अनिल तिवारी
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प्रधानमंत्री ने पिछले दो दिनों में देश की जनता को लगातार दो बार खरीदारी से परहेज करने और खर्चे में कटौती करने की सलाह दी हैं। खाड़ी के देशों में युद्ध के हालात को देखते हुए प्रधानमंत्री ने देश से पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, खाद्य तेल, इलेक्ट्रॉनिक समान और सोने की खरीदारी पर संयम बरतने की अपील की है। उन्होंने देश-विदेश घूमने के लगातार बढ़ते ट्रेंड पर भी लगाम लगाने की इच्छा व्यक्त की है।
आमतौर पर सरकारें इस तरह की अपील खराब हालत हो जाने पर और अधिक पैनिक होने से बचने के लिए करती हैं। तो क्या दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के पायदान से फिसल कर छठवें स्थान पर पहुंचे भारत की वित्तीय स्थिति नाजुक है? क्या भारत के खजाने का आकार कम हो गया है अथवा आपदा को अवसर में बदलने के लिए संयम और परहेज का टोटका आजमाने वाली बात है? पक्ष के लोग इसे पूर्व की तैयारी बता रहे हैं जबकि विपक्ष इसे आर्थिक और कूटनीतिक नादानी की संज्ञा दे रहा है। लोग यह भी कह रहे हैं कि हुगली नदी मे नौकायन का लुत्फ लेकर लौटे प्रधानमंत्री नागरिकों को पर्यटन से परहेज का पाठ पढ़कर खुद कई देशों की यात्रा पर जल्दी ही फुर्र होने वाले हैं।
पहले से ही रसोई गैस की किल्लत और महंगाई का दंश झेल रही आमजनता पेशोपेश में है। नोटबंदी पर 50 दिन मुंह सील लेने, रसोई गैस सिलेंडर पर मिल रही सब्सिडी छोड़ने, करोना महामारी को भगाने के लिए मोबाइल का टॉर्च जलाने, ताली थाली पीटने, और राम आएंगे की खुशी में घर के मुंडेर पर पांच दिया जलाने की परीक्षा में खरी उतरी भारतीय जनता को अब खरीदारी से परहेज का टास्क मिला है, जनता मानसिक रूप से तैयारी कर रही है। यानी जनता की एक अग्नि परीक्षा और।
मालूम हो कि ईरान बनाम अमेरिका-इजरायल का युद्ध अब टीवी डिबेट बाहर निकलकर भारत के आम लोगों की रसोई, खेत, पेट्रोल पंप और बैंक बैलेंस तक पहुंच रहा है। पिछले दो महीने में ही व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कीमत में लगभग ₹1000 की वृद्धि हो चुकी है। किसी भी समय पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने की आशंका जताई जा रही है। खाद्य तेल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं।
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार गिरावट पर है। युद्ध शुरू होने के पहले फरवरी में यह रिकॉर्ड 728 डॉलर तक पहुंच गया था जो की अब घटकर 690 अरब डॉलर ही बचा है। रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक मई के पहले हफ्ते में ही रिजर्व लगभग 8 अरब डॉलर घटा है। यानी दबाव के संकेत दिखने लगे हैं। सरकार को वैश्विक अनिश्चितता, मंहगे आयात या डॉलर पर दबाव की चिंता है इसीलिए प्रधानमंत्री ने जिन वस्तुओं पर विदेशी मुद्रा ज्यादा खर्च होते हैं उन वस्तुओं की खरीदारी में कटौती करने की अपील की है।
भारत का सालाना तेल आयात बिल 150 अरब डॉलर तक पहुंचता है। अगर कच्चे तेल की कीमतें युद्ध के कारण बढ़ती रही तो यह आयात बिल को और अधिक बढ़ा सकता है। भारत अपनी जरूरत का 85% क्रुड आयल विदेश से खरीदता है। अगर $10 प्रति बैरल की भी बढ़ोतरी होती है तो आयत का बिल 15 अरब डालर तक बढ़ने की संभावना रहती है। महंगे तेल का असर सिर्फ कार चलाने तक सीमित नहीं रहता, उसके कारण सब कुछ महंगा हो जाता है।
इसी तरह भारत प्रतिवर्ष करीब 700 से 800 टन सोना आयात करता है। सरकार को तेल के बाद सबसे ज्यादा आयात बिल सोने का ही देना पड़ता है। आज देश में हर आदमी बैंक से ज्यादा सोना पर भरोसा करता हैं, यही कारण है कि पारंपरिक शादी विवाह के अलावा भी सोने की खरीदारी बड़े पैमाने पर होती है। खुद भारतीय रिजर्व बैंक भी लगातार सोना खरीद रहा है। मार्च 2026 तक रिजर्व बैंक के पास 880 तन गोल सोना रिजर्व था जिसकी कीमत 113 अरब डॉलर से अधिक आंकी गई है।
भारत हर साल लगभग डेढ़ करोड़ टन खाद्य तेल इंडोनेशिया और मलेशिया से मांगता है। इसी तरह खेती के लिए खाद का आयात भी करना पड़ता है भारत अपनी पोटाश की जरूरत का 100% आयात करता है। आजकल पर्यटन का भी चलन बढ़ा है। थाईलैंड दुबई सिंगापुर यूरोप और अमेरिका की यात्रा भारतीयों के लिए आकर्षक हुई है। इन पर भी विदेशी मुद्रा का खर्च होता है। प्रधानमंत्री ने खर्चे में कटौती का आह्वान किया है।
भारत के पास पूर्व के दो संकटों का अनुभव है। पहला,वर्ष 1991 में देश के पास सिर्फ दो हफ्ते का आयात कवर बचा था तब भारत को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा था। और दूसरा, अमेरिका ने जब गेहूं देने से इनकार कर दिया था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश के लोगों से एक वक्त उपवास रखने की अपील की थी।
आज वैश्वीकरण का दौर है। इस दौर का प्रचलित व्यवसायिक मुहावरा है “खर्च बढ़ाने से आमदनी बढ़ती है”। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मार्टिन एल बेंजामिन भी आमदनी बढ़ाने के लिए लाभ को लूटाने की वकालत करते हैं। विकास की रफ्तार, जीडीपी की ग्रोथ को ऊंचाई देने के लिए खर्च को बढ़ाने की बात प्रमुखता से की जाती है।
अब जबकि संकट दिखने लगा है तो खर्चे में कटौती की बात की जा रही है। हमारे लिए यह कोई नई बात नहीं है। भारतीय चित्ति हमेशा से”खर्चे में कटौती को ही आमदनी मनाती रही है”। हमारा समाज पीढ़ी दर पीढ़ी पारंपरिक रूप से चादर के हिसाब से पैर फैलाने का आदी रहा है। कर्ज लेकर घी पीने को पाप समझा जाता था।
पांच राज्यों के चुनाव से निपटने के बाद प्रधानमंत्री ने देश की जनता को जो त्याग का मंत्र दिया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि हर बार की तरह इस बार भी जनता उसे सिर माथे पर लेगी तथा सरकार के साथ दृढ़ता से खड़ी होगी।
लेकिन कितना अच्छा होता कि इसकी शुरुआत ऊपर से होती। बड़े नेताओं अधिकारियों की गैर जरूरी यात्राओं में कटौती होती तो उसका सीधा असर नीचे तक पहुंचता। गांधी जी भी मानते थे की जो काम वह खुद नहीं कर सकते, उसे करने के लिए वह अन्य से अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? दूसरे से खर्चे पर संयम बरतने और कटौती करने की अपेक्षा रखने वाले क्या खुद के जीवन में इसका पालन करेंगे?
