अनिल तिवारी
देर आए, दुरुस्त आए। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पहली बार परीक्षा प्रणाली की गड़बड़ियों के लिए खुद को जिम्मेवार बताते हुए दोषी लोगों पर शीघ्र कार्रवाई का आश्वासन दिया है। हालांकि केंद्रीय मंत्री ने सीबीएसई मामलों के संदर्भ में अपनी जिम्मेवारी स्वीकारी है, लेकिन सवाल तो हर परीक्षा को लेकर उठते रहे हैं।
शिक्षा से जुड़े मुद्दे भावनात्मक और राजनीतिक असर डालते हैं। पहले से ही नौकरी की कमी, बढ़ती प्रतियोगिता और कैरियर की अनिश्चित़ा ने युवाओं में असुरक्षा बढ़ाई है। नीट यूजी की परीक्षा रद्द होने के बाद देश की परीक्षा प्रणाली कटघरे में है। हालांकि सरकार डैमेज कंट्रोल के लिए तमाम एहतियाती कदम उठा रही है। सरकार ने जल्दी से जल्दी परीक्षा की नई तारीख घोषित करने, आवेदन शुल्क लौटने और परीक्षा में बैठने वाले छात्रों को पसंदीदा शहर में केंद्र चुनने का विकल्प दिया है। ऐसे कदमों से सरकार यह बताना चाहती है कि वह छात्रों की परेशानी समझता है और समाधान के लिए भी गंभीर प्रयास कर रही है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि छात्रों का भरोसा कैसे लौटे?
मालूम हो कि पिछले 7 वर्षों में यानी वर्ष 2019 से लेकर 15 मई 2026 तक भारत में विभिन्न स्तरीय प्रतियोगी लगभग 70 परीक्षाओं के पेपर लीक हुए। आज तक किसी मामले की जांच पूरी नहीं हुई और ना ही किसी मामले में न्याय हुआ। प्रत्येक मामलों में छोटे स्तर के कर्मचारी पकड़े गए जिन्हें कुछ महीनो बाद जमानत मिल गई। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्यों नहीं दाखिला परीक्षा करने वाली एनटीए को उनकी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया जाए? एनटीए पर यह भी आरोप है कि वह पुराने तौर तरीकों को अभी भी अपनाती है, वह अपने पुराने सिस्टम में कोई सुधार नहीं करती। इंटरनेट कंप्यूटर और एआई के जमाने में भी प्रश्न पत्र मुद्रित करके परीक्षा केदो तक पहुंचाने में विश्वास करती है। अगर हर हाल में ऐसा ही करना है तो क्यों नहीं प्रश्न पत्रों के अलग-अलग सेट तैयार करके अलग-अलग केदो को भेजा जाए, ताकि कभी इस तरह का हादसा होने पर पूरी परीक्षा रद्द न करनी पड़े। कोई अनहोनी होने पर केवल चिन्हित केदो पर ही दोबारा परीक्षा कराई जाए।
एनटीए का गठन 2017 में हुआ था। तब से लेकर आज तक इस संस्था की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में रही। 5 में 2024 को भी जब इसी नीट परीक्षा में गड़बड़ झाला हुआ तो मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। तब संस्था ने भविष्य में इस तरह की गलती दोबारा न करने का आश्वासन न सिर्फ अदालत को बल्कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को भी भरोसा दिया था। आलम यह है कि 2 साल बीतते बीतते उससे भी बड़ा कांड उजागर हो गया। पिछली दफा एजेंसी ने कई छात्रों को पूरे पूरे 720 नंबर दे डाले थे जबकि वे छात्र पढ़ने में सामान्य से भी कमजोर थे। इस बार तो देश के विभिन्न शहरों में प्रश्नपत्र घूमते रहे। वाजिब खरीदार खोजते रहे।
एनटीए ने अपने पहले सफाई में कहा है कि प्रश्न पत्र प्रिंटिंग प्रेस से लीक हुए जबकि सभी जानते हैं, जहां पेपरो की छपाई होती है वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता। वह बेहद गुप्त स्थान होता है और वहां कर्मचारियों को फोन रखने तक की इजाजत नहीं होती। तो जाहिर सी बात है कि इस तरह के कांड में पूरा का पूरा सिंडिकेट शामिल होता है। अब समय आ गया है कि सरकार इस तरह के गिरोह का पर्दाफाश करें तथा उन्हें कड़ी सजा दे ताकि भविष्य में छात्रों के साथ फिर ऐसा कोई खिलवाड़ ना हो।
इस पूरे प्रकरण में विपक्ष को बैठे बिठाये एक मुद्दा हाथ लग गया है। इसके बहाने विपक्ष सरकार को लगातार घेर रहा है तथा सरकार की पूरा शिक्षा पद्धति पर सवालिया निशान खड़ा कर रहा है। इस बार 12वीं की कॉपियों की जांच में अपनाई गई ऑन स्क्रीन मार्किंग पद्धति भी सवालों के घेरे में है। इसके अलावा एनसीईआरटी की किताबों से जुड़े विवाद, विश्वविद्यालय में जातिगत भेदभाव को रोकने वाले नए नियमों पर रोक और शिक्षा नीति से जुड़े कुछ अन्य फैसले भी सरकार के लिए शुभ नहीं रहे। विपक्ष और अनेक शिक्षाविद लगातार निशाना साधते रहे हैं।
ऐसे में सिर्फ परीक्षा की नई तारीख घोषित करने और फीस लौटाने से विश्वास की बहाली पूरी तरह से संभव नहीं है। सरकार को पेपर लीक, तकनीकी गड़बड़ी, मूल्यांकन विभाग और प्रशासनिक लापरवाही पर ठोस कार्रवाई के साथ आगे आने होगा। शिक्षा व्यवस्था में लगे घुन को खत्म करने के लिए पारदर्शिता बढ़ानी होगी जवाबदेही तय करनी होगी। सरकार को आगे जाकर हस्तक्षेप करना ही होगा क्योंकि लंबी चुप्पी से बात नहीं बनेगी। छात्र और उनके अभिभावक सिर्फ सरकार से उम्मीद रखते हैं, उनकी उम्मीदें ना टूटे इसका ख्याल सरकार को रखना ही होगा क्योंकि एक बार भरोसा अगर टूट जाए तो उसे वापस लाना किसी के लिए भी कठिन काम होता है।
