समाजवाद के 92 बरस
अनिल तिवारी
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देश भर में समाजवादी प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर जी का जन्म शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है। इस उपलक्ष में देश के कोने कोने में आए दिन कोई ना कोई आयोजन संपन्न हो रहा है। सभा संगोष्ठियों में उनके समाजवादी सरोकारों को प्रमुखता से उकेरा जा रहा है। समाज के विभिन्न वर्गों के लोग अपने-अपने दृष्टि से उनके समाजवादी राजनीतिक जीवन का आकलन कर रहे हैं। एक साधारण किसान पृष्ठभूमि के परिवार से निकलकर प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचने वाले चंद्रशेखर का जुड़ाव समाजवादी आंदोलन से शिक्षा के दौरान ही हो गया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में मी की पढ़ाई के दौरान उन्होंने पहले समाजवादी संगोष्ठी हिंदू हॉस्टल के कामन हाल में आयोजित कराने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। उस संगोष्ठी का संचालन अंबादत्त पंत ने किया था। सगोष्ठी को विश्वविद्यालय छात्र संघ के तत्कालीन अध्यक्ष काशी नाथ मिश्र ने भी संबोधित किया था। राजनीति शास्त्र में एम ए करने के बाद पंत जी की राय से आगे के शोध के लिए चंद्रशेखर जी भू गए और वहां के कुलपति आचार्य नरेंद्र देव जी से मिलकर शोध करने की जिज्ञासा प्रकट की। आचार्य नरेंद्र देव जी ने उन्हें समझाया की शोध करने से अच्छा है समाजवादियों के साथ मिलकर समाज को बदलने समाज में खुशहाली लाने का प्रयास हो। आचार्य जी के कहने पर चंद्रशेखर जी बलिया आ गए तथा समाजवादी विचारधारा के प्रचार प्रसार में लग गए। आगे चलकर संसदीय राजनीति में हिस्सा लेने की ललक में वह कांग्रेस के करीब गए लेकिन लंबे समय तक टिक नहीं पाए। आपातकाल के दौरान समाजवादियों की पहल पर गठित जनता पार्टी के अध्यक्ष बने, फिर प्रधानमंत्री भी बने लेकिन विचारधारा के तौर पर वे आखिर तक समाजवादी ही रहे। बोलचाल खान-पान रहन-सहन वेशभूषा सब में वह एक ठेठ समाजवादी थे। बलिया जिले के मूनछपरा गांव के कई बार प्रधान रहे समाजवादी नेता राधा किशुन तिवारी चंद्रशेखर जी से जुड़ा एक संस्मरण अक्सर सुनाते थे। बापू भवन में समाजवादियों की बैठक चल रही थी, उसी दौरान किसी कार्यकर्ता ने सूचना दी कि उसके किसी परिचित को कोतवाल साहब ने पकड़ लिया है। मीटिंग खत्म होते ही चंद्रशेखर जी राधा किशुन व अन्य दो लोगों के साथ कोतवाल साहब के यहां पहुंचे और गिरफ्तार व्यक्ति को छोड़ने के लिए कहा। कोतवाल ने कहा कि उसके पास से माल बरामद हुआ है, कैसे कैसे छोड़ दिया जाए। चंद्रशेखर ने पूछा क्या माल मिला है, तो कोतवाल ने बताया कि साइकिल बरामद हुई है। तब चंद्रशेखर जी ने बड़े ही संयत भाव से कोतवाल साहब को समझाया कि “अरे कोतवाल साहब, समाजवादी कार्यकर्ता है। कोई जरूरत का सामान लाने की जल्दीबाजी में किसी की साइकिल लेकर चला गया होगा। जिसकी साइकिल है उसे दे दीजिए और इसको भी छोड़ दीजिए। कोतवाल मुस्कुराया और कहा कि नेताजी मैं इन्हें अभी छोड़ दूंगा लेकिन इन्हें कहिए कि ये भी अपनी बुरी आदतें छोड़ दें। इस घटना के बाद शिवमंगल ने समाजवाद का झंडा थाम लिया। बाद में उनका उपनाम ‘गणतंत्र बाबा’हो गया था। इलाके के लोग उन्हें गणतंत्र बाबा के नाम से ही जानते बुलाते थे। वे जब तक जीवित रहे समाजवादी बनकर ही रहे।
इसी तरह से तिनका तिनका जोड़कर तब के नेताओं ने देश में समाजवाद को खड़ा किया था। चंद्रशेखर जी की जन्म शताब्दी के बहाने पड़ताल करने की कोशिश करते हैं कि आज देश में समाजवाद की तासीर कैसी है।
आज से 92 वर्ष पहले, 17 मई 1934 को सौ समाजवादियों ने मिलकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया था। असल में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की नींव नासिक जेल में ही पड़ गई थी। जहां कांग्रेस के भीतर सक्रिय समाजवादियों ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाने का निर्णय लिया था। इतिहास के मुताबिक सोशलिस्टों ने दो-तीन वर्ष पहले ही बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब एवं अन्य राज्यों में संगठित समूह के तौर पर कार्य करना शुरू कर दिया था।
आज जब भारत में समाजवादियों की पहले संगठित राजनीतिक राष्ट्रीय दल के गठित होने के बाद 92 वर्ष हो रहे हैं, तब यह जरूरी है कि यह मूल्यांकन किया जाए कि समाजवादी विचार को आगे बढ़ाने में गांधी, आचार्य नरेंद्र देव, जेपी, लोहिया, यूसुफ मेहर अली, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, फरीदुल अंसारी, सत्यवती, अरुणा आसफ अली, अच्युत पटवर्धन, चंद्रशेखर से लेकर कर्पूरी ठाकुर, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडीज, राजनारायण, मधु दंडवते, एसएम जोशी, मृणाल गोरे आदि समाजवादी नेताओं की विरासत को संभालने वाले कहां पहुंचे हैं। पड़ताल यह भी होनी चाहिए कि लोहिया जी की चेतावनी ‘सुधरो या टूटो’ का समाजवादियों पर कैसा असर रहा।
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन के बाद समाजवादियों ने केवल कांग्रेस पार्टी को वैचारिक दिशा ही नहीं तमाम समाजवादी कार्यक्रम भी दिए। इतिहास यह बताता है कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय बैठकों और राज्य इकाइयों में जो प्रस्ताव पारित होते थे, उन पर कांग्रेस पार्टी में गंभीर चर्चा हुआ करती थी तथा तमाम महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव स्वीकार कर लिये जाते थे।
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की आजादी के आंदोलन में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन को सफल बनाने में रही। 8 अगस्त 1942 को गांधी जी द्वारा ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का जो नारा दिया था उसे मुंबई के तत्कालीन मेयर युसूफ मेहर अली ने गढ़ा था। महात्मा गांधी सहित सभी वरिष्ठ कांग्रेसियों को अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिये जाने के बाद समाजवादियों ने भूमिगत आंदोलन चलाने का निर्णय लिया था। 9 अगस्त को समाजवादी नेत्री अरुणा आसफ अली ने ग्वालिया टैंक (आज के आजाद मैदान) मुंबई में तिरंगा फहराया था। यह कौन भूल सकता है कि जेपी ने इसी आंदोलन के दौरान हजारीबाग की जेल से भागकर भूमिगत आंदोलन का नेतृत्व किया।
दुनिया के इतिहास में 1942 का आंदोलन सबसे बड़ा जन आंदोलन माना जाता है। क्योंकि इस आंदोलन में पचास हजार से ज्यादा आंदोलनकारी शहीद हुए तथा सजाएं हुई थीं। डॉ लोहिया और जेपी को लाहौर की जेल में रखा गया था। अंग्रेजों ने डॉ लोहिया को लाहौर की उसी जेल में रखा था जहां से भगतसिंह को फांसी दी गई थी। टॉर्चर करने के कारण लोहिया का स्वास्थ्य बिगड़ गया था।
जब यह साफ हो गया था कि अंग्रेज सत्ता का हस्तांतरण करेंगे, तब कांग्रेस के सभी नेताओं को छोड़ दिया गया, लेकिन सबसे आखिर में, गांधीजी के हस्तक्षेप के बाद जेपी-लोहिया को रिहा किया गया। डॉ लोहिया इलाज कराने गोवा पहुंचे थे लेकिन जब उन्हें गोवा के स्थानीय नागरिकों ने पुर्तगाली शासकों के अत्याचारों की व्यथा सुनाई तब डॉ लोहिया ने पहली बार पुर्तगाली शासकों को ललकारा। बाद में 1948 में सोशलिस्ट पार्टी के कांग्रेस से अलग हो जाने के बाद समाजवादियों ने मधु लिमये, एसएम जोशी, एनजी गोरे, मधु दंडवते के नेतृत्व में सतत आंदोलन चलाकर 15 वर्ष बाद गोवा को पुर्तगाली शासन से मुक्त कराने में सफलता हासिल की थी।
आजादी मिलने के बाद कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी देश को समाजवाद की दिशा में जिन कार्यक्रमों को लागू कर देश का राष्ट्र निर्माण कर आगे ले जाना चाहती थी, उसके लिए कांग्रेस पार्टी और सरकार तैयार नहीं थी। कांग्रेस का दक्षिणपंथी समूह चाहता था कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी या तो कांग्रेस में विलय करें या समाजवादी, कांग्रेस पार्टी से अलग हो जाएं। इस मुद्दे पर समाजवादियों ने 1948 में कानपुर सम्मेलन में विस्तृत चर्चा की। चर्चा करने के बाद कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से कांग्रेस शब्द हटाने का निर्णय लिया ताकि कांग्रेस सरकार पर दबाव डालकर उसे समाजवादी रास्ते पर ले जाया जा सके।
अलग होने का एक कारण यह भी था कि उस समय देश में कांग्रेस और सोशलिस्टों के अलावा कम्युनिस्टों और हिंदू महासभा की वैचारिक धारा मजबूत थी। हालांकि ईएस नंबूदिरीपाद जैसे कम्युनिस्ट कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में ही थे। परंतु 1934 से 1948 के 14 वर्षों के अनुभव और हिंसा, केंद्रीकरण, रूस की कम्युनिस्ट पार्टी के भारत के कम्युनिस्टों के फैसलों पर प्रभाव एवं रूसी क्रांति के बाद के अनुभव के साथ-साथ 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कम्युनिस्टों की भूमिका आदि प्रश्नों पर समाजवादियों और वामपंथियों में मतभेद थे।
समाजवादी चाहते थे कि कांग्रेस का विपक्ष भी लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी रहे, इस कारण सत्ता छोड़कर समाजवादियों ने विपक्ष में रहकर राष्ट्र निर्माण का मोर्चा सम्हाला। प्रधानमंत्री बन जाने के बाद जवाहरलाल चाहते थे कि समाजवादी कांग्रेस का संगठन सम्हालें। परंतु डॉ लोहिया ने शर्त लगा दी कि स्वयं प्रधानमंत्री और मंत्रियों का संगठन में कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए तथा जरूरत पड़ने पर संगठन को सरकार के खिलाफ खड़ा होने का अधिकार होना चाहिए। बाद में जेपी ने भी 14 सूत्री पत्र दिया, जिसे कांग्रेस ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
इतिहास गवाह है 1934 से अब तक अनेक समाजवादी नेता घूम-फिर कर कांग्रेस में शामिल होते रहे हैं।
1952 में पहला आम चुनाव सोशलिस्ट पार्टी ने जोर-शोर से लड़ा लेकिन उसे केवल 10% वोट ही प्राप्त हुए क्योंकि देश के मतदाताओं ने कांग्रेस पार्टी को ही आजादी दिलाने वाली पार्टी के तौर पर स्वीकार किया।
जेपी के मन में कुछ निराशा पैदा हुई। उन्होंने विनोबा जी के साथ सर्वोदय का नया रास्ता अपनाया। आम चुनाव के बाद किसान मजदूर प्रजा पार्टी के नेता आचार्य कृपलानी, जो कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे थे, एमएन रॉय और सुभाष चंद्र बोस के अनेक समर्थक समूहों ने सोशलिस्ट पार्टी के साथ विलय कर सोशलिस्ट पार्टी को नई ऊर्जा दी।
डॉ लोहिया ने सोशलिस्टों की पहली बार केरल में बनी सरकार द्वारा गोली चलाने के बाद खुद ही चुनौती दे डाली। जिसके बाद पार्टी में पहला बड़ा बिखराव हो गया। यहीं जुड़ने और टूटने का जो सिलसिला समाजवादियों के बीच शुरू हुआ वह लगातार चलता रहा।
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी समाजवादियों के बड़े समूह के तौर पर कार्य करती रही तथा डॉ लोहिया के नेतृत्व में समाजवादी संघर्ष करते रहे। बाद में दोनों दल फिर एकसाथ आए फिर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी बनी। इस बीच डॉ लोहिया ने कांग्रेस को हराने के लिए गैरकांग्रेसवाद की रणनीति बनाई। जिसके चलते पहली बार 7 राज्यों में गैरकांग्रेसी पार्टियों की संयुक्त सरकारें बनीं, हालांकि वे ज्यादा समय नहीं टिक सकी।
वर्ष 1974 में महंगाई के सवाल को लेकर छात्रों ने गुजरात और बिहार में आंदोलन शुरू किया। जो राज्य सरकारों के खिलाफ तेजी से आगे बढ़ा। जिसका नेतृत्व युवाओं द्वारा समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण को सौंपा गया। ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन द्वारा जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में रेल हड़ताल हुई, इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया गया। उन्होंने देश में आपातकाल लागू किया। 19 महीने तक संपूर्ण विपक्ष के नेताओं को जेल में डाल दिया गया। समाजवादी भूमिगत रहकर तथा देश और विदेश में अलग-अलग तरीकों से इंदिरा गांधी की तानाशाही को चुनौती देते रहे। उसी समय बड़ौदा डायनामाइट कांड में जॉर्ज फर्नाडिस एवं अन्य साथियों को पकड़ा गया। अंततः चुनाव का ऐलान हुआ। समाजवादी नेता जेपी की प्रेरणा से जनता पार्टी का गठन हुआ, जिसने देश में लोकतंत्र बहाल किया।
1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार ढाई साल ही चल सकी। जनता पार्टी भी बिखर गई लेकिन सोशलिस्टों ने सोशलिस्ट पार्टी के नाम से कोई पार्टी नहीं बनाई। समाजवादी जनता पार्टी, दमकिपा (दलित, मजदूर किसान पार्टी), लोक दल एवं अन्य छोटी-छोटी पार्टियां बनाकर कार्य करने लगे। 1989 में फिर समाजवादियों ने अगुवाई कर जनता दल का गठन किया। वीपी सिंह के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चे की सरकार बनी। लेकिन वह भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। इंद्र कुमार गुजराल, एचडी देवेगौड़ा और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने परंतु जनता दल बिखर गया। 1992 में मुलायम सिंह ने फिर समाजवादी पार्टी का गठन किया, जो आज तक भारतीय राजनीति में अपना दखल बनाए हुए है लेकिन उसका प्रभाव उत्तर प्रदेश तक ही सीमित है। लालू यादव के नेतृत्व में 1997 में राष्ट्रीय जनता दल का गठन हुआ। शरद यादव के नेतृत्व में जनता दल (यू) का गठन 2003 में हुआ तथा 1999 में जनता दल (सेकुलर) का गठन देवेगौड़ा के नेतृत्व में हुआ। लेकिन यह सभी नवगठित दल मौका परस्त साबित हुए। सत्ता पाने के लिए इन्होंने समय पर विचारधारा से समझौता भी किया।
इसके अलावा भी देश में सोशलिस्ट फ्रंट, समाजवादी जन परिषद, सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया), लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी, समाजवादी समागम आदि कई समाजवादी समूह कई राष्ट्रीय स्तर पर कई क्षेत्रीय दल के रूप में कार्य कर रहे हैं। अधिकांश पुराने तपे तपाए समाजवादी अब नहीं, कुछ का मुंह भंग हो गया। कुछ समाजवादियों ने राजनीतिक दलों का रंग ढंग देखकर अपनी निष्ठा बदल ली। बानगी के तौर पर प्रखर समाजवादी चिंतक चंद्रशेखर के पुत्र भाजपा से राज्यसभा सांसद हैं, बहू भाजपा से विधानसभा की प्रबल दावेदार हैं। जनता जनार्दन जनकवि गोरख को याद कर “समाजवाद ए बबुआ धीरे-धीरे आई”खुद को समझा-बहला रही है।
समाजवादी चंद्रशेखर की स्मृति को नमन।
