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मानवता परमो धर्मः (लघुकथा)

  • गौरी तिवारी

शाम में ही काले बादलों ने आकाश को रजनी की चादर ओढ़ा दी, आखिर इतनी तेज़ बारिश जो हो रही थी। कम होने की जगह लगातार तेज़ होती जा रही थी। एक ओर जून की यह झमझमाती बारिश और बिजली की गड़गड़ाहट मानो तूफान सा कोहराम मचा रही हो तथा दूसरी ओर एक छोटे से कमरे में अफ़्सा और सकीना दरवाजे की ओर भय और प्रतीक्षा के मिश्रण से टकटकी लगाए देख रहे थे। तभी तेजी से हड़बड़ी में दरवाजा खटखटाने की आवाज़ आती है और गुलशन बारिश भीगा हुआ, खांसते हुए अंदर आता है।

” अब्बू आप तो बहुत भीग गए हैं, मैं चाय बना देती हूं वरना आप बीमार हो जाएंगे।”

गुलशन बिना कोई जवाब दिए चुपचाप कपड़े बदलकर एक पेवन लगा कुर्ता और मटमैला पजामा पहन लेता है।

अफ़्सा उसके लिए बिना दूध की काली चाय लेकर आती है तभी सकीना धीरे से पूछती है – “नौकरी का क्या हुआ? कहीं काम मिला आपको?”

गुलशन के कंठ से बड़ी मुश्किल से आवाज़ निकलती है “नहीं”

कमरे में सन्नाटा छा जाता है, उस कभी न समाप्त होने वाली शांति को भंग करते हुए अचानक से कमरे की छत से पानी टपकता है “टप,टप,टप, टप…”

अगले दिन गुलशन सुबह जल्दी उठकर एक मीडिया हाउस में नौकरी के लिए साक्षात्कार देने जा रहा होता है। उसकी जेब में सिर्फ 60 रुपए होते हैं इसलिए रिक्शे की जगह पैदल बस स्टैंड तक जाता है। वह बस का इंतज़ार कर ही रहा होता है कि उसकी नज़र बस स्टैंड के पास वाले मंदिर के बाहर बैठी कई दिनों से भूखी और बीमार वृद्ध महिला पर पड़ती है। वह अपनी जेब टटोलता है और फल वाले से आधा दर्जन केला लेकर उनको दे देता है और वह वृद्ध महिला उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देती हैं तभी मंदिर से भजन की आवाज़ आती है-

“वैष्णव जन तो तेने कहिये जे, पीड़ परायी जाणे रे,

परदुःखे उपकार करे तोये, मन अभिमान ना आणे रे।”

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