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बोरों का देश (कहानी)

गौरी तिवारी 

 

एक ओर स्वतंत्र, स्वच्छ, सुंदर और विकासशील भारत है और वहीं दूसरी ओर उसी भारत में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आज भी निर्धनता की बेड़ियों में कैद हैं, बुनियादी आवश्यकताओं से वंचित हैं, जैसे-तैसे झुग्गियों में संसाधनों के बिना जीवनयापन कर रहे हैं तथा इसी जीवन को अपना संसार मानकर एक अलग दुनिया, एक अलग देश में रह रहे हैं जो आज के विकासशील भारत से कहीं ज्यादा दूर है।

अभी सूर्योदय भी नहीं हुआ था, अनंत क्षितिज, रात और भोर के बीच कहीं अटका हुआ था। सुबह के पूरे 4 भी नहीं बजे थे,महानगर की चमचमाती सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन उसी शहर के एक कोने में एक अलग दुनिया बसाये लोग बहुत पहले जाग चुके थे। दिल्ली के ऊंची मंज़िलों वाले मकानों, बड़ी तथा चमचमाती काॅलोनियों से कुछ दूरी पर शहर के एक कोने में जे-जे कॉलोनी नाम का एक देश है, जिसे दिल्ली जैसे महानगर की आधुनिकता ज़रा सा भी स्पर्श न कर सकी। वहाँ न अलार्म वाली घड़ियाँ थीं, ना ही आरामदायक बिस्तर। वहाँ सिर्फ फटे-पुराने बोरों की दुनिया थी, एक ऐसा संसार जहाँ हर सुबह भूख जगाती थी और हर शाम थकान सुलाती थी। इसी बस्ती में रहने वाला बारह वर्षीय रोहित एक नीले रंग का बोरा लिए अपने पिता के साथ काम पर निकल गया। आकाश में ना कोई पक्षी गा रहा था, न किसी मंदिर की घंटी सुनाई दे रही थी, सड़क पर सिर्फ़ रोहित और उसके पिता कूड़े के डिब्बों से प्लास्टिक की बोतलें, फेंका हुआ खाना और अपने काम की वस्तुएं इकट्ठा कर रहे थे। तभी रोहित को सड़क के किनारे एक खिलौना दिखता है, वह देखकर खुश हो जाता है लेकिन खिलौने के पास जाकर देखता है कि उस गाड़ी के सारे पहिये टूटे हुए थे। फिर भी वह एक छोटी सी मुस्कान लिए उस टूटे हुए खिलौने को अपने रंगीन बोरे में कुछ इस प्रकार डाल लेता है मानो वह रंगीन बोरा उसकी बेरंग जिंदगी में रंग भर देगा और उस जादुई पिटारे में जाते ही उस टूटी हुई गाड़ी के पहिए फिर से जुड़ जाएंगे। तभी उसके पिता उसे पुकारते हैं –

“कहाँ रह गए रोहित? जल्दी आओ।”

“आ रहा हूँ पापा।” और भागकरअपने पिता के पास खड़ा हो जाता है।

“पापा आप हमेशा काम पर जाते समय ये बड़ी सी लाठी लेकर क्यों चलते हैं?

“सुरक्षा के लिए, अगर कोई जानवर आ गया तो उसे भगाने के लिए या कोई सामान कूड़े के डब्बे में बहुत नीचे दबा हुआ है तो उसे निकालने के लिए। हर समय ये लाठी काम आती है।”

रोहित और उसके पिता सामान इकट्ठा करते करते बहुत देर हो गई, लगभग सारे डिब्बे और सड़क के कोने वो खंगाल चुके थे तभी उनकी नज़र सड़क पर पड़े पूरियों के ढेर पर जाती है, रोहित और उसके पिता खुश हो जाते हैं कि उन्हें आज पूरियां मिलेंगी और अपने बोरे में डालने लगते हैं तभी एक कुत्ता भी भोजन देखकर वहां आ जाता है और रोहित के हाथ से पूरियां छीनने लगता है। रोहित पूड़ी नहीं देता तो वह कुत्ता गुर्राने लगता है, रोहित डरकर भागने लगता है तभी उसके पिता लाठी से डराकर उस कुत्ते को भगाने की कोशिश करते हैं लेकिन वहीं 3-4 कुत्ते और आ जाते हैं और उनका झुंड रोहित और उसके पिता पर ज़ोर ज़ोर से भौंकने लगता है। तब तक जितनी पूरियां वे अपने बोरे में भर सके उतनी ही भरकर दोनों तेज़ कदमों से वापस अपने घर की ओर जाने लगते हैं तभी रोहित को थोड़ी सी खरोच लग जाती है लेकिन फिर भी वह बिना रुके भागता है।

घर पहुंचने पर रोहित की मां उसकी चोट पर थोड़ी सी मिट्टी लगा देती हैं, जब कोई सहायता नहीं करता तब प्रकृति ही अपनी संतानों की सहायता करती है। प्रतिदिन इसी प्रकार रोहित और उसके पिता अपने कंधे पर फटा हुआ बोरा लटकाए दिसंबर की सर्दियों में सूर्योदय होने से पूर्व ही पैरों में बिना चप्पल के सर्दियों में कूड़े के डिब्बों से लोहे, प्लास्टिक और कागज़ के टुकड़े खोजने निकल जाते हैं। भले ही ठंडी जमीन उनके तलवों को चीर रही हो किंतु फिर भी वे बिना इसकी परवाह किये काम पर निकल जाते हैं।

 

“माँ आज स्कूल में पी टी एम है, 12 बजे तक पहुंचना है।”

” ठीक है, लेकिन हमें काम पर भी जाना है इसलिए जल्दी चलेंगे। आज पी टी एम है इसका मतलब खाना मिलेगा नहीं मिलेगा सकूल में?”

“नहीं मां, आज मिड डे मील नहीं मिलेगा।”

यह सुनते ही कुछ सोचकर उसकी मां के चेहरे पर हल्की उदासी छा जाती है क्योंकि उनके पास इतने पैसे नहीं होते कि दिन में तीन वक्त का भोजन मिल सके इसलिए विद्यालय में मिलने वाले मिड डे मील से ही रोहित का पेट भरता था, एक समय का भोजन वह विद्यालय में ही कर लेता और अपने टिफिन में मांग कर घर भी ले आता ताकि जब वह विद्यालय से घर पहुंचे तब यदि घर पर कोई न उपस्थित हो तब उसे भूखा न रहना पड़े, किंतु आज मिड डे मील न मिलने पर उसे भूखा न रहना पड़े। सुबह कूड़े के डिब्बे में रोहित के पिता को 5-6 पूरियां मिली होती हैं, सुनीता वही गर्म करके

सबको खाने के लिए दे देती है। महेन्दर वह पूरियां नमक के साथ खाकर एक बार फिर अपने काम पर निकल जाते हैं, रोहित की मां सुनीता को भी किसी बड़ी सोसायटी के एक घर में काम पर जाना था इसलिए फटाफट घर का काम निपटाकर वह रोहित के साथ उसके विद्यालय के लिए निकल जाती है।

 

“गुड मॉर्निंग, रोहित बेटा आप तो सबसे पहले आ गए

“गुड मॉर्निंग मैम, वो मां को काम पर जाना था इसलिए हम जल्दी आ गए”

“अच्छा कोई बात नहीं।”

“नमस्ते मैम जी, रोहित पढ़ने में ठीक तो है न?”

“ठीक?? वह कक्षा का सबसे मेधावी छात्र है। इस सत्र में भी उसके सबसे अच्छे अंक आए हैं। अगले महीने हमारा विद्यालय द्वारा कुछ मेधावी विद्यार्थियों को रिसर्च के लिए उत्तराखंड लेकर जाया जाएगा, उन विद्यार्थियों में रोहित भी शामिल है।”

“लेकिन मैम जी हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं कि हम पैसे जमा करवा सकें, इनके पापा मेहनत मजदूरी करके जो थोड़ा बहुत कमाते हैं और हम दूसरों के घरों में काम करके जितने पैसे इकट्ठा कर पाते हैं उसी से हमारा गुजारा होता है। हमें 3 वक्त का भोजन भी नसीब नहीं होता हम फीस कैसे भरेंगे? इसलिए तो रोहित का दाखिला सरकारी सकूल में करवाया।”

” रोहित बहुत मेधावी छात्र है, उस रिसर्च के लिए जाना इसके लिए बहुत जरूरी है। अगर सिर्फ फीस के कारण आप इसे जाने से रोक रही हैं तो मैं प्रिंसिपल सर से बात करूंगी कि रोहित की फीस विद्यालय के प्रशासन द्वारा भरी जाए।”

“धन्यवाद मैम जी”

” परसो एक स्कॉलरशिप की परीक्षा है, यदि उसमें रोहित पास हो जाता है तो इनाम स्वरूप उसे सरकार द्वारा 1 वर्ष के लिए हर माह 4000 की राशि प्रदान की जाएगी।”

यह सुनते ही रोहित की मां बहुत प्रसन्न हो जाती हैं और रोहित को और मेहनत करने तथा अच्छे से पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। रोहित को घर पहुंचाकर सुनीता अपने अपने काम पर चली जाती है। रोहित अपने नीले बोरे से वह गाड़ी निकालकर उसे चलाने का प्रयास करता है किन्तु बिना पहिए की वह गाड़ी आगे नहीं बढ़ती इसलिए वह माचिस से जलाकर गाड़ी के पिछले भाग पर थोड़ा सा छेड़ करता है, फिर उसमें रस्सी फंसाकर उसे आगे की ओर खींचता है, जैसे ही रस्सी खींचता है गाड़ी अपने आप आगे बढ़ने लगती है। यह देखर रोहित बहुत प्रसन्न हो जाता है। थोड़ी देर खेलकर वह पढ़ाई करने लगता है, मन लगाकर अपनी परीक्षा के लिए तैयारी करता है।

अगले दिन भोर में उसके पिता उसे अपने साथ चलने के लिए कहते हैं तब सुनीता उसे मना कर देती है, की 1 दिन में उसकी परीक्षा है इसलिये वह नहीं जाएगा किंतु रोहित फिर भी जाने की ज़िद करता है और कहता है ” मां हमारे घर का अभाव देखकर और पापा के साथ काम पर जाकर, कठिनाइयों का सामना करके मुझे और मेहनत करने तथा एक कामयाब व्यक्ति बनने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। इसलिए मुझे जाने दीजिए।” एक बारह वर्षीय बालक से इतनी समझदारी भरी बातें सुनकर सुनीता की आँखें नम हो जाती हैं। वह प्यार से उसे गले लगा लेती है। एक बार रोहित अपना नीला बोरा लेकर अपने पिता के साथ घर से निकल पड़ता है, सारा काम जल्दी निपटाकर दोनों घर लौटते हैं और उसके माता-पिता फिर अपने काम पर चले जाते हैं लेकिन रोहित घर पर रहकर अपनी परीक्षा की तैयारी करता है और मन लगाकर पढ़ता है।

उसकी कड़ी मेहनत और लगन ने उसके बोरों की बेरंग जिंदगी में रंग भर दिए और वह स्कॉलरशिप की परीक्षा में भी सिर्फ अच्छे अंकों पास ही नहीं हुआ अपितु इस बार भी अव्वल आया।

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