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सताने लगी है गर्मी, डरा रही है विश्व बैंक की रिपोर्ट

अनिल तिवारी
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प्रचंड गर्मी का प्रकोप बढ़ रहा है। राजधानी दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में बढ़ते तापमान से लोग हलकान हैं। रोजमर्रा की जरूरतों से चिलचिलाती धूप में निकलने के कारण बीमारों की संख्या में वृद्धि हो रही है। इस बीच विश्व बैंक की ताजी रिपोर्ट में बढ़ती गर्मी को लेकर एक डरावने आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2050 तक शहरों में रहने वाले गरीब लोगों की संख्या जो खतरनाक गर्मी झेलने के लिए बाध्य है वह 700 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी। यानी कि आज जितने गरीब गर्मी से प्रभावित हैं उससे  7 गुना ज्यादा आबादी गर्मी की आग में झुलसने के लिए मजबूर होगी।
देश की राजधानी दिल्ली का तापमान आज 43-44 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है।इसका सीधा असर काम धंधे के लिए घर से बाहर निकलने वाले कामगारों, स्कूल कॉलेज जाने वाले विद्यार्थियों आदि पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ रहा है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि वैश्विक दक्षिण के अधिकांश शहरों में अर्बन हीट, आईलैंड के तापमान से 10 डिग्री तक ऊपर चली गई है। इससे बेघर लाखों लोगों के लिए गर्मी मुसीबत का सबब बन रही है वही अर्थव्यवस्था के भी बड़े नुकसान की आशंका जताई जा रही है। पशु पक्षी भी बेहाल है।
ऐसा नहीं है कि पृथ्वी नामक ग्रह पर पहले गर्मी नहीं थी। गर्मी पहले भी थी लेकिन तब का समाज प्राकृतिक रूप से गर्मी से बचाव का माकूल इंतजाम करता रहा था। गर्मी से बचाव की दृष्टि से लंबी आयु वाले पेड़ पौधों के बगीचे लगाए जाते थे। पोखर, तालाब, ताल तलैया, कुएं, बावड़ियों का निर्माण प्राथमिकता में था। हिंदी के प्रसिद्ध कवि श्रीधर पाठक को जब तेज गर्मी ने व्याकुल किया तो राहत के लिए उन्होंने भी बगीचे की राह ली थी।
जेठ के आतप दारूण से, तपके जगती तल जावे जला। नभमंडल छाया मरुस्थल सा दल बांध के अंधड़ आवे चला।
जल हीन जलाशय व्याकुल है, पशु पक्षी प्रचंड है भानु कला। किसी कानन कुंज के धाम में प्यारे, चलो विश्राम करो तो भला।।
अब शहर बगीचा विहीन हो चुके हैं। आबादी बढ़ने के साथ गांव में भी पेड़ों की संख्या लगातार घटते हुए अब ना के बराबर रह गई है। गांवों में नए पेड़ लग नहीं रहे हैं और पुराने बच्चे खुचे पेड़ लगातार कट रहे हैं। ऐसे में गर्मी से पगलाए पथिक को कानन कुंज की तो बात छोड़िए तरुवर की छाया भी सहज नसीब नहीं है।
अगर आपको याद हो तो वर्ष 2023 में बनारस में राह चलते लोगों के अचानक गिरकर मर जाने की खबरें सुर्खियां बनी थी। तब कहा गया कि करोना महामारी के साइड इफेक्ट के कारण लोगों की मौतें हो रही है। जिस दिन सबसे ज्यादा तेरह मौतें बनारस में दर्ज की गई उस दिन वहां का टेंपरेचर 44 डिग्री था। सभी मरने वालों को अस्पताल ले जाया गया किंतु उन्हें इलाज की जरूरत नहीं पड़ी। यानी गर्मी ने शरीर को संभलने, लड़ने बचाव करने का कोई मौका नहीं दिया।
विश्व बैंक की रिपोर्ट पर गौर करें तो आज शहरों के साथ-साथ देश के अधिकांश गांवों में गर्मी एक साइलेंट किलर की तरह बढ़ रही है। खासकर वैश्विक दक्षिण के गरीब शहरों में यह समस्या बहुत भयानक गति से पैर पसार रही है। लगातार बढ़ते शहर कस्बा, कम संसाधन, ग्लोबल वार्मिंग, आदि के कारण बढ़ती गर्मी लोगों की जिंदगी में जहर घोल रही है। यह गर्मी अब सिर्फ गर्मी नहीं रही बल्कि बेरोजगारी भुखमरी के साथ-साथ असमय मौत का भी कारण बन रही है।
विश्व बैंक की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है की गर्मी पर काबू करने के लिए शीघ्र कदम नहीं उठाया जाता है तो परिणाम भयानक हो सकते हैं। काम धंधा ठप हो सकता है, स्कूल कॉलेज बंद पड़ जाएंगे, अस्पतालों में मरीजों की लाइन लगेगी, बिजली की मांग इतनी बढ़ेगी की बिजली का संकट गहरा जाएगा, प्रदूषण बढ़ेगा, गरीबी और असमानता बढ़ेगी, लोग शहर छोड़ कर बदहवास भागने लगेंगे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि गर्मी अब सिर्फ मौसमी परेशानी नहीं है। यह शहरों की पूरी व्यवस्था को चूर-चूर कर सकती है। अगर शहर अभी से तैयार नहीं हुए तो लाखों बेघर तो होंगे ही, बड़ी संख्या में लोग भूखे मरेंगे और गर्मी के वजह से होने वाली मौतें आम हो जाएगी।
विश्व बैंक ने गर्मी की इस डरावनी स्थिति से निपटने के लिए यूएन हैबिटेट और यूएनईपी के साथ मिलकर हिट मैनेजमेंट के लिए एक पुस्तिका तैयार की है जिसमें बताया गया है कि गर्मी के खतरे को कैसे मापा जाए? कैसे तैयार रहें? क्या-क्या समाधान अपनाया जाय? पुस्तिका में कहा गया है कि शहरों को अब गर्मी के मामले को हल्के में नहीं लेना चाहिए। इसे मौसमी समस्या मानकर नजरअंदाज करने से पूरा शहर तहस-नहस हो सकता है। वैज्ञानिकों ने भी चेतावनी दे रखी है कि गर्मी रोजमर्रा की जिंदगी को बदल रही है। अगर शहर अभी सक्रिय नहीं हुए तो 2050 तक गर्मी लाखों गरीबों की जिंदगी छीन लेगी। अब समय है कि सरकार, शहर प्रशासन और लोग मिलजुल कर संकट से लड़े वरना आने वाले वर्षों में शहर आग के समंदर में तब्दील हो जाएंगे जहां सांस लेना भी मुश्किल होगा। कस्बा और गांव भी इससे अछूते नहीं रह गए हैं। जिस रफ्तार से परिवार बढ़ रहे हैं, बंट रहे हैं और पेड़ों की संख्या घट रही है, गर्मी के कारण जीवन वहां भी पहले की तुलना में कठिनतर होता जा रहा है।

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