अनिल तिवारी
महंगाई अपना पैर पसारने लगी है। खुदरा और थोक दोनों स्तर पर महंगाई रिकॉर्ड ऊंचाई की ओर जा रही है। थोक महंगाई 3.8 से उठकर अब 8.6 का आंकड़ा छू चुकी है। जैसे-तैसे रोज कमाने खाने वाले तो पहले से ही परेशान रहे हैं, हालिया बढ़ोतरी से उनकी सांसे अटकी हुई है, खाते पीते मध्य वर्ग के पेशानी पर भी बल पड़ने लगा है। महंगाई के चारों तरफ से जकड़ने का सिलसिला अगर आगे भी बना रहता है तो उनके भी कस-बल ढीले होने वाले हैं जो अब तक सरकार की आर्थिक नीतियों का समर्थन करते रहे हैं।
खाड़ी युद्ध के कारण दुनिया भर में चीजों के दाम बढ़े हैं। सभी देश हालात से निपटने और अपने नागरिकों में आपूर्ति व्यवस्था को बनाए रखने के लिए इंतजाम भी कर रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री देश की जनता से खरीदारी और पर्यटन पर संयम बरतने की अपील कर खुद विदेश की यात्रा पर है। नीदरलैंड की धरती से उन्होंने भविष्यवाणी की है की यह दशक आपदा का दशक है आगे और भी कठिनाई आ सकती है। बहुत हुई महंगाई की मार का नारा देकर गत 12 वर्षों से केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी के अगुआ रसोई गैस, खाने का तेल और डीजल-पेट्रोल के उपयोग पर लगाम लगाने का मंत्र उपयोगी बता रहे हैं। उत्साही अनुसांगिक संगठन के कार्यकर्ता, तेल गया तेल लेने का जयकारा लगाते हुए बिना तेल के पुड़ी सब्जी बनाने के नए-नए नुस्खे का रील बनाकर सोशल मीडिया पर परोस रहे हैं। ऐसे ही एक उत्साही कार्यकर्ता है सोमदत्त जी। वे भी वीडियो में तेल खाने के नुकसान गिना रहे हैं। जबकि उनका बेटा कल ही खाद्य तेल का 5 किलो का डिब्बा पहले से डेढ़ गुना अधिक कीमत देकर खरीद कर लाया है।
कुछ दिन पहले तक भारत को बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए त्याग और आर्थिक समर्पण का ढिंढोरा पीटने वालों में शामिल लोग भी बीती रात से डीजल पेट्रोल का दाम बढ़ने के बाद से ठंडे पड़ गए हैं । सोशल मीडिया पर उनके रील्स की रफ्तार घट गई है। सरकार ने डीजल और पेट्रोल की कीमतों में तीन रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। उन्हें यह लगने लगा है कि यह बढ़ोतरी केवल डीजल और पेट्रोल के दम तक सीमित नहीं है। आने वाले दिनों में रोजाना प्रयोग आने वाली चीजों से लेकर घरों के मासिक खर्चे पर भी भारी बोझ बढ़ने वाला है, जिसका असर रोजमर्रा की सेवाओं पर भी दिखाई देगा।
तेजी से बिकने वाले उपभोक्ता उत्पाद की बड़ी कंपनियों ने पहले ही लागत के दबाव को लेकर चिंता जताना शुरू कर दिया है। बिस्किट, स्नैक्स, नूडल्स, खाद्य तेल, पैकेट बंद फूड और पेय पदार्थ जैसे उत्पाद लॉजिस्टिक नेटवर्क पर बहुत अधिक निर्भर करते हैं। इनका ऑपरेशन मूल्य का 6 से 10% हिस्सा लॉजिस्टिक में खर्च होता है इसलिए डीजल-पेट्रोल की ऊंची कीमतें खर्चों को बढ़ा देती हैं इसलिए जाहिर है कि उनके दाम भी कभी भी किसी भी क्षण बढ़ाई जा सकते हैं।
दूध की कीमतों में पहले से ही लागत बढ़ोतरी के संकेत मिलते रहे हैं इधर अमूल और मदर डेयरी में दूध की कीमतों में दो रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी है जिसका करण परिवहन और परिचालन खर्चों में बढ़ोतरी बताया गया है अब दूध के दाम बढ़ने से दूध से बनने वाले उत्पाद दही, मक्खन, पनीर, चीज और आइसक्रीम के दाम में भी जल्दी ही वृद्धि देखने को मिल सकती है।
भारत में खाद्य आपूर्ति चेन काफी हद तक सड़क परिवहन पर निर्भर करती है। सब्जियां फल अनाज दाल पैकेट बंद फूड एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में खर्चा बढ़ जाता है। ऐसे में डीजल की बढ़ती लागत से माल ढुलाई शुल्क में भी वृद्धि होगी जिसे ग्राहकों पर डाल दिया जाएगा। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊपर उठी रहती है तो रसोई के बजट पर महंगाई का दबाव और अधिक बढ़ जाएगा।
महंगाई का बुरा असर देश के किसानों पर भी पड़ेगा क्योंकि किसान मुख्य रूप से डीजल से चलने वाले उपकरणों पर निर्भर रहते हैं ट्रैक्टर सिंचाई पंप कटाई मशीन डीजल की बढ़ती लागत के कारण मांगे हो जाएंगे। किसान को खेत से अपना सामान बाजार तक पहुंचाने की भी लागत बढ़ जाएगी। तेल की महंगाई का सीधा असर ग्रामीण परिवारों पर पड़ने वाला है।
कोरियर कंपनियों और ऑनलाइन शॉपिंग कंपनियों का लॉजिस्टिक भी महंगा हो जाएगा फ्यूल की बढ़ती कीमत आखिरी मिल की डिलीवरी का खर्च बढ़ा देगी इस बढ़ोतरी से डिलीवरी शुल्क में बढ़ोतरी छठ की कमी और मिनिमम ऑर्डर प्राइस में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ गई है।
तेल के दाम बढ़ने से परिवहन लागत में वृद्धि के साथ-साथ साबुन शैंपू डिटर्जेंट सहित तमाम तरह के घरेलू चीजों के दाम बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। कुल मिलाकर महंगाई इस समय अपना उग्र रूप दिखाना शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री खुद वर्तमान समय को आपदा का दशक बता रहे हैं। सरकार के संतुलनकार लोग पहले से ही कटौती में जी रहे लोगों को और अधिक संयम बरतने और कम पर गुजारा करने की राय दे रहे हैं। आम जनता महंगाई के भविष्य को लेकर भयभीत है। महंगाई की मार से बचाकर अच्छा दिन लाने वाले अर्थशास्त्री भी अब अंदर खाने यह मानने लगे हैं की जनता के महंगे दिन आ गए हैं।
