यह वक्त है आत्म समीक्षा का
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अनिल तिवारी
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पिछले 140 वर्षों में दुनिया के साथ भारत में भी संगठित क्षेत्र के मजदूरों की सेवा शर्तों में काफी हद तक सुधार हुआ है। इससे उनकी दशा बदली है, लेकिन देश में मजदूरों के बड़े क्षेत्र संगठित क्षेत्र के कामगारों की स्थिति निरंतर और अधिक बदतर तथा श्रम-साध्य होती गई है। वैश्वीकरण के बाद से बाजारवाद और पूंजीवाद पर लहालोट सरकारों ने तो आंखें मूंद ही ली हैं, राजनीतिक दलों और बहुतायत मजदूर संगठनों ने भी मुंह फेर लिया है। खासकर भारत में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कामगारों का कोई माई-बाप नहीं है। असंगठित क्षेत्र के मजदूर जांगर तोड़ मेहनत कर किसी तरह दो जून की रोटी जुटाते हैं, लेकिन उनकी अन्य आवश्यक बुनियादी ज़रूरतें भाग्य और भगवान के भरोसे ही है। जब कभी देश में कोई समस्या खड़ी होती है तब सबसे ज्यादा प्रभावित यही वर्ग होता है। करोना महामारी के दौरान करोड़ों मजदूर सिर पर गठरी लादे हजारों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हुए थे। उस दौरान सैकड़ो मजदूरों की असमय मौत हो गई थी। अभी हाल में गैस की किल्लत हुई तो इसका खामियाजा भी इसी वर्ग को सबसे अधिक उठाना पड़ा। हजारों की संख्या में मजदूर अपना काम का छोड़कर पलायन के लिए मजबूर हुए।
वर्ष 1886 में मजदूरों ने पहली दफा शिकागो शहर में रैली निकाली थी तो उनकी एक ही मांग थी कि हमारे काम के घंटे 8 होने चाहिए। पुलिस ने उनके ऊपर गोलियां चलाई जिसमें सैकड़ो मजदूर शहीद हुए लेकिन अंततः उनकी बात मान ली गई और काम के घंटे 8 तय किए गए। उसी की याद से हम ‘मई दिवस’ मनाते आ रहे हैं। संगठित क्षेत्र के मजदूरों के जीवन स्तर में कुछ सुधार हुआ लेकिन कुल लगभग 50 करोड़ मज़दूरों में 95% मजदूर असंगठित क्षेत्र से हैं जिनके लिए आज भी ना तो कार्य के घंटे निर्धारित हैं और ना ही कोई वेतन आयोग है। न्यूनतम मजदूरी कानून का झुनझुना केवल कागजों पर ही सीमित है। इनके लिए ना काम की निश्चितता है और ना ही भविष्य निधि या पेंशन की व्यवस्था। असंगठित क्षेत्र के मजदूर के लिए न हीं कोई नियम कानून है, न हीं सामाजिक सुरक्षा और ना ही काम करने का सही माहौल। पूंजीवाद के इस दौर में मजदूर के खिलाफ समूचे देश में शोषण का साम्राज्य कायम है। आजादी के 78 साल बाद भी उनकी दशा में कोई सुधार नहीं हो पाया है इनके लिए आजादी मिलने और लोकतंत्र का राज कायम होने का कोई मतलब नहीं है। वह आज भी उतने ही शोषित हैं जितना गुलामी के दौरान थे।
मजदूरों के लिए एक मई का दिन त्योहार माना जाता है, क्योंकि इस दिन सारी दुनिया के मजदूरों के लिए न्याय और सम्मान के जीवन की जरूरत को रेखांकित किया गया है। यह दिन सरकारों, राजनीतिक दलों और सभी क्षेत्र के मजदूर आंदोलनों की आत्म समीक्षा का भी दिन होता है। यह तारीख श्रमजीवी वर्ग और बाकी समाज के परस्पर संबंधों के मूल्यांकन का भी दिन है। आइए,01 मई 2026 को इससे जुड़े कुछ प्रश्नों पर विचार करते हैं।
पहला प्रश्न यही है कि हमारे देश और समकालीन दुनिया में मजदूरों की क्या स्थिति है? उत्तर बहुत ही स्पष्ट है कि यह दौर पूंजी की प्रमुखता का दौर है। यह ऐसे श्रम का दौर है जिसे हम कुशल श्रम, सफेदपोश श्रम, और सेवा क्षेत्र के श्रम की प्रधानता को ज्यादा महत्व देने वाला दौर कह सकते हैं। यानी खेतों में काम करने वाले और उत्पादन प्रक्रिया के कारखाना पक्ष को संभालने वाले श्रमजीवी की तुलना में सूचना तकनीक, स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्तीय सेवाएं, पर्यटन और मनोरंजन जैसे सेवा क्षेत्र से जुड़े श्रमिकों का महत्व उत्तरोत्तर बढ़ रहा है। कारखाना और खेतिहर मजदूर के बारे में अब कोई गंभीरता से बात भी नहीं करता।
दूसरा प्रश्न यह उपस्थित होता है कि आज संगठित मजदूर आंदोलन की दिशा क्या है? आज से 50 साल पहले इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट था। तब सारी दुनिया के मजदूर आंदोलन जनतंत्र को ज्यादा सार्थक बनाने के लिए, आर्थिक जनतंत्र के साथ राज्य सत्ता को लोक हितकारी बनाने के लिए, कल्याणकारी लोकतंत्र से लेकर समाजवादी लोकतंत्र के लिए एक साथ प्रयास कर रहे थे और कहीं-कहीं संघर्ष भी चलता रहता था। लेकिन पिछले 25 वर्षों में संगठित मजदूर आंदोलन की दिशा तेजी से बदली है। अब व्यवस्था परिवर्तन की बजाय व्यवस्था में उचित हिस्सेदारी ही मजदूर संगठनों का लगता है लक्ष्य बन चुका है। आज ‘दुनिया के मजदूरों एक हो और पूंजीवाद में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करो’ यही एक साझा नारा नजर आता है। पहले का नारा दूसरा था। क्रांतिकारी चिंतक कार्ल मार्क्स ने अपने मशहूर घोषणा पत्र में स्पष्ट किया था कि ‘दुनिया के मजदूरों एक हो, आप इस व्यवस्था में कुछ हासिल नहीं कर सकते इसलिए इस व्यवस्था को तोड़ो, इसे बदलो और इसमें मजदूरों के खोने के लिए कुछ नहीं सिवाय उनकी जंजीरों के’।
एक तीसरा सवाल यह भी है कि आज के दौर में उत्पादन प्रक्रिया में मजदूरों की भूमिका क्या है? अब कंप्यूटरीकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बहुदेशीकरण के कारण समूची उत्पादन प्रक्रिया में क्रांतिकारी परिवर्तन हो रहा है जिसके चलते एक तरफ मजदूर का श्रम मशीन की क्षमता के आगे पराजित सा खड़ा हो रहा है और दूसरी तरफ मजदूरों के संगठन का राष्ट्रीय दायरा अंतरराष्ट्रीयता के कारण श्रम प्रक्रिया के अंतरराष्ट्रीयकरण के प्रभाव में लगभग अप्रासंगिक होता जा रहा है। इसलिए आज हम देश के पैमाने पर मजदूरों की तरफ से पहल की क्षमता को लगातार घटता हुआ देख रहे हैं और मशीन के बढ़ते दबाव के कारण अब मजदूर संगठनों में भी वह आत्मविश्वास नहीं दिखाई देता जो कंप्यूटर के दौर के पहले के मजदूर आंदोलनों में था।
ऐसे में एक सवाल यह भी है कि 01 मई की तारीख का भविष्य क्या है? मुझे लगता है कि मजदूर आंदोलन जनसाधारण के सम्मानजनक जीवन की तलाश के लिए चल रहे आंदोलनों से जुड़ता है तो यह सभी जन आंदोलनों का एक बुनियादी तत्व बनकर अन्य आंदोलनों को भी बल दे सकेगा। अगर मजदूर आंदोलन अंतर्मुखी होता चला जाएगा, अपने कामकाज की परिस्थितियों अपनी तनख्वाहों को बाकी समाज के सवाल से ज्यादा महत्व देगा और अपने को बाकी समाज के सरोकारों से काट लेगा तो यह आत्महत्या का रास्ता ही होगा। क्योंकि आज वह आंदोलन जो स्त्री प्रश्न पर, सामाजिक न्याय के प्रश्न पर, नागरिकों के मानव अधिकार के प्रश्न पर, पर्यावरण रक्षा के प्रश्न पर चुप रहेगा और जब कभी अपने आंदोलन के लिए ललकार लगाएगा तो बाकी समाज भी प्रतिध्वनि के लिए प्रस्तुत नहीं होगा। ऐसे में सभी मजदूर संगठनों को वर्तमान के सवाल से खुद को जोड़ते हुए आत्मा समीक्षा के लिए तैयार होना होगा तथा विभिन्न विषयों पर आंदोलित लोगों को, संगठनों और समूहों को साथ लेकर चलने की जरूरत को प्राथमिकता से शामिल करना होगा। और इस संदर्भ में 01 मई 2026 की तारीख आंदोलन के लिए आत्म समीक्षा की तिथि हो सकती है। क्योंकि आज आत्मविश्वासहीनता हमारे मजदूर आंदोलन की सबसे बड़ी समस्या है। इस आत्मविश्वास को वापस पाने के लिए व्यापक सामाजिक सरोकारों से जुड़ने का उपाय ढूंढना ही होगा। पहले समाजवाद, साम्यवाद और राष्ट्रवाद जैसे विचार दर्शन इस आत्मविश्वास का मार्ग प्रशस्त करते थे। क्योंकि वह बाकी समाज के सरोकारों से मजदूर आंदोलन को जोड़ते थे। लेकिन आज यह सभी वाद अपनी सीमा परिधि में सिमट कर खुद आभाविहीन हो चुके हैं। इन सब के ऊपर पूंजीवाद और बाजार बाद हावी हो गया है। अमेरिका, रूस, चीन, इंग्लैंड, भारत, सब की गति एक जैसी है। इसलिए भी यह समय हर तरह से आत्म समीक्षा का समय है और मजदूर आंदोलन को अपने इतिहास और अपने भविष्य को जोड़ने वाला वर्तमान बनाने के लिए नई सक्रियता के साथ सजग प्रयास के लिए प्रस्तुत करना होगा।
