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यह तो होना ही था !

अनिल तिवारी
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कह सकते हैं कि पश्चिम बंगाल पर जनादेश तो कबके लिखे हुए थे, इसकी घोषणा भर आज (4 मई 2026) हुई है। खालिस ध्रुवीकरण की बिसात पर लड़े गए पश्चिम बंगाल के चुनावी संग्राम में बड़े ने छोटे को चारों खाने चित्त कर बाजी मार ली है।तृणमूल कांग्रेस वर्ष 2016 की ऐतिहासिक जीत के बाद से ही एक खास वर्ग के पाले में खड़े होकर जिस तरह शासन प्रशासन की धज्जियां उड़ाने लगी थी, पार्टी पर बड़े-बड़े घोटाले और भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे, आम नागरिकों का जीवन दिन प्रतिदिन कठिन होता जा रहा था, उसे देखते हुए उसके समानांतर बहुसंख्यक आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली भाजपा का न जीतना ही आश्चर्य होता। इन विडंबनात्मक तथ्यों के बावजूद कि केंद्र की कुर्सी पर काबिज भाजपा का ध्रुवीकरण का एजेंडा राज्य के छोटे दल तृणमूल से जरा भी कमतर नहीं है, बल्कि कई अवसरों पर इसका व्यापक विस्तार देखा गया है। इसका मतलब यह नहीं की ध्रुवीकरण एक स्वीकृत संस्कृति की तरह मतदाताओं की मानसिकता में रच बस गया है। पार्टी-पार्टी के ध्रुवीकरण, भ्रष्टाचार, घोटाले आदि में फर्क है लिहाजा एक की बनिस्पत दूसरे का कबूल है। वास्तविकता तो यह है कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव से ठीक पहले बंगाल ने नए वोटिंग ट्रेंड में शामिल होकर राजनीतिक दलों के लिए एक सबक भी दिया है।
यह ठीक है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव में पोलराइजेशन हुआ है, लेकिन यह केवल धार्मिक ध्रुवीकरण का मामला ही नहीं है, मतदाताओं ने सुशासन, सुप्रबंधन और सतत सर्वांगीण विकास के लिए भी भारी तादाद में (लगभग 93%) वोटिंग की है। यह राज्य सरकार की सह पर अपना घर भरने, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने और सरकारी खजाना लूटने के विरुद्ध गुस्से का इजहार भी है। ठहरकर सोचना होगा कि मतदाता वे नहीं रह गए हैं जो शिकायतें करते थे, अब वह अपेक्षाकृत उन्नत जरूरत की एक पूरी सूची लिए हैं और उन पर समय सीमा में नतीजे देने वाली कार्रवाई की मांग जोर शोर से करते हैं। इसीलिए बंगाल से तृणमूल को दंड देने के साथ अप्रतिष्ठापूर्ण विदाई दी गई है। जनता ने तृणमूल को हटाकर आजादी के बाद से ही बंगाल में जीत का सपना देखने वाली भाजपा को पुरस्कृत किया है और हिदायत भी दी है कि उसे पूर्व की सरकार की तरह काम नहीं करना है। यह संदेश सभी दलों के लिए है।
टीएमसी बंगाल में हार गई। सबको पता था कि टीएमसी हारेगी, पर इतनी बुरी तरह से हारेगी, इसका अंदाजा किसी ने नहीं लगाया था। दिल्ली के टीवी चैनल टीएमसी की हार का अनुमान लगा रहे थे पर राज्य स्तर के लोग हार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। अधिकतर लोगों का मानना था की कांटे का संघर्ष होगा। हार जीत का अंतर कम होगा, लेकिन यहां भाजपा की ऐसी सुनामी चली कि टीएमसी का सुपड़ा ही साफ हो गया। कहते हैं कि आप दूसरे को भरमा सकते हैं, अपने को नहीं। टीएमसी नेत्री ममता बनर्जी अंत तक लड़ने का दावा करती रही लेकिन उन्हें पता था की क्या होने वाला है क्योंकि पश्चिम बंगाल में बबुल का पेड़ उन्होंने ही बोया था। अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण, भ्रष्टाचार, कुशासन, गुटबाजी की जो फसल उन्होंने रोपी थी, उसी को उन्होंने काटा है। कहते हैं चुनाव लोकतंत्र का महायज्ञ है और इस महायज्ञ को जिन मंत्रों के सहारे पूरा किया जाता है वह है जन सरोकारों से जुड़े मुद्दे। बदकिस्मती से अबकी बंगाल चुनाव मुद्दों से कटकर नारों और एक दूसरे पर कीचड़ उछलने के साथ-साथ पोलराइजेशन के इर्द-गिर्द ही लड़ा गया।
इस चुनाव की खासियत रही कि इस बार बांग्लादेशी घुसपैठियों के बरक्स राष्ट्रवाद तथा हिंदुत्व का बोलबाला रहा। भाजपा और तृणमूल के बीच हिंदुत्व पर दावेदारी को लेकर भी अपने-अपने तरीके से जोर आजमाइश हुई। देवी देवता वेशभूषा खान पान सब पर दावे प्रति दावे हुए। मालूम हो कि हिंदुत्व की राजनीति पिछले तीन दशक से भारत के राजनीतिक पटल पर छाई हुई है। लेकिन 2014 के चुनाव में इसने एक नया आयाम ग्रहण किया जब हिंदुत्व के चेहरे के रूप में मानी जाने वाली पिछड़ी जाति से आने वाले नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। समय के साथ ममता बनर्जी ने भी अपने को अपडेट किया तथा मंच पर मां काली, दुर्गा से संबंधित स्तुति श्लोकों का गायन कर खुद को हिंदुत्व का झंडाबरदार साबित करने की कोशिश की। लेकिन यह ज्यादा दिन नहीं चल सका। वोट बैंक को साडे रखना के लिए उनका अल्पसंख्यक प्रेम बाहर आया और बृहद हिंदू समाज में इसकी प्रतिक्रिया होने लगी। वर्ष 2021 में मिली प्रचंड जीत के बाद उनमें घमंड भी आया और उन्हें यह भरोसा हो गया कि वह अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण तथा महिला वर्ग को नगद लाभ पहुंचा कर सदैव चुनाव जीतती रहेगी।
बंगाल के परिणाम को लेकर कई महत्वपूर्ण बिंदु हैं जिस पर चर्चा होगी लेकिन आज फिलहाल हम कुछ ऐसे मुद्दे पर केंद्रित करते हैं, जिनके चलते तृणमूल को मुंहकी खानी पड़ी है।
1-पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर हिंदू वोटो का ध्रुवीकरण हुआ। धार्मिक पहचान के आधार पर हुई लामबंदी के कारण बीजेपी को फायदा हुआ और तृणमूल को नुकसान पहुंचा।
2-पिछले 15 साल से शासन कर रही ममता बनर्जी खास कर दो कार्यकाल के दौरान केवल चुनिंदा लोगों के लिए काम किया। मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग शासन की कमियों के प्रति समय समय पर असंतोष जताता रहा लेकिन ममता सरकार ने उसे नजर अंदाज किया। सरकार का अंदर खाने बहुत विरोध था। राज्य में काम धंधे ठप्प पड़े थे। रोजगार की स्थिति दयनीय होती जा रही थी। पढ़े लिखे बांग्ला युवको का पलायन हो रहा था। इसे लेकर सत्ता का भारी विरोध था। सत्ता विरोधी लहर ने बीजेपी की झोली भर दी।
3-महिलाओं और लड़कियों के लिए ममता सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं के तहत जो नगद राशि दी, वह चढ़ती महंगाई व अन्य कारणों से ऊंट के मुंह में जीरा जैसी ही थी। महिला सशक्तिकरण के दावे खोखले साबित हो रहे थे, वही हाल के दिनों में महिला सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे थे। बीजेपी ने महिलाओं को दो गुना-तीन गुना राशि देने का वादा कर अपनी ओर आकर्षित किया। महिला सुरक्षा के प्रति भी गंभीर प्रयास करने की प्रतिबद्धता जताई है।
4- मां माटी मानुष और आमार सोनार बांग्ला के नाम पर तृणमूल कांग्रेस ने जो बाहरी का नॉरेटिव चलाया वह दांव उन पर उल्टा पड़ा। अपने लोगों ने उनके स्लोगन पर बहुत ध्यान नहीं दिया और बाहरी लोगों ने अपनी क्षेत्रीय पहचान को एकजुट करते हुए तृणमूल के विरोध में डटकर मतदान किया।
5-तृणमूल को सबसे ज्यादा नुकसान एसआईआर से हुआ। बड़ी संख्या में नाम काटे गए। नाम काटे जाने वालों में सर्वाधिक संख्या अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों की है जिनके भरोसे तृणमूल ताल ठोकती रही। यही कारण है कि ममता बनर्जी ने एसआईआर को चुनावी मुद्दा भी बनाया। चुनाव आयोग के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय तक मामले को पहुंचाया। उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणी कि “एक बार अगर कोई वोट नहीं देगा तो आफत नहीं आ जाएगी” के बाद से ही यह लगने लगा था, कि चुनाव की रेस में तृणमूल पिछड़ गई है। भाजपा जो आरोप लगाती थी कि तृणमूल का वोट 30% से शुरू होता है को एसआईआर का सीधा फायदा हुआ। करीबी मुकाबले वाले सीटों पर बीजेपी की जीत हुई है।
6-पिछले चुनाव में कांग्रेस पार्टी और वामपंथी दलों का खाता भी नहीं खुला था। इस बार गठबंधन के उम्मीदवारों को कई क्षेत्रों में अच्छा खासा वोट प्राप्त हुआ है। तृणमूल के लिए यह भी नुकसान का सौदा साबित हुआ है।
7-तृणमूल कांग्रेस चुनाव के दौरान जनसभाएं करने में ही जुटी रही। ममता बनर्जी नए लोगों को जोड़ने की बजाय अपने पुराने कार्यकर्ताओं पर ही भरोसा किया। भाजपा ने तृणमूल को चुनौती देने के लिए नए सिरे से संगठन को मजबूत किया। बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं को सीधे संपर्क किया तथा उनकी राय को प्रमुखता देते हुए अपनी कार्य योजना तैयार की।
8-तृणमूल कांग्रेस ने जिन प्रत्याशियों का टिकट काट दिया उन्हें चुनाव में सक्रिय करने में विफल रही। जिनके टिकट कटे हुए या तो घर बैठ गए या अन्य दलों में चले गए।
9-भारी पैमाने पर केंद्रीय बलों की तैनाती के कारण तृणमूल के पारंपरिक कार्यकर्ता वह उत्साह नहीं दिखा पाए जो चुनाव के दौरान पूर्व में दिखता था।
10-तृणमूल कांग्रेस बीजेपी के बड़े नेताओं की गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति बनाती रही, लेकिन विपक्षी द्वारा जमीन पर चल रही कार्रवाई का तोड़ नहीं खोज पाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ताबड़तोड़ रैली और रोड शो करते रहे, गृह मंत्री अमित शाह कैंप लगाकर चुनाव तक डटे रहे। बताते हैं कि चुनाव प्रचार शुरू होने तक बीजेपी बूथ स्तर तक एक लाख बैठकें कर जीत की रणनीति का खाका तैयार कर चुकी थी। तृणमूल अपने लोगों को सक्रिय करने में पिछड़ गई।

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