नोबेल पुरस्कार पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का मानना है कि भारतीयों में आम चर्चा और तर्कशील बहस की लंबी परंपरा रही है। लेकिन आज यह परंपरा अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण को लेकर पैदा हुए विवाद ने हाईजैक कर ली है। आज हमारी बहस में कड़वाहट, घृणा और जातीय विद्वेष की बू आ रही है। इन कारणों से इस बहस में शामिल होना मुश्किल प्रतीत हो रहा है। लेकिन इसमें शामिल होना भी जरूरी है, क्योंकि उस समाज का पूरा भविष्य दांव पर लगा है, जो विवादित मुद्दों को कड़वाहट भरे झगड़ों के बजाय आपसी बातचीत से सुलझाने के आधार पर काम करता है।
विवाद की जड़ में यह आरोप है कि आरक्षण समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। हर एक को अवसरों के ढांचे तक पहुंचने के साथ ही, निर्णय लेंने की प्रक्रिया में भाग लेने का समान हक है, भले ही वह किसी भी जाति, धर्म, लिंग अथवा वर्ग का हो। इसको लोकतंत्र की आम भाषा में एक व्यक्ति, एक वोट भी कहा जा सकता है।
भारत जैसे असमान समाज में हर किसी को अवसरों का समान लाभ नहीं मिल सकता और न ही वह निर्णय लेने की प्रक्रिया में समान रूप से शामिल हो सकता है। वह व्यक्ति जिसके पास रोटी, कपड़ा और मकान जैसी जीवन की बुनियादी जरूरतों की कमी है, वह किसी भी तरह से अमीरों, विशेषकर अतिसंपन्न वर्ग की बराबरी नहीं कर सकता है। भारत में गरीब बच्चे न केवल अशिक्षित हैं, बल्कि वे कुपोषण के शिकार हैं, बेघर हैं और बीमारियों के करीब हैं। असमानता को दूर करने के लिए सरकार का कर्तव्य है कि वह ऐसे दबे लोगों को मुफ्त शिक्षा, सुनिश्चित आय, पोषक भोजन व स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराए। यह वे न्यूनतम चीजें हैं जो एक अच्छे समाज द्वारा पिछड़े लोगों को दी जानी चाहिए, क्योंकि हरेक को आत्मसम्मान से जीने का हक है। ऐसा नहीं है कि यह तर्क मेरिट का सम्मान नहीं करता। बल्कि इसका अर्थ यह है कि हर बच्चे को मूल जरूरतों के जरिये उसकी क्षमताओं को मेरिट में बदलने का मौका दिया जाना चाहिए। इससे वह संपन्न बच्चों की बराबरी कर सकेगा। इसको समतावाद कहा जाता है।
यहां पर महत्वपूर्ण है कि समतावाद मानवतावाद नहीं है, वह संसाधनों को अमीरों से गरीबों को हस्तांतरित करने की बात करता है। मानवतावादी कल्याण के प्रति चिंतित रहते हैं, जबकि समतावादी इससे आगे की सोचते हैं। अमीरों से गरीबों को संसाधनों का हस्तांतरण भारी विषमता को दूर कर सकता है, लेकिन समाज को समतावादी नहीं बना सकता। इसके बावजूद अमीर गरीबों के मुकाबले संसाधनों से भरपूर रहेंगे और समाज असमान बना रहेगा। समतावादी गहरी समानता के प्रति चिंतित रहते हैं। हरेक का समाज के संयुक्त संसाधनों पर समान दावा होना चाहिए। अगर समाज असमान रूप से संगठित होगा, तो इस अधिकार को वैकल्पिक तरीकों से उपलब्ध कराना होगा। इनमें भूमि सुधार, आय की योजनाएं, संपत्तियों की बराबरी और संयुक्त कार्रवाई से संसाधनों का प्रावधान करना शामिल है। मानवतावादी समतावादियों की तरह संसाधनों के समान वितरण के प्रति चिंतित नहीं रहते। उनका मानना है कि किसी को भी अपने हिस्से से अधिक अथवा कम संसाधनों पर कब्जा नहीं करना चाहिए। यही बात समतावादियों को मानवतावादियों से अलग करती है।
यहां पर यह भी महत्वपूर्ण है कि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के संस्थापकों के पास आरक्षण के समर्थन में दमदार दलीलें थीं। समाजशास्त्रियों को हमें यह बताना होगा कि क्या अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) में किसी ने शुद्धता अथवा प्रदूषण के नाम पर भेदभाव का सामना किया, अगर ऐसा है, तो उन्हें आरक्षण का लाभमिलना चाहिए। लेकिन जिन जातियों ने आर्थिक विपन्नता का सामना किया, उन्हें अन्य उपायों से लाभ मिलना चाहिए, जो समतावाद से संबंधित है। इसे इस तरह से भी समझा जा सकता है कि आरक्षण उन लोगों के लिए था, जिन्हें दोहरी वंचना का सामना करना पड़ा। उनके साथ जाति व वर्ग की वजह से ऐसा हुआ। शिक्षा व व्यवसाय से दलितों को दूर रखने का मतलब उन्हें आय और आत्मसम्मान से दूर किया गया। आरक्षण इसे ही दूर करने के लिए था। यद्यपि, आरक्षण पर ताजा बहस में इसे गरीबी दूर करने के तौर पर दिखाया जा रहा है और यहीं पर हम गलत हैं। इसके अलावा हम संरक्षणवादी भेदभाव और सकारात्मक कार्रवाई या एफर्मेटिव एक्शन को लेकर भ्रमित हो जाते हैं। अमेरिका में सकारात्मक कार्रवाई न तो कोटे पर न ही योग्यता को घटाने पर आधारित है। अगर सब कुछ समान है तो महिलाओं और एफ्रो-अमेरिकी नागरिकों को प्राथमिकता देना ही वहां एफर्मेटिव एक्शन है। भारत में कोटा और कम योग्यता के मिश्रण से संरक्षणवादी भेदभाव बनता है और यहीं इस पर धब्बा लगता है। हमें अवधारणा और व्यवहार को लेकर भ्रमित नहीं होना चाहिए। आरक्षण विविधता को सम्मान देने के लिए नहीं है। यह एक अन्य विचार है जिसे आरक्षण समर्थकों ने अमेरिका और कनाडा से झटका है। इन दोनों ही देशों में आप्रवासी समाज है और उन्होंने हाल ही में महसूस किया है कि वहां के मूल लोगों को पहचान देने की जरूरत है।
आरक्षण महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे गंभीरता से लिया जान चाहिए। असमानता को दूर करने के लिए समतावाद है। आरक्ष को समतावाद का एक हिस्सा होना चाहिए, लेकिन वह इसक स्थान लेने लगा है। जहां भूमि सुधार के मुद्दे को इतिहास के कूड़ेदा में डाल दिया गया है, आरक्षण को सीमा से अधिक फैला दिया गन है। यह उन राजनेताओं के लिए आसान विकल्प है, जो समाज गहरा परिवर्तन लाने के पक्ष में नहीं हैं। दुर्भाग्य से आरक्षण ने स लोगों की राजनीतिक कल्पनाशीलता को भी सीमित कर दिया जिन्होंने सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ीं।
आज गलत कारणों से संरक्षणात्मक भेदभाव की नीतियों का समर्थन किया जा रहा है। यदि ऐसा मानवतावादी नजरिये से हो रहा है, तो सर्वोत्तम है, लेकिन यदि ऐसा वोट बैंक के लिए किया रहा है, तो यह निकृष्टतम है। दूसरी बात यह है कि संरक्षणात्मक भेदभाव के लिए राजनीतिक समर्थन बहुत ही कमजोर हो गया है, जिससे आक्रामकता बढ़ी है। इसने जातीय भेदभाव की समस्या को कम करने के बजाय बढ़ा ही दिया है।
कलरव, अक्टूबर 2006 के अंक में प्रकाशित। ( पृष्ठ संख्या – 29)
