गौरी तिवारी
ईश्वर की भक्ति में मानव ये लीन है,
देह पार्थिव, जगत नश्वर, कुछ नहीं शाश्वत है।
है हृदय में सांत्वना, प्रेम सभी के लिए अपार है,
पर मन में अहंकार, ईर्ष्या भी सभी के लिए अपार है।
हे प्रभु! इसी द्वंद्व का बोझ लिए चलता मानव-जीवन है,
एक ओर सुधा की चाह, दूसरी ओर कर्मों में विष है।
करुणा की कोमल लहरें भी अंतर्मन में उठती हैं,
पर स्वार्थ की उग्र तरंगें उन्हें निगलने लगती हैं।
धरा पर कहीं महलों में स्वर्णिम प्रभात उतरता है,
कहीं अभावों की संध्या में दीपक भी न जलता है।
किसी नयन में स्वप्न सजे हैं अंबर को छू जाने के,
किसी नयन में अश्रु भरे हैं केवल जीवन बिताने के।
किसी कर में वैभव के जेवर, किसी कर में श्रम की रेखाएँ,
किसी द्वार पर उत्सव-ध्वनि है, किसी द्वार पर मौन व्यथाएँ।
एक ही मिट्टी से उपजे ये जीवन कितने भिन्न हुए,
मानव के ही कारण, मानव से मानव छिन्न हुए।
मन के भीतर कुभावों का घना कुहासा छाया है,
द्वेष, दंभ और लोभ ने कितना गहरा जाल बिछाया है।
सत्य कहीं संकोच में बैठा अपने अश्रु छिपाता है,
और असत्य के ऊँचे स्वर को जग आदर दे जाता है।
कहीं युद्ध की ज्वाला में मानवता प्रतिदिन जलती है,
निर्दोषों की करुण पुकारें धूल और धुएँ में ढलती हैं।
सूने आँगन, रिक्त झूलों की वेदना कौन सुनता है,
जब सत्ता का उन्माद रक्त से इतिहास लिखता है।
कितनी माताएँ प्रतीक्षा में पथ पर दृष्टि बिछाती हैं,
जिनकी संताने बिना अपराध समय से पहले गुज़र जाती हैं।
विजय-पताकाएँ लहराती हैं, पर यह कोई नहीं कहता,
हर जयघोष के पीछे कितना रुदन मौन रह जाता।
हे ईश्वर! युग-युग से मानव यही प्रश्न दोहराता है,
जब सबका स्रष्टा एक है, तो भेद कहाँ से आता है?
क्यों है वैभव के ऊँचे पर्वत और अभावों की गहरी खाई?
एक ही धरती पर पलती कैसे यह विषम स्थिति आई?
फिर भी आपकी सृष्टि के प्रति विश्वास जगा रहता है,
तम के गर्भ में भी कहीं आलोक का बीज रहता है।
जिस दिन मन से द्वंद्व मिटेगा, सिर्फ करुणा का वास होगा,
उस दिन ही मानव के भीतर आपका सच्चा दर्शन होगा।
