शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के अभाव में अक्सर लोग कई प्रकार की बीमारियों का शिकार हो जाया करते हैं। इतना ही नहीं, कई बार यह भी देखने में आता है कि बिना जाने-समझे किसी बीमारी का कुछ भी उपचार करने लगने से स्वास्थ्य संबंधी कई नई समस्याएं आ खड़ी होती हैं। इसीलिए यह कहा जाता है कि नीम हकीम खतरे जान। यह आम तौर पर सभी को पता होने के बावजूद लोग इस पर ध्यान नहीं दे पाते और किसी के कहने पर कुछ भी करने लग जाते हैं। इसे किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता। कहा जाता है कि एक तंदरुस्ती लाख नियामत। इसलिए यह आवश्यक है कि स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहा जाए क्योंकि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का वास होता है। जब शरीर स्वस्थ रहेगा तभी कोई भी काम अच्छा हो सकता है। इसलिए अगर शरीर में किसी प्रकार की समस्या आती है तो उसके बारे में सही जानकारी हासिल की जानी चाहिए और उसका उचित उपचार कराया जाना चाहिए।
यदि हम बात करें कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में किसी प्रकार रूढ़ियां काम करती हैं तो कुछ चीजें सामने आती हैं। जैसे आम धारणा है कि कच्चा दूध पीना स्वास्थ्य के लिए अधिक हितकर होता है। गांवों में आज भी कच्चा दूध पिया जाता है. जबकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ऐसे दूध में कई बीमारियों के रोगाणु मौजूद होते हैं, जो टायफायड, उल्टी-दस्त आदि बीमारियों का कारण बन जाते हैं। अंधविश्वास यहां तक है कि कुछ लोग टमाटर को मांस सदृश्य मानकर नहीं खाते जबकि टमाटर में भरपूर विटामिन होते हैं। लोग यह भी मानते हैं कि कुएं का पानी पाचक और स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। यह बात तभी सही है जब कुआं डंका होता है और उसमें ब्लीचिंग पावडर भी डाला जाता हो, वरना उसका पानी पेट की बीमारियां उत्पन्न कर सकता है।
ग्रामीण अंचलों में एक वर्ष से कम उम्र के शिशुओं को पानी नहीं पिलाया जाता। इससे उनमें डिहाइड्रेशन हो सकता है। विशेषकर दस्त लगने और उल्टियां होने की दशा में तो पानी पिलाना अत्यंत आवश्यक होता है। वहां इन शिशुओं को दूध के अलावा अन्य आहार जैसे दलिया, चावल, दाल आदि देने का भी रिवाज नहीं है, जिससे बच्चे कुपोषण का शिकार होकर अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं। यह बात ध्यान देने की है कि छह महीने के पश्चात शिशुओं को केवल दूध पर्याप्त नहीं होता। यह धारणा भी गलत है कि बच्चों को अन्न खिलाने से उन्हें लीवर की बीमारी हो जाती हैं।
व्रत-उपवास एक सीमा तक तो ठीक कहा जा सकता है लेकिन अधिक उपवास करने से बहुत सी शारीरिक गड़बड़ियां उत्पन्न हो सकती हैं। उसे आमाशय व्रण (गैस्टिक अल्सर), सिर दर्द आदि भी हो सकता है। इसके अलावा खून की कमी, रक्त शर्करा कम होना इत्यादि बीमारियां भी हो सकती हैं। इसलिए उपवास सोच-समझकर और स्वयं की शारीरिक क्षमता को ध्यान में रखकर करना चाहिए। पेप्टिक अल्सर और मधुमेह के रोगियों को चिकित्सक उपवास करने की सलाह नहीं देते।
भारत के पिछड़े क्षेत्रों में आज भी बहुत से रोगों का कारण दैवीय प्रकोप और भूत-प्रेतों को मानते हैं। लोग रोग का इलाज न करवाकर झाड़-फूंक और देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। उदाहरण के लिए छोटी माता और खसरा को गांवों के लोग देवी का प्रकोप मानकर पूजा से संतुष्ट हो जाते हैं। इलाज न करवाने से इन रोगियों में कई अन्य जटिलताएं उत्पन्न हो जाती हैं। बहुत से रोगों जैसे हिस्टीरिया, मिर्गी, पीलिया, गठिया, वात, लकवा आदि का ग्रामीण लोग समुचित इलाज न करवाकर झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं, जिससे रोग ठीक होने के बजाय बढ़ जाता है। टायफाइड जैसे कुछ बुखारों में रोगी को खाना नहीं दिया जाता और लंबा उपवास करवाया जाता है। कई बार ऐसे रोगियों की मृत्यु तक हो जाती है।
ऐसे अंधविश्वासों से बचना चाहिए। कुष्ठ रोग पूर्व जन्मों का प्रतिफल माना जाता है। इसे ठीक न होने वाला रोग समझकर इलाज भी नहीं कराया जाता जबकि आजकल यह रोग इलाज से पूर्णरूप से ठीक हो जाता है और इलाज शुरू करने पर रोग की संक्रामकता चली जाती है। पिछड़े क्षेत्रों में ग्रामीण और आदिवासी अंधविश्वास के कारण अपने बच्चों को भयानक बीमारियों से बचाने वाले टीके भी नहीं लगवाते जो कि बाद में बच्चों के लिए घातक सिद्ध होते हैं। इन क्षेत्रों में रोग ठीक करने के लिए आज भी मुर्गे या बकरे की बलि दी जाती है। उत्तरी मध्य प्रदेश के कुछ गांवों में उचित साफ-सफाई का अभाव और बासी भोजन करने की आदतों के कारण पेचिश, उल्टी जैसे रोग हो जाते हैं। घरों में रोशनदानों अथवा खिड़कियों का अभाव रहता है। ये लोग मानते हैं कि रोशनदानों से दुष्ट आत्माएं प्रवेश कर जाती हैं। इस कारण वे अशुद्ध हवा बाहर निकलने और शुद्ध हवा घर के अंदर जाने के लिए रोशनदान व खिड़कियां नहीं रखते, जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।
कई त्वचा रोगों जैसे एक्जिमा आदि को ठीक करने के लिए उस पर तेजाब डाल दी जाती है। इससे रोग तो ठीक नहीं होता, बल्कि तेजाब द्वारा उत्पन घाव नई समस्याएं पैदा कर देता है। गलत धारणाओं के वश कई लोग छोटे बच्चों को बहुत अधिक कपड़े पहनाते हैं और उन्हें रजाई या चादर में हमेशा पूरी तरह ढंककर रखते हैं। यह प्रायः बच्चों के स्वास्थ्य के लिए हितकर नहीं होता। इसके अलावा जब बच्चे अधिक रोते या तंग करते हैं तो कुछ लोग उन्हें अफीम खिला देते हैं, जो बच्चों के लिए घातक होता है। इससे उनका मानसिक विकास अरुद्ध हो जाता है। इस तरह विशेषकर दूरस्थ अंचलों में प्रचलित अंधविश्वास और गलत मान्यताएं कई तरह की बीमारियों और उनकी जटिलताओं को बढ़ाने में सहायक होतो हैं। इन अंधविश्वासों का एक बड़ा कारण अशिक्षा है। शिक्षा का प्रसार बढ़ने से इस तरह की गलत मान्यताएं स्वतः ही धीरे-धीरे कम होती जाएंगी, लेकिन इन अंधविश्वासी व्यक्तियों की जागरूक बनाने का भी कार्य अभी से शुरू किए जाने की जरूरत है।
प्रस्तुति- कुमारी प्रियंका
