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लघुकथा

ईश्वर और उतरन

 

“मैडम जी भइया का कोई पुराना बैग हो तो मुझे दे दीजिएगा, मेरी पूजा का बैग फट गया है।”
कालू झाडू लगाते-लगाते मैंने बोला- “ठीक है कालू, पलंग के बॉक्स में पड़ा होगा, कल परसो समये मिलने पर निकाल दूँगी।”
अक्सर कालू अपनी भतीजी के लिए कुछ न कुछ मांगा करता था, कभी-कभी अपने लिए भी।
मैं भी कोशिश करती कि कालू की ज़रूरतें पूरी करूँ। कालू ईमानदार, खुशमिजाज एवं मेहनती आदमी था। काम बहुत ही सुघड़ता से करता था।

होली के दो-चार दिन पहले एक शाम मैं घर के मन्दिर के भगवान के लिए कपड़े सील रही थी, पुराने कपड़े हटाकर अलग रख दी थी। रसोई के तरफ से झून झून की आवाज आ रही थी, मैं समझ गई कि कालू आ गया है, रसोई में झाडू लगा रहा है।
कालू पुरुष होते हुए भी महिलाओं जैसा शौक रखता था, आँख में काजल, लम्बे बाल, शर्ट छीटदार, हाथ में घुँघरू वाला कलावा बांधता था।

झाड लगाते-लगाते मेरे कमरे तक आया और कहा –
“मैडम जी, क्या कर रही हैं?
“भगवान के कपडे सील रही हैं।
“पूराने कपड़ों का क्या करेंगी ?
“कुछ नहीं ऐसे ही पड़े रहेंगे।
“मैडम जी मै ये कपड़े ले लूँ? अपने भगवान को पहनाऊंगा।”

मैं किंकर्तव्यविमूढ़ कालू को देखती रह गयी।
क्या भगवान भी अमीर-गरीब होते हैं?
क्या गरीब के भगवान भी अमीर के भगवान के छोड़े हुए कपड़े पहनते हैं?…….

 

~ सुधा ओझा

 

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