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पश्चिम बंगाल चुनाव: किधर ठहरेगी की नाव !

खिलेगा कमल या जोड़ा फूल का जलवा रहेगा बरकरार?
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अनिल तिवारी
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पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी के चुनावी दंगल में हार जीत का नतीजा कल (4 मई 2026) आएगा। परिणाम आने के साथ ही पता चलेगा कि इन राज्यों में किसकी सरकार बनेगी। पांच राज्यों में दो राज्य पूर्व के हैं तो तीन दक्षिण के। बंगाल और असम के चुनाव परिणाम का असर अगले साल होने वाले देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के चुनाव पर भी पड़ेगा। एग्जिट पोल के अनुमान प्रसारित होने के बाद से ही परिणाम को लेकर इन राज्यों मे राजनीतिक गतिविधियों में रवानी आ गई है, लेकिन सर्वाधिक गहमागहमी पश्चिम बंगाल को लेकर है। करो या मरो के अनुशासन से जुटी बीजेपी बंगाल का किला फतह कर राज्य में कमल खिला सकेगी अथवा मां, माटी, मानुष की पैरोकार वर्तमान मुख्यमंत्री की कूंची से निर्मित जोड़ा फूल की धाक, धमक और गमक आगे भी बरकरार रहेगी? आज की रात इन दोनों दलों पर भारी है। राजनीतिक गुणा गणित अपने पक्ष में बताते हुए भाजपा के दिग्गज परिणाम के बाद सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं वहीं टीएमसी नेत्री ने अपने कार्यकर्ताओं को रतजगा करने और परिणाम घोषित होने तक चौकस रहने का निर्देश दिया है।

आंकड़ों पर गौर करें तो पश्चिम बंगाल विधानसभा मे कुल 294 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 148 का है। वर्ष 2016 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को 211 सीट मिली थी जबकि भाजपा को मात्र तीन सीट पर संतोष करना पड़ा था। कांग्रेस को 44 सीट, वामदलों को 32 सीट तथा अन्य के खाते में चार सीटें थी। वर्ष 2021 के चुनाव में राज्य में कांग्रेस और वाम दलों का खाता भी नहीं खुला था जबकि अन्य दल केवल दो सीट पर सिमट गए थे। तब भारतीय जनता पार्टी तीन सीटों से बढ़कर 77 सीट जीतने में कामयाब हुई थी। माना गया कि कांग्रेस और वामदलों की हार का सीधा फायदा भाजपा को मिला था। तब तृणमूल कांग्रेस 215 सीट जीतकर दो तिहाई से अधिक बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब हुई थी। मौजूदा चुनाव में कांग्रेस और वामदलों का चुनावी तालमेल हुआ है। भाजपा को उम्मीद थी कि वर्ष 2016 की तरह बम कांग्रेस गठबंधन मजबूती से चुनाव लड़ेगा तो प्रकारांतर से उसका फायदा पार्टी को मिलेगा लेकिन जमीनी हकीकत बता रही है कि चुनाव में बीजेपी और तृणमूल के बीच कड़ा और कांटे का संघर्ष है।
हालांकि चुनाव पांच राज्यों में हुए हैं लेकिन ज़्यादातर राजनीतिक पंडितों का ध्यान पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों पर केंद्रित है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्यों पश्चिम बंगाल का चुनाव इतना महत्वपूर्ण बन गया है?
इसको अलग-अलग नज़रिए से देखना होगा। सबसे पहले यही देखते हैं कि बीजेपी के लिए यह राज्य इतना अहम क्यों है? क्योंकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो जनसंघ के संस्थापक थे, पश्चिम बंगाल उनका गृह राज्य है। यही वजह है कि 1950 से बीजेपी का लगातार प्रयास रहा है कि वह किसी तरह से पश्चिम बंगाल में कामयाब हों, वहां अपनी सरकार बना सके। हालांकि अभी तक वह सफल नहीं हुए हैं। इस बार के चुनाव में बीजेपी की ओर से हर संभव कोशिश हुई। साधन, प्रचार और संसाधनों की कोई कमी नहीं रखी गई। सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग तक के आरोप लगे हैं और राज्य में केंद्रीय बलों की तैनाती भी हुई है। प्रधानमंत्री के अनगिनत कार्यक्रमों के साथ-साथ देश के गृह मंत्री का लगातार कैंप करना भी चर्चा में रहा है।
इसके अलावा दूसरा जो अहम कारण है, वह यह है कि यह राज्य बीजेपी के रणनीतिकारों के लिए एक बड़ा टेस्ट केस भी है कि वह कितने हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण कर सकते हैं।
क्योंकि ध्यान रहे कि पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य है जहां अलग-अलग आंकड़ों के मुताबिक 25 से 30 प्रतिशत तक मुस्लिम मतदाता हैं। ऐसे में दूसरी तरफ़ का ध्रुवीकरण काफ़ी मजबूत होना चाहिए। हालांकि अनुमानों में यह भी कहा गया है कि इस बार कुछ मुस्लिम मतदाता भी बीजेपी को समर्थन दिए हैं लेकिन आम धारणा है कि बीजेपी को मुस्लिम वोट बहुत कम या नहीं के बराबर ही मिले होंगे।

बीजेपी और विपक्ष के नज़रिए से एक और अहम बात यह है कि, राजनीतिक हलकों में पश्चिम बंगाल को एक लास्ट फ्रंटियर की तरह से देखा जा रहा है क्योंकि उत्तर में, केंद्रीय भारत में, पूर्वी भारत में ज़्यादातर जगह बीजेपी अपनी जीत का झंडा फहरा चुकी है।
बंगाल अभी तक उससे बचा हुआ है। बीजेपी अब तक यहां जीतने में कामयाब नहीं हुई है। इसलिए यह चुनाव बीजेपी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। और विपक्ष के लिए इसलिए कि बीजेपी के बढ़ते हुए प्रभाव को, उसके एकछत्र राज को रोकना है, तो पश्चिम बंगाल में टीएमसी को बने रहना होगा। यह उसके लिए तो बहुत महत्वपूर्ण है ही, समूचे विपक्ष के लिए भी अहम है। तो दोनों तरफ़ से मुक़ाबला इसलिए बहुत अहम हो जाता है।

इस चुनाव में एक अहम मुद्दा एसआईआर का भी रहा है, वोटर लिस्ट में जो स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न हुआ है, वह राज्य के चुनाव में एक ऐसा विषय बना हुआ है, जिसकी वजह से लोगों का पारा भी काफ़ी चढ़ा हुआ है, तनाव भी है और यह एक संवेदनशील मुद्दा भी है।

बड़ी संख्या में लोगों के वोट कटे हैं और उस बड़ी संख्या में जो वोट कटे हैं उसमें भी बड़ी संख्या अल्पसंख्यक यानी मुस्लिम मतदाताओं की है। यह वोट सेंट्रल बंगाल, मुर्शिदाबाद, मालदा और इनके आस-पास के इलाकों में कटे हैं। पश्चिम बंगाल में एसआईआर की जमीनी सच्चाई जानने के लिए गए कई लोगों का मानना है कि गड़बड़ी हुई है, ग़लतियां भी हुई हैं। किसी घर में पिता का वोट तो रह गया है, बाकी सदस्यों का नहीं है। कहीं पति का रह गया है, पत्नी और बच्चों का कट गया है। कहीं पत्नी का रह गया है बाकी घर वाले नहीं हैं। बिल्कुल सही हुआ है, इसके तो आसार कम ही नज़र आते हैं।

फिर एक मुद्दा ध्रुवीकरण का है, जो पश्चिम बंगाल की राजनीति की सच्चाई है। इसबार ध्रुवीकरण शहरी इलाकों में काफ़ी है, ख़ासकर उन लोगों में जो मूलतः बंगाली नहीं हैं, चाहे वे मारवाड़ी हैं, चाहे हिन्दी भाषी लोग हैं, जो लंबे समय से बंगाल में रह रहे हैं। वे काफ़ी कुछ बीजेपी का साथ देते हुए दिखे हैं।
शहरों में हिंदू-मुस्लिम की चर्चा ज़्यादा रही, ग्रामीण इलाकों में उसकी बात कम है । लेकिन अच्छी बात यह है कि बात कितनी भी हो, मुद्दा जितना भी अहम हो, चुनावी असर जो भी दिखा हो, लेकिन अपेक्षाकृत पूरे बंगाल में कोई सांप्रदायिक तनाव की झलक नहीं दिखी । कई जगह लोग काफ़ी अमन-चैन से रह रहे थे। मुस्लिम इलाके अलग हैं, हिंदू इलाके अलग हैं। कमोबेश अब पूरे देश की जो कहानी है वही पश्चिम बंगाल की भी है।
चुनाव के ज़मीनी स्थिति की बात करें तो एक बात जो समझ में आती है, वह यह है कि ममता का शासन और ममता की सरकार ख़ासी अलोकप्रिय है। उसने कुछ ख़ास अच्छा काम नहीं किया है, विकास के नज़रिए से हम देखें तो पश्चिम बंगाल की विकास दर देश में सबसे धीमी है। बातचीत में वहां के लोग कल कारखानों के बंद होने से रोजगार की कमी का जिक्र बेधड़क करते हैं। यानी जहां दूसरी जगह वृद्धि दर बढ़ रही है, वहां पश्चिम बंगाल में यह ठिठकी हुई है।
लेकिन सवाल है कि क्या केवल विकास को आगे कर कोई चुनाव जीत सकता है? अनुभव तो यही कहता है कि दरअसल यह कोई सर्वमान्य फार्मूला नहीं है। अब तक तो यह आधे आधे का मामला ही रहा है। लगभग 50 प्रतिशत मामले ऐसे होते हैं जब विकास करने के बाद भी लोग जीत नहीं पाते और 50 प्रतिशत ऐसे मामले होते हैं जहां विकास कम होता है लेकिन फिर भी दोबारा जीत जाते हैं।

इसका मतलब है कि चुनावी राजनीति में दूसरी चीजें ज़्यादा भारी पड़ती हैं। पिछले कुछ वर्षों से चुनावों में महिला मतदाता अहम भूमिका निभा रही हैं। बिहार में, मध्य प्रदेश में देखा गया कि महिलाएं मदद करने वालों को वोट करती हैं और उनके बीच में बीजेपी की पैठ बेहतर हुई है। नीतीश कुमार ने बिहार में शराबबंदी की, वह चुनाव जीते। इस बार उनकी एक प्रत्यक्ष नगद लाभ योजना थी, उसकी वजह से जीते।

बंगाल में ममता बनर्जी ने एक लक्ष्मी भंडार योजना चलाई हुई है जिसके तहत हर महीने पन्द्रह सौ रुपये महिलाओं के ख़ाते में भेजे जाते हैं अब उसका कितना असर पड़ेगा?
बीजेपी ने वादा किया है कि अगर उनकी सरकार बनी तो वह तीन हज़ार रुपये देंगे। यह देखना भी दिलचस्प होगा कि लोग जो मिल रहा है उस पर ज़्यादा भरोसा करेंगे कि जो मिलने का आश्वासन दिया गया है उस पर ज़्यादा भरोसा करेंगे।

लेकिन कुल मिलाकर, अगर ममता बनर्जी या टीएमसी जीतती है तो वह इसलिए नहीं जीतेंगे कि उन्होंने बहुत अच्छा शासन दिया है, बहुत अच्छी गवर्नेंस है उनकी। वह इसलिए जीतेंगे कि बीजेपी को अब भी बंगाल में स्वीकार्यता नहीं मिल पाई है ख़ासकर वे लोग जो मूलतः बांग्ला हैं- मतलब जो हिंदी भाषी बांग्ला नहीं हैं, जो मारवाड़ी नहीं हैं, जो बाहर से आकर बसे नहीं हैं-जो मूलतः बांग्ला जनसंख्या है, मतदाता हैं, वह अब भी उस तरह का जुड़ाव महसूस नहीं करते और बीजेपी को एक बाहरी पार्टी की तरह देखते हैं।
इसके कारण भी बड़े स्पष्ट हैं। बीजेपी के पास ममता के मुकाबले कोई बड़ा चेहरा नहीं है। राज्य में चुनाव प्रचार के लिए जो बड़े-बड़े नेता आते हैं वह भी हिंदी में बोलते हैं, बांग्ला नहीं बोल पाते तो वह एक परायापन की दूरी जैसा रहता है।
फिर जो बीजेपी के ख़ास चेहरे हैं, प्रतीक हैं, राम मंदिर है, हिंदुत्व है, जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है, जिसे बीजेपी ने परिभाषित किया है उसके साथ भी बांग्ला लोग अपने को बहुत ज्यादा जोड़ नहीं पाते। क्योंकि उनके जो प्रतीक हैं वह दुर्गा हैं, शक्ति हैं, काली हैं, शिव हैं. और जो लोकल बांग्ला आइकॉन्स हैं, चाहे वह राममोहन राय हैं, चाहे सुभाष बाबू हैं, चाहे वह कुछ लोगों के लिए अमर्त्य सेन या सत्यजीत रे हैं या बिपिन चंद्र पाल हैं।
एक बड़ी बांग्ला आबादी के साथ बीजेपी उस स्तर पर संवाद स्थापित नहीं कर पाती जैसा की उत्तर भारत के अन्य राज्यों में कर लेती है। हालांकि कोई कोर कसर ना रह जाए इसके लिए भाजपा ने प्रतीकों का टोटका भी आजमाया है। बीजेपी के स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री मोदी ने झालमुरी खाकर, कोलकाता के दूसरे कोने सिक्किम में बच्चों के साथ फुटबॉल का गोल दाग कर जोड़ने का प्रयास किया है।

एक बड़ा फ़ैक्टर इस चुनाव में यह भी है कि बड़ी संख्या में बंगाल से बाहर रहने वाले लोग जो बंगाल लौट के वोट किए हैं, वे किसके पक्ष में खड़े हैं। एसआईआर की वजह से लोगों के जो वोट कटे हैं, उससे पूरे राज्य में ख़ासकर उन लोगों में जो राज्य से बाहर रहते हैं, उनमें संदेश गया है कि अगर उन्होंने वापस जाकर अपने मतदान के अधिकार का प्रयोग नहीं किया तो अगली बार शायद उनका भी वोटर लिस्ट में नाम नहीं होगा। यह बात सिर्फ़ वोटर लिस्ट की नहीं है। उनको लगता है कि कहीं हमारी नागरिकता पर ही प्रश्नचिह्न नहीं लग जाए। कहीं ऐसा नहीं हो कि जो फ़ायदे मिल रहे हैं भारतीय नागरिक होने की वजह से, चाहे वह फ्री राशन है, चाहे दूसरी सुविधाएं, उन पर कहीं आंच न आ जाए। इसलिए बड़ी संख्या में लोग बाहर से लौट के वोट डाल रहे थे, बंगाल जा रहे थे। यह वोट चुनाव परिणाम में बड़ी भूमिका निभाएगा।

नतीजा जो भी हो, दो-तीन बातें गौर करने की है। देश की राजनीति पर पश्चिम बंगाल के चुनावी परिणाम का बड़ा असर पड़ेगा। एक तो अगर टीएमसी जीतती है तो वह विपक्ष के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी। उनको आगे भी लगेगा कि बीजेपी का मुक़ाबला हो सकता है। लेकिन अगर कोई इसका यह अर्थ निकाले कि टीएमसी का जीतना कोई धर्मनिरपेक्ष ताकतों की जीत है या सांप्रदायिक ताकत की हार है तो वह भी इस चुनावी नतीजे का एक सरलीकरण होगा।
स्मरण रहे कि अगर टीएमसी चुनाव जीतती हैं तो बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम वोट की बुनियाद पर ही जीतेगी , जैसा कि सब लोग कहते हैं, ख़ासकर बीजेपी के नेता कहते नहीं थकते कि टीएमसी का तो वोट 28-30 प्रतिशत से शुरू ही होता है।
लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि बंगाल में प्रतिक्रियावादी लामबंदी अभी परवान नहीं चढ़ पा रही है। बीजेपी के जीतने लायक रिवर्स मोबिलाइजेशन नहीं हुआ है। मतलब कि सारे हिंदू एक तरफ़ हो गए, ऐसा नहीं हुआ है। वहां पर मुद्दा बांग्ला पहचान और बांग्ला सब-नेशनलिज्म का भी है। बंगाल के अधिकांश लोग बाहर से आकर रहने वालों को बंगाली नहीं मानते। आज भी यूपी बिहार के लोगों को हिंदुस्तानी कहकर संबोधित करते हैं।
ऐसे में अगर बीजेपी जीतती है तो एक तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि काफ़ी बड़ी तादाद में और काफ़ी कामयाब तरीके से हिंदू वोट का ध्रुवीकरण करने में बीजेपी कामयाब हो गई है। बीजेपी का परचम तब करीब-करीब पूरे नॉर्थ, वेस्ट, सेंट्रल और ईस्टर्न इंडिया में लहराने लगेगा। एक तरह से इन इलाकों में बीजेपी का एकछत्र राज हो जाएगा। इसका सीधा असर विपक्ष के मनोबल पर पड़ेगा। विपक्ष हतोत्साहित होंगा। हालांकि कई लोगों का मानना है कि देश के लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि देश का इतना एकतरफ़ा राजनीतिक नक्शा न बने।
बहरहाल जो भी होगा, बहुत ही दिलचस्प होने वाला है। कांटे का मुक़ाबला रहा है और अब तक के आए एग्जिट पोल से भी लग रहा है कि इस चुनाव को समझ पाना इतना आसान नहीं है।
फिर भी सभी लोगों की तरह मुझे भी ऐसा लगता है कि टीएमसी को बढ़त है। अब वह बढ़त कितनी ज्यादा सीटों में तब्दील होती है, कितना अंतर रहेगा बीजेपी और उनके बीच में, यह देखने की बात है।
कुल मिलाकर यह बहुत ही महत्वपूर्ण चुनाव है जिसका देश की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।

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