अनिल तिवारी
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देश में जब भी कोई चुनाव आता है तो आधी आबादी को और अधिक सशक्त करने का दावा करते हुए तरह-तरह की रेवड़िया बांटने का दौर शुरू हो जाता है। इस रेस में कोई दल पीछे नहीं रहना चाहता। जलसे आयोजित कर एक से बढ़कर एक घोषणाएं होने लगती है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने पहले से चल रही लक्ष्मी भंडार योजना की धनराशि बढ़ाने की बात कही है, तो बंगाल में अपना रसूख फिर से लौटने का राह देख रही कांग्रेस महिलाओं को ₹2000 मासिक सहायता देने का वादा कर रही है। मुफ्त बांटकर महिलाओं को अपने पाले में करने का आलम यह है कि कुछ समय पहले बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे का उद्घाटन करते वक्त देश को मुफ्त की रेवड़ी से दूर रहने की नसीहत देने वाले देश के प्रधानमंत्री (भाजपा के स्टार प्रचारक) नरेंद्र मोदी रविवार को बंगाल की एक चुनावी सभा में थे जहां उन्होंने मंच से ऐलान किया कि महिलाओं को हर साल 36000 रुपए नकद, बेटियों की शिक्षा के लिए 5000 रुपए तथा खेती में लगी महिलाओं को किसान निधि से अलग ₹9000 सालाना की रकम देकर उन्हें सशक्त बनाया जाएगा।
फिलहाल दो राज्यों पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में मतदान होना है। इन दोनों ही राज्यों में महिला मतदाता नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में है। बंगाल में अभी एसआईआर को लेकर विशेष अपीलेट ट्रिब्यूनल में सुनवाई चल रही है और मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक महिला मतदाता पुरुषों के लगभग बराबर हैं। वहीं तमिलनाडु में महिला मतदाताओं की संख्या 51% है, जबकि पुरुष मतदाता 49% ही हैं। पश्चिम बंगाल की तीन करोड़ 40 लाख महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए सशक्तिकरण के नाम पर खजाना खोल हर संभव कोशिश की जा रही है।
राजनीतिक पंडितों का तो यहां तक मानना है की दोनों राज्यों की महिला मतदाताओं को ध्यान में रखते हुए ही सत्ताधारी दल द्वारा संसद का विशेष सत्र आहूतकर महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए आनन फानन में मन माफिक संशोधन के साथ महिला आरक्षण बिल प्रस्तुत किया गया था। उम्मीद की जा रही थी की बिल पारित होने पर महिलाएं बिल पारित कराने वाली पार्टी के पक्ष में एकमुश्त मतदान कर शुक्रिया अदा करेंगी। पार्टी की ओर से भी इस लाइन पर प्रचार प्रसार करने की रणनीति तैयार की गई थी। लेकिन चौकन्ने विपक्ष की एकजुट रणनीति के कारण संसद द्वारा प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। फिर क्या था “चित्त भी मेरी और पट भी मेरी” को चरितार्थ करते हुए संसदीय आपदा को अवसर में बदलने की कवायद शुरू हुई। छात्र आंदोलन, किसान आंदोलन, उग्र आतंकी घटनाओं, गलवान घाटी प्रकरण, मणिपुर हिंसा, मनमाना अमेरिकी टैरिफ, ट्रंप के बड़बोलापन आदि अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मसलों पर लगभग चुप रहने वाले प्रधानमंत्री ने इसे लेकर राष्ट्र के नाम संदेश दिया। अपने तकरीबन आधे घंटे के संबोधन में विपक्ष को कोसते हुए जिम्मेदार ठहराया तथा दोनों राज्यों की महिला मतदाताओं से पार्टी के पक्ष में सहानुभूति अर्जित करने की कोशिश की।
संचार माध्यमों के अध्ययन से यह स्पष्ट होने लगा है कि बंगाल और तमिलनाडु के चुनावी प्रचार में महिला सशक्तिकरण का मुद्दा भी आम चर्चा में है। हाल के बिहार चुनाव में महिला सशक्तिकरण के नाम पर जिस तरह से नगद राशि बांटकर महिला वोट हथियाने की कोशिश हुई थी ठीक उसी तर्ज पर बंगाल और तमिलनाडु की महिलाओं को भी सशक्तिकरण के नाम पर मुफ्त की रेवड़ी देने की घोषणाएं हुई हैं।
दोनों राज्यों के खजाने का सच किसी से छिपा नहीं है। दोनों ही राज्यों में पहले से चल रही लोक लुभावना योजनाओं के कारण बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च हो जा रहा है। दोनों ही राज्यों में किसी नई नगद राशि योजना को लागू करने का मतलब होगा की पहले से ही लगभग ठप्प पड़ी विकास योजनाओं के लिए भविष्य में धन का आवंटन और अधिक मुश्किल का सौदा हो जाएगा। पश्चिम बंगाल पहले से ही इतना आर्थिक दबाव में है कि वहां अभी तक सातवां वेतन आयोग ही पूरी तरह से लागू नहीं हो पाया है। राज्य के कर्मचारी अपनी पावती के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटा चुके हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2025 में बंगाल के राजस्व का 42% ब्याज में ही चला गया, वहीं तमिलनाडु में यह 28 प्रतिशत रहा।
समय-समय पर रिजर्व बैंक, सुप्रीम कोर्ट, आर्थिक विशेषज्ञ मुफ्त की योजनाओं को लेकर चिंता प्रकट कर चुके हैं। ऑफ द रिकॉर्ड विभिन्न राजनीतिक दलों के समझदार नेता भी इसे लोकतंत्र के लिए एक गलत व्यवहार बताते हैं लेकिन विभिन्न पार्टियों के चुनावी संतुलनकार मुफ्त की योजनाओं को जीत के फार्मूले के रूप में देखते हैं।
