फिर गुलामी जैसी स्थिति में फंसता जा रहा मजदूर
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अनिल तिवारी
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शोषण के खिलाफ लंबे अरसे से ओढ़ रखी चुप्पी तोड़कर कामगार जब एनसीआर की सड़कों पर बगावत का झंडा लेकर उतरे तो सरकार के भी कान खड़े हुए। मजदूरों का संघर्ष रंग लाया, सरकार को न्यूनतम मजदूरी में 21% की वृद्धि की घोषणा करनी पड़ी। कामगारों की यह जीत हालांकि छोटी जीत है लेकिन यह संघर्ष 1886 में मजदूरों के ऐतिहासिक शिकागो संघर्ष परंपरा की मशाल को आगे बढ़ाने जैसा ही रहा। वर्ष 1886 में शिकागो शहर के मजदूर पूंजी के द्वारा श्रम के शोषण के खिलाफ एकजुट हुए तथा पूंजी पतियों के सामने अपनी मांगे रखीं। प्रमुख मांग थी 24 घंटे में 8 घंटे काम, 8 घंटे मनोरंजन और 8 घंटे आराम। 8 घंटे के काम के दौरान इतनी मजदूरी मिलनी चाहिए जिससे मजदूर अपने आप को जिंदा रखते हुए अपना विकास कर सके। तब मजदूरों ने बड़े पैमाने पर कुर्बानी देकर लड़ाई जीती थी।
कमर तोड़ महंगाई के दौर में बढ़ते जीवन यापन के खर्च के बीच उचित वेतन और बेहतर कामकाजी परिस्थितियों की मांग को लेकर अप्रैल 2026 में, नोएडा और ग्रेटर नोएडा में हज़ारों गारमेंट, इलेक्ट्रॉनिक और ऑटो-पार्ट्स फैक्ट्री श्रमिकों ने वेतन वृद्धि के लिए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया, जो कई जगहों पर हिंसक भी हो गया। विरोध प्रदर्शनों के बाद, उत्तर प्रदेश सरकार ने गौतम बुद्ध नगर और गाजियाबाद में अकुशल, अर्ध-कुशल और कुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी में 14 अप्रैल, 2026 से लगभग 21% की अंतरिम वृद्धि की घोषणा की। संघर्ष का मुख्य कारण मुद्रास्फीति, मकान किराए और दैनिक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के मुकाबले मिल रही बहुत कम मजदूरी है। कई श्रमिक अभी भी 10,000 से 15,000 रुपये प्रति माह के बीच कमा रहे हैं। मालूम हो कि नए 1 अप्रैल, 2026 से नए श्रम कानून लागू हुए हैं, जो ओवरटाइम, काम के घंटे और सामाजिक सुरक्षा को प्रभावित करने वाले हैं, जिससे श्रमिकों में अनिश्चितता बढी है।
आज पूंजी की दुनिया ने पूरी दुनिया को बाजार में बदल दिया है। हर चीज बिकने के लिए तैयार है,परंतु इसकी कीमत पूंजी के मालिक ही तय करेंगे। इतिहास में लौटकर देखें तो दुनिया में व्यापारिक पूंजी जब औद्योगिक पूंजी के रूप में विकसित होने लगी तो उसी के साथ समाज में एक नए वर्ग का उदय हुआ जिसे औद्योगिक मजदूर (मजदूर वर्ग) कहते हैं। यह नया सामाजिक वर्ग अपने पुराने सामाजिक संबंधों से हटकर एक नए सामाजिक स्वरूप में आगे आया। समाज में पुराने जमाने की तरह इन्हें अपनी जीविका के लिए गुलामों की तरह 12 से 16 घंटे काम पूंजीपतियों के लिए करना पड़ता था। पूंजी के मालिक अपनी पूंजी के अंधे विकास का उद्देश्य रखते थे। इस नाते मजदूरों के ऊपर शोषण का शिकंजा कसता चला गया। मजदूरों की जिंदगी नारकीय बनती गई। इसी का नतीजा है कि 1886 में अमेरिका के शिकागो शहर के मजदूरों ने पूंजी के द्वारा श्रम के शोषण के खिलाफ एकजुट हुए तथा पूंजीपतियों के सामने अपनी मांगें रखी।
शिकागो शहर के मजदूरों का यह आंदोलन इतना जुझारू था कि मजदूर वर्ग अपनी कुर्बानी देकर भी इसे हासिल करने के लिए अडिग था। यह लड़ाई मजदूरों ने जीत ली। ली। काम का समय आठ घंटा लागू हुआ। काम के घंटे का यह आंदोलन शिकागो से फैलकर दुनिया के मजदूर आंदोलन का स्वरूप ग्रहण कर लिया।
परंतु मार्क्स उस आंदोलन में भटकाव के चिह्न देख रहे थे जिसके कारण उन्होंने आंदोलन को समर्थन करते हुए साफ तौर पर कहा कि मजदूर वर्ग को इससे भी आगे बढ़कर आगे आना होगा और समाज में वेतन गुलामी का जो संबंध है उसे तोड़ना होगा। तभी वह पूंजी के शोषण एवं गुलामी से मुक्त हो सकता है। उसी समय दुनिया में मजदूर वर्ग के बीच दोनों तरह की धाराएं आगे बढ़ीं। एक धारा मजदूर वर्ग को समाजवाद से साम्यवाद की तरफ ले जाने के लिए प्रेरित कर रहा था तो दूसरी धारा काम की अच्छी स्थिति (आर्थिक बृद्धि) में देख रहा था। उसी समय ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने अधिक मुनाफा कमाने के लिए उद्योग धंधे की शुरुआत की तो भारत के श्रमिक वर्ग भी संगठित होकर अपनी मांगों को लेकर आंदोलन शुरू किया। शुरुआती दौर में आंदोलन के अंदर मजदूरों के बीच वर्गीय एकता एवं संघर्ष के बीज थे। यही कारण है कि भारत के मजदूर आंदोलन सिर्फ आर्थिक मांगों तथा बेतहरी से उपर उठकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ चल रहे संघर्षो में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेना शुरू किया।
उसी दौर में भारत में मजदूर आंदोलन का संगठित विकास शुरु हुआ। मजदूरों का अखिल भारतीय मजदूर संगठन अस्तित्व में आया जिसका नाम अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस था। यह भारत में तब एक मात्र मजदूर संगठन था। इसी संगठन में सभी तरह के विचार रखने वाले तत्व शामिल हुए क्योंकि भारत के मजदूरों के सामने अपने अधिकारों के लिए लड़ाई के साथ-साथ ब्रिटिश साम्राज्यवादी शोषण, दमन व लूट के खिलाफ संघर्ष संघर्ष के विचार मौजूद थे। इसका मजबूत कारण भी था कि संगठन में शामिल सारे तत्व के सामने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति का सवाल था। परंतु मजदूर आंदोलन एवं ट्रेड यूनियन में एक निश्चित विचार नहीं रहने के कारण शुरू से ही वर्गीय विचार की कमी थी। इसी वजह से मजदूरों के बीच वेतन की गुलामी के संबंध को खत्म करने के विचार मजबूती से आगे नहीं बढ़ सके।
दूसरी तरफ भारत में औद्योगिक विवाद अधिनियम भी अस्तित्व में आया। एक तरफ इस श्रम कानून के माध्यम से मजदूर वर्ग में भ्रम की स्थिति पैदा की गई तो दूसरी तरफ मजदूर वर्ग को संगठित और असंगठित क्षेत्र में बांटने की साजिश की गई। 1947 के बाद देश में पूर्ण स्वतंत्रता का नारा देकर भी मजदूरों के बीच भ्रम पैदा किया गया। एक अखिल भारतीय मजदूर संगठन को टुकड़ों में बांटने की साजिश भी इसी तरह से सामने आई। शोषक शासक वर्गों की राजनीति करने वालों से लेकर मजदूरों की राजनीति करने वालों की एक ही स्थिति थी। सभी राजनीतिक ताकतों ने अपने-अपने वर्गीय राजनीतिक हितों के लिए मजदूर एकता को टुकड़ों टुकड़ों में बांट दिया; उनके बीच वर्गीय एकता एवं वर्गीय संघर्ष के प्रति विचारों में एक भटकाव पैदा किया और अर्थवाद, कानूनवाद तथा संशोधनवादी विचारों के दलदल में ढकेल दिया। एक ऐसी सोच विकसित की जिसके कारण मजदूर वर्ग अपनी वर्गीय चेतना से दूर होता चला गया। वेतन गुलामी के संबंध खत्म करने की ऐतहासिक जिम्मेदारी से दूर होते चले गए। असंगठित और संगठित मजदूरों के बीच विभाजन से दो जीवन दो नीतियां विकसित की गई। इसका कोई ठोस वैचारिक विरोध किसी भी तरह से नहीं हुआ। देश में असंगठित क्षेत्र के 88 प्रतिशत मजदूरों को पूंजीपतियों के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया। एक तरह से पूंजीवादी नीतियों के सशक्त विरोध की धार को पूरी तरह से कुंद किया गया। दूसरी तरफ संगठित क्षेत्र के मजदूरों के बीच संघर्ष को कमजोर करने के लिए श्रम कानून का झुनझुना थमा दिया गया था। संगठित क्षेत्र वाले 12 प्रतिशत मजदूरों को शासक वर्ग ने अपने वर्गीय हितों के लिए शोषण के दमन चक्र से प्राप्त पूंजी का एक छोटा सा हिस्सा देना शुरू किया। यह वेतनमान एवं महंगाई भत्ता व अन्य सहायता शुल्क के रूप में था। इस तरह दो वेतन नीति सामने आई। एक तरफ वेतन मान तो दूसरी तरफ न्यूनतम वेतन। यही कारण है कि भारत के मजदूर आंदोलन में यूनियन के विचार से अलग ट्रेड का विचार विकसित होता चला गया।
मजदूर वर्ग ने भी यह देखना शुरू किया कि कौन उनके आर्थिक हितों को आगे बढ़ा सकता है व सुरक्षित रख सकता है। इस तरह के विचारों का विकास इस रूप में हुआ कि आज मजदूर वर्ग जाति, क्षेत्र, भाषा और घर्म के नाम पर भी संगठन बनाने से गुरेज नहीं करते हैं। शुरू में तो यह मजदूर एवं उनके रहनुमाओं को ठीक लगा लेकिन 1980 के दशक के बाद बाद दुनिया में जब पूंजी का साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण शुरू हुआ तह पूंजी ने विभिन्न रूपों में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए नई-नई नीतियां अख्तियार कीं। शोषण, लूट दमन के नए-नए कानून बनने लगे, जनता का सेवक मालिक बनने लगा, मजदूर अधिकारों में कटौती, श्रम कानून में बदलाव खुलकर सामने आया। चाहे संगठित या असंगठित क्षेत्र हो, सभी के के सामने काम की सुरक्षा, स्वतंत्रता विकास के सामने खतरा महसूस होने लगा। लगा है। समस्या किसी एक इकाई की नहीं बल्कि सामाजिक रूप धारणा कर चुकी है। इसका हल भी सामाजिक स्तर पर एवं सामाजिक ढंग से होगा।
आज देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में सबके सामने हैं कि मजबूत मजदूर आंदलनों का क्या हश्र हुआ है। मजदूर फिर 12 से 16 घंटे काम करने जैसी गुलामी की स्थिति में फंस गया है। संगठित क्षेत्र में अस्थाई नौकरियों की जगह कम पैसे में ठेके पर लोग रखे जाने लगे हैं।अब सवाल उठता है कि हम (मजदूरों) को क्या करना है ? तो मजदूरों को ऐतहासिक रूप से पीछे लौटना होगा। अपने पुराने इतिहास से सबक लेते हुए अर्थवादी, कानूनवादी, संशोधनवादी विचारों से मुक्त होकर अपने हक की लड़ाई को प्रमुखता देनी होगी। वेतन गुलामी को तोड़ने के लिए खड़ा होना होगा, तभी पूंजी के शोषण, दमन से मुक्त एक शोषणविहीन भारत बनाया जा सकेगा।
