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लघुकथा: एक लंबी यात्रा

अनिल तिवारी

मौजूदा दौर युवा जोश, उसकी ई-तकनीक, मेधाशक्ति आदि के घोल से सब कुछ पलक झपकते हासिल कर लेने के जुनून का है। इसका असर जीवन के हर क्षेत्रों की तरह साहित्य में भी देखा जा रहा है। आपाधापी के इस युग में आज लोगों के पास इतना समय नहीं है कि वे (महाग्रंथ, प्रबंध ग्रंथ) महाकाव्य-प्रबंधकाव्य की रचना कर सकें, उसे पढ सकें। दौड़ती – भागती हुई जिंदगी के मर्म को छूने और उन्हें एक वैचारिक आयाम देने के लिए रचनाओं का छोटे कलेवर में लिखा जाना आज की जरूरत भी है। यही कारण है कि आज लघुकथाएँ सर्वाधिक लिखी पढ़ी जा रही हैं। साहित्य में लघुकथा के बढ़ते प्रचलन को देखते हुए यह भान हो रहा है कि कभी उपन्यास-कहानी के आभा में दबी पड़ी लघुकथा के दिन लौट रहे है।

हिन्दी अथवा विश्व साहित्य के लिए लघुकथा कोई नई विधा नहीं है। कल्पना की जा सकती है कि साहित्य तथा संस्कृति के आदि काल में जिस प्रकार कविता बहुत छोटे रूप में होती थी उसी प्रकार उस समय कहानी भी लघुकथा के रूप में रही होगी। समुन्नत साहित्य वाली सभी प्राचीन भाषाओं में भावकथाएं तथा बोधकथाएँ प्रचुरमात्रा में उपलब्ध हैं। इन कथाओं का स्वरूप लघुकथा जैसा ही है। लगभग सभी धर्मो के पुराण ग्रन्थों में, प्राचीन बौद्ध ग्रन्थों में इस प्रकार की कथाएं मिलती हैं। कथा के सूत्र वेदों से प्राप्त होते हैं पर कथा की सह पहचान हमें अग्निपुराण के निम्न श्लोक से होती है-

आख्यायिका कथा खण्डकथा परिकथा तथा ।

कथानिकेति मन्यन्ते गद्यकाव्यं च पञ्चधा ।।

अग्निपुराणकार ने उन साहित्य रूपों की जो परिभाषाएं बतायी है उनको देखते हुए लघुकथा का सम्बन्ध गद्यकाव्य के ‘कथा प्रकार से निसर्गतः जुड़ता है।

वस्तुतः कथा का जन्म मनुष्य के जन्म के साथ माना जा सकता है, क्योंकि कथा का शाब्दिक अर्थ वृत्तान्त वर्णन होता है। कथा ‘कथ’ धातु से व्युत्पन्न है जिसका सीधा अर्थ ‘वह जो कहा जाय होता है। यहाँ कहने वाले के अतिरिक्त सुनने वाले की स्थिति अंतर्मुक्त है। किन्तु वह सभी कुछ जो रहा जाय कथा नहीं है क्योंकि कथा के लिए तारतम्य और परिणाम आवश्यक है। उपन्यास, कहानी और लघुकथा में इसका प्रभुत्व होता है। ये तीनों कथ के ऐसे रुप है जिनमें नाटकीयता के साथ-साथ पात्र स्वयं अपनी भूमिकाओं का भी निर्वहन करते है। उपन्यास और कहानी जहां बड़े फलक पर घटनाओं का विस्तृत वर्णन करते हैं वहीं लघुकथा जीवन के किसी क्षण विशेष का जो कम से कम शब्दों का क्षिप्र, चुस्त और त्वरा से चलने वाले प्रभावपूर्ण कथात्मक ढंग से दोहे की तरह कहा गया किन्तु यथार्थ की धरात पर पैनी धार से कहा गया मानवोत्थानिक संदेश है। लघुकथा स्थूल से सूक्ष्म की सहज यात्रा है।

लघुकथा को अंग्रेजी में ‘स्टोरिएट’ तथा उर्दू में ‘अफसांचा’ कहा जाता है। कोई भी विद्या अकस्मात अस्तित्व में नहीं आती। एक लम्बी यात्रा तय करने के बाद ही उसे पहचान मिलती है। लघुकथा भी इस सत्य का अपवाद नहीं है। लघुकथा के अतीत की खोज करने पर इसके ‘बीज संस्कृत के ग्रंथों, वेदों में आयी कथाओं, दृष्टांतों, रामायण महाभारत की कथाओं, ईसप की कहानियों, पंचतंत्र की कथाओं से होते हुए मुंशी हसन अली, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, माखनलाल चतुर्वेदी, जयशंकर प्रसाद, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जगदीश मिश्र, प्रेमचंद आदि ख्यातिलब्ध साहित्यकारों के योगदान को रेखांकित करते है तथा उसकी स्वतंत्र पहचान को स्पष्ट करते हैं।

मुंशी हसन अली के साथ भारतेन्दु हरिश्चन्द भी लगातार लघुकथा लिख रहे थे, उनकी प्रवृति व्यंग्यात्मक थी। भारतेंदु हरिश्चन्द उस समय के साहित्यकारों का नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने अपनी छोटी कथात्मक रचनाओं के जरिए अंग्रेजों के खिलाफ जन जागरण हेतु व्यंग्य परक लघुकथाएँ लिखी जिन्हें बाद में पुस्तक में संग्रहित किया गया। इनके बाद जयशंकर प्रसाद अपनी लघुकथाओं में गंभीर दर्शन लिए उपस्थित हुए तो प्रेमचंद ने आदर्श और व्यंग्य को मिला-जुलाकर लघुकथा में अपनी अलग राह बनाई।

इनके बाद तो फिर छबीले लाल गोस्वामी, सुदर्शन, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, आचार्य जानकी वल्लभशास्त्री, बनफूल, रमेश चंद्र श्रीवास्तव, कालीचरण चटर्जी, श्याम सुंदर दास, विष्णुप्रभाकर, शांति मेहरोत्रा, भवभूति मिश्र, रघुवीर सहाय, हरिशंकर परसाई, राम नारायण उपाध्याय, श्याम नंदन शास्त्री, शरदचंद्र मिश्र, डा. त्रिलोकी लाल आदि लघुकथा लेखकों की लम्बी सूची है जिन्होने अपनी मूल विधा के साथ प्रचुर मात्रा में लघुकथाएं लिखी।

सातवें दशक में डॉ. सतीश दुबे, डा. कृष्ण कमलेश आदि की लघुकथाओं से आधुनिक लघुक‌था का काल शुरु होता है। इस काल की कथाएं पूर्व की कथाओं से भिन्न तो थी किन्तु उनमें पुरानी पीढ़ी की लघुक‌थाओं का प्रभाव स्पष्ट था। इस काल की लघुकथाएं एक दो पंक्ति से लेकर दस पक्तियों में सिमट जाती थी। इनका विषय पुलिस, राजनीति, कार्यालय समाज आदि में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रमुख रूप से हुआ करता था। इनमें व्यंग्य अपने तीखे तेवर तथा अनिवार्यता के साथ उपस्थित था। लघुकथा का समापन प्रायः चौंका देने वाले वाक्य से हुआ करता था। आपातकाल के दौरान गजल के साथ-साथ लघुकथा पाठकों की प्रिय विधा बन गयी थी। किंतु 8वां दशक समाप्त होते होते लघुकथा की चमक फीकी पड़ गई। विषयों की पुनरावृति, आकार में अतिलघुता तथा लेखकों की बाढ़ ने लघुकथा के स्तर को गिराया और पाठकों के मन में ऊब पैदा की।

नौवें दशक या यूं कहें बीसवी शताब्दी के अन्तिम वर्षों में स्थिति में बदलाव आया। गोष्ठियों और सम्मेलनों में लघुकथा के गंभीर विमर्श प्रारम्भ हुए। तत्कालीन युवा पीढ़ी को इससे अवसर मिला। युवा पीढ़ी की सार्थक एवं सुंदर रचनात्मक दृष्टि मिली, अनेक श्रेष्ठ लघुकथाकार उभर कर सामने आए। इन कथाकारों ने बदलते युग की चुनौतियों को स्वीकारा तथा लघुकथा के साथ-साथ इसके शास्त्रीय एवं ऐतिहासिक पक्ष को उजागर करते हुए शोधपरक आलोचनात्मक लेख भी लिखे। इस दौर के लेखकों ने लघुकथा के लिए बनाये गए मानदंडो जिसमें, एक प्रभाव पूर्ण घटना, घटना से सम्बद्ध पात्र, पात्रों के बाह्य एवं आन्तरिक द्वंद्व को स्पष्ट करने वाली भावानुरुप भाषा शैली, परिणाम एवं क्षिप्रता जिससे कि कथानक को प्रस्तुत करने में शब्दों का अपव्यय न हो और रचना के अभिन्न अंग बनकर उभरे शीर्षक का भरपूर ख्याल किया है। ऐसे लेखकों में डॉ. सतीश दुबे, भगीरथ, बलराम अग्रवाल, डा. कमल चोपड़ा, डा. सतीश राज पुष्करणा, सुकेश साहनी, मधुकांत, रूपदेव गुण, रामेश्वर कांबोज हिमांशु, कृष्णानन्द कृष्ण, राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी, नरेंद्र प्रसाद नवीन, सिद्देश्वर, तारिक असलम, सतीश राही, अशोक भाटिया, श्याम सुंदर अग्रवाल, डा. शकुन्तला किरण आदि प्रमुख नाम हैं। मधुदीप और राजकुमार निजा ये दो ऐसे लघुकथाकार हैं जो 20वीं सदी के अंत से सक्रिय थे। मधुदीप का पन्द्रह खंडों में “पड़ाव और पड़ताल” प्रकाशित हुआ था। पिछले एक दशक में लघुकथा के क्षेत्र में जो नाम एक समय पर तेजी से आगे बढ़े उनमें ज्ञानदेव मुकेश जिनका संग्रह ‘भेड़िया जिंदा है’ काफी चर्चित रहा। इन लघुकथाकारों के विषय, प्रस्तुति, शिल्प और शैली निश्चित रूप से बेजोड़ रहे।

कुल मिलाकर समय के साथ साहित्य भी बदल रहा है। सामंती युग में जब लोगों के पास खास अवकाश था तब बड़े-बड़े महाकाव्यों, प्रबंधकाव्यों की रचनाएं हुई देर तक गाए जाने वाले शास्त्रीय गीत-संगीत की धूम रही। लेकिन समय का पहिया घूमा तो साहित्य का स्वरूप भी बदला । दुनिया की दूरी कम हो गयी। कलाओं में कोलाज, संगीत में फ्यूजन और साहित्य में लघुकथाएँ, क्षणिकाएँ और हाइकु का लिलक जाना वैश्विक धरातल पर आदान-प्रदान के साथ-साथ भागती हुई जिन्दगी की जरुरत बना है।

यही कारण है कि मानवीय संवेदनाओं के विविध पक्षों को स्पर्श करने एवं उसे कलात्मकता के साथ भली-भांति रुपाचित करने में लघुकथा एक सशक्त विधा बन चुकी है। भविष्य में वही रचनाएं स्वीकारी जाएंगी जो मनुष्य के मनोभावों के साथ सामञ्जस्य बैठा सके और उसे वैचारिक दिशा दे सके। हिन्दी कहानी लेखन के साथ लघुकथाएं भी लिखी गयी लेकिन तब वे अपनी पहचान नहीं बना सकी पर आज लघुकथा केंद्र में खड़ी है। लघुकथाओं को लोकप्रिय बनाने में पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ इंटरनेट की भी सराहनीय भूमिका है। कादम्बिनी, सरिता, नवनीत, व्योम, साहित्यकार, सृजनगाथा, कलरव आदि पत्रिकाओं ने लघुकथा को आगे बढ़ाने का काम किया है। दुनिया भर में ई-मैगजीन के जरिए लघुकथाएं लिखी – पंढ़ी जा रही हैं।

लघुकथा भले ही छोटी होती है लेकिन उसकी अभिव्यक्ति, भाव गहरे होते हैं जो पाठक के हृदय को झंकृत करते हैं। जो कथा एक बार पढने के बाद कभी भूले नही, मन की गहराइयों में समा जाए वही एक सम्पूर्ण लघुकथा होती है। ऐसी अनेक लघुकथाएं हैं जिनकी छाप मेरे खुद के मन में है, जिन्हें मैं भुला नहीं पाता हूँ। वह बार-बार चित्र की तरह मेरे मस्तिष्क में उपस्थित होती है। उनमें सुदर्शन रत्नाकर की ‘मौन संवेदना’, अर्चना राय की ‘नए पड़ाव पर’ और हिना श्रीवास्तव की ‘खोई हुई संवेदनाएं’ भावपूर्ण मर्मस्पर्शी रचनाएं हैं।

करोना महामारी के बाद लघुकथा लेखन में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई है। खास तौर से कविता, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में जमे जमाए लेखकों ने भी लघुकथा में योगदान दिया है। इस श्रृंखला में अच्छा कौन, मां , मृत्युंजय, फर्ज, महीने के आखिरी दिन, महामूर्ख, दो आदमी, परिवार की लाडली, फिजूलखर्ची, गरीबी रेखा का कार्ड, बुराई का जोर बुरे पर, कलम और कागज, खिचड़ी भाषा, चर्चा जारी है, उबड़ खाबड़ रास्ता, समाधान, रावण की हड्डी, मतपेटी में जिन्न, हिस्से का दूध, गाय की रोटी, उनकी जरूरत, मेरे हिस्से का घर परिवार को पाठकों की सराहना मिली।

समग्रतः लघुकथा की वर्तमान स्थिति बहुत सुदृढ़ है। अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच के महासचिव प्रो. सुखदेव सिंह जी की मानें तो छोटे-बड़े लगभग तेईस सौ कथाकारों का काफिला लघुकथा को नई ऊंचाई देने में जुटा हुआ है। अब तो यह स्कूल, कॉलेजों के पाठ्यक्रम में भी शामिल हो गयी है। बहुत सारे लोग लघुकथा पर शोध भी कर रहे है। आलम यह है कि आज कोई भी पत्र-पत्रिका लघुकथा के बिना अधूरी लगती है। इस क्रम में ‘लघुकथा की आत्म कहानी’ शीर्षक वाली लघुकथा से मैं अपनी बात को विराम देना चाहती हूँ

“मुझे नया परिवेश मिला। नई शैली मिली। नए लोग मिले। नया आयाम मिला। नई चेतना मिली और मैं (लघुकथा) यथार्थ के धरातल पर अनवरत गति से आगे बढ़ने लगी ।…..

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