अनिल तिवारी
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रूस के महान साहित्यकार मैक्सिम गोर्की अपने देश के एक अन्य बड़े रचनाकार आंतोव चेखव से मिलने उनके घर गए। बातचीत के दौरान गोर्की ने चेखव से पूछा आप समाज के विभिन्न वर्गों में किस वर्ग को सबसे ज्यादा तवज्जो देते हैं? चेखव ने जवाब दिया वैसे तो सभी वर्गों की अपनी अहमियत है पर मैं शिक्षक को ज्यादा महत्व देता हूं। शिक्षक निसंदेह पूजनीय और सर्वश्रेष्ठ होते हैं। इतना सुनते ही गोर्की ने पूछा कि शिक्षकों की ऐसी क्या खासियत है जो आप उन्हें श्रेष्ठ समझते हैं। चेखव बोले किसी भी देश की नई पीढ़ी को गढ़ने, अच्छे संस्कार देकर आदर्श नागरिक बनाने का दायित्व शिक्षकों पर होता है। यदि शिक्षक सुखी समृद्ध होंगे तभी तो वह देश की आदर्श पीढ़ी को बनाने में पूरी लगन से काम कर सकेंगे।
सूर, कबीर, तुलसी, रहीम, रसखान को पढ़ कर पली बढ़ी पीढ़ी की स्मृति में यह सूत्र शिष्टाचार शामिल है कि, गुरु गोविंद दोउ खड़े काको लागे पांय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।
कहने का आशय यह है कि समाज निर्माण में शिक्षकों की भूमिका सदैव से महत्वपूर्ण रही है।
बदलते समय के साथ शिक्षक और शिक्षार्थी के तौर तरीकों में परिवर्तन होते रहे हैं। आज तकनीक ने हमें ढेर सारी सहूलियतें दी है। देवालयों, गुरुकुलो की चारदीवारी से बाहर निकल कर शिक्षा आज सर्वत्र सुलभ है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस दौर में ज्ञान की आंधी आई है। गुरुओं के आकार- प्रकार में वृद्धि हुई है। तकनीक के साथ कदमताल करते हुए शिक्षकों के हाव-भाव बदले हैं। नये तेवर और नए कलेवर के साथ, तरह-तरह के नुस्खे और टोटके शिक्षा मे अपनाए जा रहे हैं। सफलता की 100% गारंटी के नाम पर अभिभावकों से मोटी रकम ऐंठने का धंधा भी फल फूल रहा है।
लेकिन सब कुछ के बावजूद महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षक अपनी दक्षता कुशलता के अनुसार शिक्षा दे रहा है और शिक्षार्थी अपने हिसाब की शिक्षा ग्रहण कर रहे है।
इन दिनों एक टीवी चैनल पर आधुनिक शिक्षकों की पद्धति और कमाई को लेकर की गई टिप्पणी के बाद शिक्षक और शिक्षा का महत्व चर्चा के केंद्र में है। खास बात यह है कि यह चर्चा ऐसे समय में उठाई गई है जब पूरा देश परीक्षाओं के पेपर लीक होने का दंश झेलने को मजबूर हुआ है। पढ़ाई और परीक्षा के मामले में सरकारी कुव्यवस्था को लेकर शिक्षा मंत्रालय निशाने पर है।
इसमें कोई दो राय नहीं की देश में शिक्षण का स्तर शैक्षणिक संस्कार की जगह बाजार से ज्यादा प्रभावित है। शिक्षा बाजार की वस्तु बना दी गई है। संविधान में शिक्षा का अधिकार दिया गया है लेकिन व्यवहार में शिक्षा दरअसल पैसे पर बिक रही है। कोई कम पैसे पर शिक्षा मुहैया करा रहा है तो कोई अधिक पैसे वसूल रहा है। निश्चित रूप से इस पर एक स्वस्थ बहस होनी चाहिए। सरकारी स्कूल लगातार घट रहे हैं बंद हो रहे हैं, निजी स्कूल बढ़ रहे हैं कोचिंग स्कूलों की बाढ़ आई है। यह गरीब देश के नागरिकों के लिए कहीं से भी उचित नहीं है इस पर बहस विमर्श किया ही जाना चाहिए।
शिक्षा का सवाल एक बड़ा सवाल है,लेकिन इस बड़े सवाल को प्रतिक्रिया के रूप में उठाना कहीं से भी जायज नहीं लगता। जब देश के छात्र और अभिभावक सरकार से जवाब देही की बात कर रहे हैं ऐसे में टीवी चैनल द्वारा शिक्षकों पर टिप्पणी करना न सिर्फ मुद्दे को कमजोर करना है बल्कि जायज से मुंह फेरना भी है। क्योकि हम सभी जानते हैं की शिक्षा क्षेत्र में तमाम गिरावट के बावजूद शिक्षा की रीढ शिक्षक ही है। शिक्षकों पर सवाल उठाकर उनकी उपयोगिता को कमतर नहीं किया जा सकता।
मुझे हमेशा लगता है कि किसी व्यक्ति का मूल्य उसके द्वारा पैदा किए गए शोर से नहीं, समाज में जोड़ी गई उपयोगिता से तय होना चाहिए। इस कसौटी पर देखें तो देश का एक साधारण शिक्षक, चाहे वह किसी गाँव के स्कूल में पढ़ाता हो या किसी छोटे यूट्यूब चैनल पर, उस व्यक्ति से कहीं अधिक उपयोगी है जो रोज़ घंटों कैमरे के सामने बैठकर बहस के नाम पर शोर का उत्पादन करता है। एक शिक्षक कम से कम किसी बच्चे को कुछ सिखाने की कोशिश तो कर रहा है। वह किसी के भीतर एक कौशल, एक समझ, एक संभावना पैदा कर रहा है। उसकी सफलता और असफलता पर बहस हो सकती है, लेकिन उसके काम की सामाजिक उपयोगिता पर नहीं।
विडंबना यह है कि आज ज्ञान देने वाले लोगों का मूल्यांकन अक्सर वे लोग करने लगे हैं जिनका पूरा पेशा दूसरों की बातों पर प्रतिक्रिया देना भर है। जो लोग स्वयं कोई परीक्षा नहीं पढ़ाते, कोई पाठ्यक्रम नहीं बनाते, किसी बच्चे के भविष्य की जिम्मेदारी नहीं उठाते, वे शिक्षकों की गुणवत्ता पर अंतिम फैसला सुनाने की मुद्रा में दिखाई देते हैं। यह ऐसा ही है जैसे कोई दर्शक मैदान में उतरे खिलाड़ियों को खेल सिखाने लगे।
यूट्यूब के शिक्षक पर सौ सवाल उठाए जा सकते हैं। उनकी गुणवत्ता पर चर्चा की जा सकती है। उनके व्यावसायिक मॉडल की आलोचना होनी चाहिए। उनके दावों की पड़ताल किया जाना चाहिए। यह सब होना चाहिए। लेकिन यह भी याद रखना होगा कि लाखों बच्चे उन्हीं मंचों से पढ़ रहे हैं, सीख रहे हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं और अपने सपनों तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं। उनमें कमियाँ हो सकती हैं, पर वे कम से कम निर्माण की प्रक्रिया में शामिल हैं। दूसरी ओर कुछ टीवी चैनल और उनके कारिंदे ऐसे हैं जिनकी पूरी ऊर्जा केवल उत्तेजना पैदा करने, बहस को लड़ाई में बदलने और दर्शकों की भावनाओं को भड़काने में खर्च होती है।
इसलिए इस चर्चा केंद्र में मेरा ध्यान उस प्रवृत्ति पर है जो समाज में सृजन करने वालों का मजाक उड़ाती है और शोर पैदा करने वालों को विशेषज्ञ घोषित कर देती है। मेरे लिए शिक्षक की आलोचना का अधिकार उसी को होना चाहिए जिसने शिक्षा की जिम्मेदारी का कुछ भार अपने कंधों पर उठाया हो।
हमें ऐसे लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए जो कुछ बना रहे हैं, न कि उन पर जो केवल चिल -पों मचाकर असल मुद्दे को अटकाने भटकाने में लगे हैं।। इतिहास भी अंततः उन्हीं को याद रखता है जिन्होंने समाज में कुछ जोड़ा हो, न कि उन्हें जिन्होंने हर शाम स्टूडियो की रोशनी में कुछ घंटे तू-तू मैं-मै से शुरू होकर गाली गलौज तक के साक्षी बनते हैं।
