती हैं। ये दोनों वर्तमान दौर के शीर्ष बाबाओं में शामिल हैं। इनके पास ढेर सारी धन-संपदा है, महंगी मोटरगाड़ियां हैं, कई आश्रम हैं और श्रद्धालुओं की बड़ी फौज है जो उनके लिए कुछ भी करने को तैयार रहती है। इनके जैसे कई और बाबा पूरे देश में हैं जो पवित्रता का चोला ओढ़े अत्यंत घृणित काम करते हैं। इन बाबाओं की संख्या में बहुत बढ़ोत्तरी हुई है। अंधी आस्था के नाम पर बाबाओं के बढ़ रहे बोल बाला से कई बार यह सवाल खड़ा होता है कि क्या ज्ञान और तार्किकता की विदाई हो रही है?
महाराष्ट्र के नासिक से अशोक कुमार खरात नाम के एक व्यक्ति को लोगों के आस्था का दुरूपयोग कर छल-कपट करने के आरोप में पुलिस ने हिरासत में लिया। महाराष्ट्र की बहुत सी बड़ी-बड़ी हस्तियां उसके पास आती थीं और महाराष्ट्र महिला आयोग की प्रमुख रूपाली भी उसकी अनुयायी थीं। रुपाली का इस धोखेबाज के साथ एक वीडियो सामने आया है जिसमें वे उसके पैर धो रही हैं और उसे धूप से बचाने के लिए छाता लगा रही हैं।
खरात का दावा है कि उसे दैवीय शक्तियां प्राप्त हैं। वह ज्योतिषी और अंकशास्त्री होने का नाटक करता था। कई मंत्री और बड़े-बड़े लोग उसके पास आते थे। वह इमली के पालिश किए हुए बीजों को बहुमूल्य रत्न बताकर बेचने के अलावा बहुत से ऐसे काम करता था जिनसे उसे बहुत कमाई होती थी। शुरू में उसकी शिकार हुई बहुत सी महिलाएं इसलिए चुप रहीं क्योंकि उसके बड़े-बड़े लोगों से नजदीकी ताल्लुकात थे। इस प्रकार आम लोगों की अज्ञानता, भय और चुप्पी के कारण एक और गंदे बाबा की वृद्धि हो गई।
पहले भी चन्द्रास्वामी, धीरेन्द्र ब्रम्हचारी, आचार्य रजनीश और महेश योगी जैसे बहुत से धर्मगुरू हो चुके हैं जिनकी समाज के धार्मिक एवं राजनैतिक परिदृश्य में सशक्त मौजूदगी थी। साईं बाबा का भी बोलबाला रहा जो ऊंगलियां नचाकर राख प्रकट करने जैसे जादू दिखाया करते थे। उनकी दैवीय शक्ति केवल राख और छोटी-छोटी अंगूठियां प्रकट करने तक सीमित थी और उन्होंने इस जादू के जरिए तरबूज प्रकट करने से इंकार कर दिया था। उनसे जुड़े यौन शोषण के मामले भी सामने आए थे। मां अमृतानंदमयी भी दैवीय शक्तियों के लिए प्रसिद्ध रहीं। उन्हें किसिंग अम्मा भी कहा जाता था। राधा मां की अलग-अलग मुद्राओं की फीस उनके भक्तों ने खूब भरी है। निर्मल बाबा, बाल्टी बाबा, लोटा बाबा, छोटका बाबा, बड़का बाबा, खीर बाबा, मलाई बाबा सतुआ बाबा, और बहुत तरह बंगाली बाबा भी बाज़ार में हैं जो चुटकियों में सभी की तरह-तरह की समस्याएं हल करने का दावा करते हैं।
इतना ही नहीं, इन दिनों जग्गी वासुदेव और बाबा रामदेव जैसे बाबा भी सक्रिय हैं। वासुदेव ने ‘इनर इंजीनियरिंग‘ जैसा चमत्कारी शब्द गढ़ा है। आईटी क्षेत्र में भी उनके अनुयायी हैं। श्रीश्री रविशंकर का अपना अलग तरह का राजनैतिक दबदबा है। बाबाओं की सूची काफी लंबी और लगभग अनंत है। लेकिन हम बाबा रामदेव को नजरअंदाज नहीं कर सकते जिन्होंने योग गुरू के रूप में शुरूआत की और बाद में अत्यंत सफल व्यापारी बन गए। उन्होंने वादा किया था कि यदि सरकार बदलती है तो पेट्रोल सस्ता (35 रू लीटर) हो जाएगा और रूपया डालर के मुकाबले मजबूत हो जाएगा। समय के साथ पता चला कि सब व्यापार बढ़ाने के नुस्खे हैं।
यह साफ-साफ नजर आ रहा है कि समाज में आर्थिक असुरक्षा और असमानता बढ़ रही है और लोगों की आस्था से खेलने वाले बाबाओं की पकड़ आसमान छू रही है। इसके साथ ही समाज में आस्था-आधारित ज्ञान और विश्वास भी बढ़ रहा है। काल्पनिक पौराणिक कथाओं को तर्क और विवेक पर तरजीह देने की यह प्रवृत्ति भारत जैसे विकासशील देश के लिए ठीक नहीं है।
आजादी के बाद भारत में विज्ञान और तर्क पर आधारित चिंतन की नींव रखी गई थी। उत्कृष्ट संस्थानों की एक श्रृंखला स्थापित हुई जिसने देश के विकास में बहुमूल्य योगदान दिया। मगर इस संदर्भ में पिछले कुछ दशकों का घटनाक्रम अत्यंत निराशाजनक है। स्वयं प्रधानमंत्री ने पौराणिक कथाओं को विज्ञान का दर्जा देने की शुरुआत की। एक आधुनिक अस्पताल का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जन रहा होगा जिसने मनुष्य के धड़ पर हाथी का सिर प्रत्यारोपित किया। दूसरे ग्रहों तक जाने की क्षमता रखने वाले पुष्पक विमान के बारे में हम जानते ही थे। ऐसे कई नेता हैं जिन्होंने यह दावा किया है कि अनुवांशिकी विज्ञान, अंतरिक्ष यान और इंटरनेट ये सब प्राचीन भारत में थे।
आज जिस तरह से पौराणिक कथाओं को गंभीरता से लिया जा रहा है, उनमें में लिखी बातों पर विश्वास करते हुए शोध कार्य को प्रोत्साहित किया जा रहा है इस पर हमारे संतुलनकारों को एक बार ठहर कर सोचना चाहिए। जब से देश में घरेलू ईंधन का संकट बढ़ा है एक मीम तेजी से वायरल हुआ है की गोबर खाने के लिए नहीं जलाने के लिए है। इसमें कोई दो राय नहीं की महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथ हमारे समाज के लिए सदैव उपयोगी है। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि कुपोषण और संक्रामक बीमारियों से लड़ने को तरजीह मिलनी ही चाहिए। अच्छे शिक्षकों के अभाव में हमारी प्राथमिक शिक्षा बिगड़ रही है। धन के कारण राज्यों में सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं ऐसे में सरकार द्वारा पंचगव्य के शोध पर धन का व्यय अपव्यय ही होगा। आस्था आधारित ऐसी ही सोच के कारण देश में खरात जैसे ढोंगी बाबाओ का विस्तार हो रहा है।
प्रधानमंत्री बागेश्वर धाम बाबा को अपना छोटा भाई कहते हैं। यह बाबा किसी भी व्यक्ति का अतीत जानने की आध्यात्मिक और रहस्यमयी शक्ति से संपन्न होने का दावा करता है। क्या इसी तरह नई पीढ़ी को भारतीय ज्ञान प्रणाली की घुट्टी पिलाई जा रही है।
प्राचीन काल के भारत ने तत्कालीन परिस्थितियों के हिसाब से निश्चय ही तर्कपूर्ण विचारों के क्षेत्र में बहुत योगदान दिया होगा, तभी तो हमारा देश 5000 साल की यात्रा करते हुए यहां तक पहुंच पाया है। इसलिए भी अब आज के हिसाब से सच और झूठ को अलग करना जरूरी है ताकि आने वाला कल और अधिक समृद्ध हो।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 (क)(ज) (जिसे 1976 में 42वें संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया) में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद, ज्ञानार्जन और सुधार की भावना को बढ़ावा देने को प्रत्येक नागरिक का मूलभूत कर्तव्य बताया गया है। यह जीवन के प्रति एक तर्कसंगत साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है ताकि अंधविश्वासों से उबरा जा सके और सामजिक विकास हो सके।
लेकिन हमारी दिशा विपरीत हो गई है। हमारी शिक्षा व्यवस्था प्राचीन ज्ञान परंपरा की तलाश करते हुए अंधविश्वास की ओर बढ़ने लगी है। हम मूल रूप से प्रेम, विश्वास, श्रद्धा और अच्छे के प्रति आस्था रखने वाला समाज है। लोकतांत्रिक देश के लिए अंधी-आस्था ढोंगी खरात की तरह ही नया उत्पाद है। किसी भी रूप में अंधविश्वास को प्रोत्साहन देना भावी पीढ़ी के लिए हानिकारक ही होगा।

2 Comments
जय सेवा जोहार! 🙏
माननीय महोदय,
बहुत बढ़िया लेख। बहुत-बहुत बधाई! मगर यह बधाई सिर्फ़ इसलिए नहीं कि आपने ‘अशोक खरात’ जैसे बाबाओं के ऊपर इतना दमदार लेख लिखा है, बल्कि यह बधाई इसलिए भी है कि आपने ‘कलरव’ को डिजिटल बना दिया है।
’अशोक खरात’ जैसे ढोंगियों का क्या? ऐसे ढोंगी तो यहाँ वैदिक युग से अपने कारनामे करते आ रहे हैं और आगे भी तब तक करते रहेंगे, जब तक पढ़े-लिखे मूर्ख भारत की धरती पर रेंगते रहेंगे।
एक बार पुनः बहुत-बहुत बधाई!
जय जोहार! 🙏
– नथून शाह गोंड
@dreamgotul
P.T.M. a good story by Gaury