अनिल तिवारी
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अमूमन चुनावी नतीजों के बाद खोया-पाया के आधार पर हारे हुए राजनीतिक दल हार के कारणों पर गौर करते हुए आगे के लिए खुद को दुरुस्त करते हैं तो जीतने वाले जनता से किए वादों को पूरा करने की कवायद में लग जाते हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणाम आने के बाद हार को स्वीकारने तथा जीत का जश्न मनाने की जगह हिंसा का तांडव मचा हुआ है। राज्य के अगले मुख्यमंत्री के संभावित उम्मीदवार सुबेन्दु अधिकारी के निजी सचिव चंद्रनाथ रथ सहित अलग-अलग इलाकों में अब तक पांच लोगों की हत्या की जा चुकी है। हिंसक घटनाओं के लिए राजनीतिक दल एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप मढ़ रहे हैं। बीजेपी के राज्य प्रमुख ने दावा किया है कि तृणमूल के कार्यकर्ता भाजपा का भेष धारण कर हिंसक वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। दूसरी तरफ तृणमूल का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी शासकीय संरक्षण में गुंडा तत्वों को आगे कर बदले की कार्रवाई के तहत तोड़-फोड़, लूट-मार को सह दे रही है। ताज्जुब की बात है कि यह सब पश्चिम बंगाल में तब हो रहा है जब घोषित रूप से लाखों की तादाद में केंद्रीय बलों की तैनाती है।
इसे लिखने के पहले सोशल मीडिया पर वायरल दो वीडियो देखने को मिली। एक वीडियो में मालगाड़ी से भारी संख्या में बुलडोजर भरकर कोलकाता ले जाया जा रहा है। दूसरा वीडियो दो हिस्से में है। पहले हिस्से में ढेर सारे मर्द मिलकर चुनाव में बुरी तरह पराजित पूर्व मुख्यमंत्री (कोई पुरुष ममता बनर्जी का स्वांग किया हुआ है) को रस्सी से बांधकर घसीट रहे हैं। दूसरे हिस्से में ढेर सारी महिलाएं पूर्व मुख्यमंत्री को घसीट रही है और पिट रही हैं। एक सामान्य नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी में क्या इस बात से कोई फर्क पड़ता है कि यह सब घटनाएं राजनीतिक नफा नुकसान के नाम पर हो रही हैं? क्या न्याय इस आधार पर होगा कि 24 परगना के मध्य ग्राम में आततायियों के ताबड़तोड़ चार गोली लगने से ढेर हुए चंद्रनाथ का संबंध भाजपा से था अथवा वीर भूमि में हिंसक भीड़ द्वारा मारे गए अबीर शेख का रिश्ता तृणमूल कांग्रेस से था? क्या हैवानियत का प्रतिकार इस आधार पर किया जाएगा की मारने वाला इस पार्टी का है या उस पार्टी का? दुर्भाग्य बस इस वक्त हमारा समाज अपने विवेक के इसी पड़ाव पर आ खड़ा हुआ है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव दो चरणों में संपन्न हुआ। बड़े पैमाने पर राज्य में केंद्रीय पुलिस बल की तैनाती की गई ताकि कोई हिंसक अनहोनी ना हो सके। चुनाव के दौरान ध्रुवीकरण की खूब कोशिशें हुई, उत्तेजक नारे भी गढे गए, लेकिन छिटपुट झड़पों के अलावा कोई हिंसक वारदात नहीं हुई। इस पर सभी वर्ग के लोगों ने संतोष भी जताया। परिणाम आने के बाद खुद प्रधानमंत्री ने अपने मुख्य संबोधन में कानून व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि ज्ञात इतिहास में पहली बार बंगाल में हिंसा रहित चुनाव हुआ है। निश्चित रूप से इसका श्रेय शासन प्रशासन को जाता है। लेकिन परिणाम आने के बाद ऐसा क्या हो गया कि राज्य में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। गिरोह बनाकर सभी एक दूसरे को नीचा दिखाने, सबक सिखाने की होड़ में लगे हैं। दुकान, मकान, दफ्तर पर कब्जा कर लेने, तोड़कर जमींदोज कर देने की सनक चढ़ी हुई है। आसनसोल में कांग्रेस के लोगों ने टीएमसी के दफ्तर पर कब्जा कर लिया। नईहटी में बीजेपी के लोगों ने टीएमसी के दफ्तर को गिरा दिया। हावड़ा में बीजेपी के कार्यकर्ताओं को घेर कर पीटा गया। इस तरह की सुनियोजित हिंसा का दौर पिछले 72 घंटे से राज्य के विभिन्न हिस्सों में चल रहा है। सरकार ने एहतियात के तौर पर गिरफ्तारियां की हैं, कानून व्यवस्था को ठीक करने के लिए निर्देश भी जारी किए हैं, किंतु अपराध थम नहीं रहे हैं। अपने-अपने चश्मे से सभी खुद को जायज ठहराते हुए दूसरे पर हमला कर रहे हैं। लगातार मौत की खबरें भी आ रही हैं। ऐसे मौकों का फायदा उठाने वाले अलग-अलग रंग देकर आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। नतीजा आने के बाद से ही धार्मिक आधार पर गोलबंदी की बातें भी हो रही है। समाचार विश्लेषण में भी इस पर जोर दिया जा रहा है की एक पार्टी से जीतने वाले केवल हिंदू हैं जबकि अन्य पार्टियों से जीतने वाले अधिकांश दूसरे संप्रदाय के हैं। प्रमुख राष्ट्रीय समाचार चैनल भी आंकड़ों के साथ इसकी एनालिसिस कर रहे हैं। इसका असर नीचे जमीन तक हो रहा है। लोग दूसरे की आलोचना को खुद पर हमला मान रहे हैं। दूसरे पार्टी का आलोचक उनका शत्रु है। वह अपने पार्टी के एकमात्र रक्षक हैं। शत्रु का वध उनका अधिकार है। वह किसी भी तरह की हिंसा कर सकते हैं। उन्हें राजकीय न्याय और व्यवस्था की कोई जरूरत नहीं है। ऐसा करने वालों के मन में यह गुरूर है की विरोधी को दंडित करना उनका अधिकार है और वह अपने दल के लोगों की रक्षा के नाम पर सब कुछ बेधड़क कर सकते हैं।
बंगाल में जारी हिंसा को केवल चुनावी प्रतिक्रिया के रूप में देखना नादानी होगी। अब हमारे समाज का कोई न कोई हिस्सा हर रोज ऐसे ही किसी न किसी मुद्दे को लेकर ब्यग्र रहता है तथा जिसे विरोधी मानता है उसका वध करने के लिए सदैव तत्पर रहता है।
अबकी बार बंगाल चुनाव ने हिंदू मन को झकझोरा, मुस्लिम मानस को भी झकझोरा लेकिन राष्ट्र के नागरिक समाज की चेतना को कोई तवज्जो नहीं दी। लोकतंत्र के लिए जरूरी समझे जाने वाले विपक्ष की बात को भी कई संवेदनशील मौकों पर अनसुना कर दिया गया। सब कुछ अपनी-अपनी राजनीति के हिसाब से निश्चित हुआ। बड़े पैमाने पर केंद्रीय बलों को शामिल किया गया लेकिन वह राष्ट्र की मजबूत और निष्पक्ष कानून की सख्त व्यवस्था का प्रतीक बनकर नहीं उभरा।
पिछले तीन दिनों से चल रहे घटनाक्रम से साफ दिखता है कि हमारे लिए कानून व्यवस्था का मतलब वह और सिर्फ वही व्यवस्था है जैसा हम चाहते हैं। न्याय का मतलब वह और सिर्फ वही तजवीज है जिसे हम उचित समझते हैं। यहां दूसरों की टिप्पणी, दूसरों की चिंता और कानून व्यवस्था की राष्ट्रीय अवधारणा की कोई आवश्यकता नहीं है। हम जब चाहे आलोचना कर सकते हैं, उसकी धज्जियां उड़ा सकते हैं और उसे अपने हाथ में ले सकते हैं। यह लोकतंत्र के क्षरण का भी प्रतीक है।
अंग्रेजों के शासन से मुक्त हुए भारत को एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में बढ़ाने का प्रयास किया गया। आज का भारत वैदिक युग का राष्ट्र नहीं, जहां राजा ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। हमने गुरुकुलों की जगह स्कूल और कॉलेज बनाए, राजा की सभा की जगह लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभाएं और न्यायालय बनाए। ऐसी संस्थाएं एक दिन में नहीं बनती, धीरे-धीरे विकसित होती हैं, अपना आदर्श चरित्र प्राप्त करने में इन्हें कई कई दशक लगते हैं।
दुर्भाग्य से या अनुभवहीनता के कारण आधुनिक राष्ट्र के निर्माण के साथ हम आधुनिक नागरिक संस्कृति का विकास उस तरह नहीं कर सके जैसी की जरूरत थी। आजादी मिलने के 78 साल बाद भी देश के नागरिक अपनी अस्मिता धर्म और जाति से ही जोड़कर देखते हैं। आप थोड़ा ठहर कर ठीक से देखिए कि हमारे देश में कितने जातीय संगठन हैं, किस तरह से वह अपना गौरव गान करते फिर रहे हैं और किस तरह से हम अपने जन प्रतिनिधि चुनते हैं? ऐसी किसी भी बात पर जिसे वे अपनी जाति या धर्म के लिए अपमानजनक समझते हैं, अपना विरोध दिखाने के लिए क्या करते हैं? सीधा जवाब है कि राष्ट्र के कानून को तोड़ते हैं, व्यवस्था को भंग करते हैं, संपत्ति को नष्ट करते हैं और सरेआम गोली मारकर हत्या कर देते हैं। आप खुद सोचिए उनकी पहली निष्ठा किसमे है, जाति या संप्रदाय के साथ अथवा राष्ट्र के साथ। विरोध हमारा अधिकार है, अभिव्यक्ति हमारा अधिकार है लेकिन हिंसा तो हमारा अधिकार नहीं है।
कुछ देर के लिए यदि कहा जाए कि राष्ट्र इन्हीं इकाइयों से मिलकर तो बनता है, तब हमें दूसरों की निष्ठा और उसके प्रतिरोध को भी उतनी ही जगह देनी होगी। लोकतंत्र में चुनाव एक उत्सव होता है जो निश्चित अंतराल पर होता रहता है। किसी राज्य में चुनाव हो जाने के बाद वहां के नागरिक महंगाई, रोजगार, स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि के बदले राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से हिंसक संघर्ष कर रहे हैं तो जाहिर है कि वह अतीत के राजा की प्रजा से आधुनिक राष्ट्र के नागरिक में अभी तब्दील नहीं हो पाए हैं। कोशिश इसी बदलाव के लिए की जानी चाहिए, क्योंकि चंद्रनाथ रथ को जिस तरह के हिंसक हमलावरों ने गोलियों से भून डाला है, उसी तरह की आततायी भीड़ ने अबीर शेख को भी घेर कर मार डाला है। दोनों में कोई फर्क नहीं है। न्याय व्यवस्था की अनदेखी तो है ही, मानवता पर भी कलंक है। स्वस्थ नागरिक चेतना के दम पर ही समर्थ और कानून सम्मत राज्य फलता-फूलता है। जाहिलपने से बाहर निकलिए और बदलाव के लिए सार्थक कदम बढ़ाइए। प्रधानमंत्री जी ने भी तो यही कहा है कि ‘बंगाल की जीत बदला की नहीं, बदलाव के लिए है’।

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अतुलनीय प्रस्तुति।