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महावीर प्रसाद द्विवेदी और नवजागरण

गौरी तिवारी

आज भी हिंदी साहित्य के विद्वान तथा प्रमुख आचार्य, महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की रचनाओं को पढ़ते ही उन रचनाओं की प्रासंगिकता भली भांति सिद्ध होती है। हिंदी साहित्य के इतिहास में ‘द्विवेदी युग’ जो लगभग 1900 से 1918 तक था वह सिर्फ कालखंड नहीं है, बल्कि यह उस युग की ‘सांस्कृतिक रीढ़’ का नाम है। जहां एक ओर भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी नवजागरण की कच्ची बुनियाद तैयार की थी, वहीं दूसरी ओर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने  आधुनिकता, नैतिकता और अनुशासन के भव्य मिश्रण से उसे एक सुदृढ़ रूप दिया। 1903 में जब द्विवेदी जी ने ‘सरस्वती’ के संपादन का दायित्व संभाला, तब हिंदी साहित्य एक विचित्र संक्रांति से गुजर रहा था—एक ओर रीतिकाल की विलासी श्रृंगारिकता का अवशेष था, तो दूसरी ओर औपनिवेशिक दासता की बेड़ियाँ। ऐसे में द्विवेदी जी ने साहित्य को ‘ज्ञान-राशि का संचित कोष’ घोषित कर उसे मनोरंजन की वस्तु से उठाकर राष्ट्र-निर्माण का उपकरण बनाया। उन्होंने यह महसूस किया कि यदि हिंदी को राष्ट्र की चेतना का संवाहक बनाना है, तो उसे अपनी ‘अव्यवस्थित’ स्थिति से बाहर निकलना होगा। उन्होंने ‘सरस्वती’ के माध्यम से भाषा का मानकीकरण शुरू किया। व्याकरण की अशुद्धियों को दूर करना, विराम चिन्हों का प्रयोग और शब्दों के सटीक चयन पर उनका जोर एक भाषाई क्रांति थी। उन्होंने कवियों से आग्रह किया कि वे श्रृंगारिक नायिका-भेद और ब्रजभाषा की कोमलता को त्यागकर खड़ी बोली को अपनाएं क्योंकि एक ऐसी भाषा की आवश्यकता थी जो जनमानस से सीधे संवाद कर सके। उन्होंने सरस्वती पत्रिका का संपादन किया जिसने मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, और राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’ जैसे लेखकों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की। उनके मार्गदर्शन में साहित्य ‘कला कला के लिए’ के सिद्धांत से हटकर ‘साहित्य समाज के लिए’ की ओर मुड़ा। नवजागरण की इस लहर में उन्होंने ऐतिहासिक और पौराणिक पात्रों को नए मानवीय दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा दी। ‘साकेत’ की उर्मिला या ‘यशोधरा’ की पीड़ा को केंद्र में लाना, द्विवेदी जी के उसी ‘स्त्री-विमर्श’ का हिस्सा था, जो उस समय अत्यंत प्रगतिशील विचार माना जाता था। उन्होंने ‘कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता’ लिखकर साहित्य जगत को झकझोर दिया था। उनकी रचनाएं ‘इतिवृत्तात्मकता’ शैली में अधिक थी और उनमें कल्पना कम।

उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्ध भारतीय समाज के लिए तीव्र संक्रमण का काल था। अंग्रेज़ी शासन ने भारतीय अर्थव्यवस्था, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक संरचना को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। एक ओर औपनिवेशिक शोषण और सांस्कृतिक हीनता की भावना थी, दूसरी ओर पश्चिमी शिक्षा और आधुनिक विचारों के कारण समाज में नवीन चेतना का उदय हो रहा था। इसी प्रक्रिया को हिंदी साहित्य के इतिहास में “नवजागरण” कहा गया। यह नवजागरण मात्र राजनीतिक जागृति नहीं था, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक पुनर्सृजन की प्रक्रिया भी था। बंगाल में राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जैसे व्यक्तित्वों ने सामाजिक सुधार और आधुनिक चेतना की नींव रखी। हिंदी क्षेत्र में इस चेतना का प्रारंभ भारतेन्दु हरिश्चंद्र से हुआ, किंतु उसे व्यापक वैचारिक आधार प्रदान करने का श्रेय महावीर प्रसाद द्विवेदी को प्राप्त है। द्विवेदी जी ने समझ लिया था कि साहित्य केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज-निर्माण की शक्ति भी है। उनके लिए साहित्य जनजीवन से पृथक कोई विलासी उपक्रम नहीं था अपितु वह समाज की चेतना को जागृत करने वाला माध्यम था और यही दृष्टि हिंदी नवजागरण का केंद्रीय तत्व बन गई।

सन 1903 में जब महावीर प्रसाद द्विवेदी “सरस्वती” पत्रिका के संपादक बने, तभी हिंदी साहित्य में एक नए युग का आरंभ हुआ। “सरस्वती” सिर्फ एक साहित्यिक पत्रिका न रहकर के समाज की वैचारिक चेतना का मंच बन गई। उसके माध्यम से द्विवेदी जी ने साहित्य, समाज, राजनीति, इतिहास, विज्ञान, शिक्षा और राष्ट्रीयता से जुड़े प्रश्नों को व्यापक स्तर पर उठाया। उन्होंने हिंदी पाठकों को यह अनुभव कराया कि साहित्य जीवन से अलग कोई काल्पनिक संसार नहीं है। साहित्य को समाज की समस्याओं, राष्ट्रीय स्वाभिमान और जनचेतना से जुड़ना चाहिए। उनके संपादन में “सरस्वती” ने हिंदी समाज में बौद्धिक जागरण की ऐसी लहर उत्पन्न की, जिसने आगे चलकर आधुनिक हिंदी साहित्य की आधारभूमि तैयार की। द्विवेदी जी केवल संपादक नहीं थे, वे साहित्यिक संस्कारों के निर्माता थे। वे रचनाओं को संशोधित करते, भाषा को परिष्कृत करते और लेखकों को दिशा प्रदान करते थे।

महावीर प्रसाद द्विवेदी की सबसे महत्वपूर्ण देन हिंदी भाषा का परिमार्जन और खड़ी बोली हिंदी की प्रतिष्ठा है। उनके समय में हिंदी साहित्य मुख्यतः ब्रजभाषा की काव्य-परंपरा में बंधा हुआ था। ब्रजभाषा में काव्यात्मक माधुर्य अवश्य था, किंतु आधुनिक विज्ञान, राजनीति, समाज-सुधार और राष्ट्रीय विचारों की अभिव्यक्ति के लिए एक सरल, स्पष्ट और सर्वमान्य भाषा की आवश्यकता थी। द्विवेदी जी ने खड़ी बोली हिंदी को साहित्य की भाषा बनाने का संगठित प्रयास किया। उन्होंने भाषा में व्याकरणिक शुद्धता, सादगी, स्पष्टता और तार्किकता पर बल दिया। उनकी भाषा-दृष्टि केवल भाषिक नहीं थी; उसके पीछे राष्ट्रीय एकता और आधुनिक चेतना का विचार भी सक्रिय था। वे चाहते थे कि हिंदी ऐसी भाषा बने जिसे व्यापक भारतीय समाज समझ सके। उनके प्रयासों से हिंदी गद्य को स्थिर और परिष्कृत रूप प्राप्त हुआ। आधुनिक हिंदी की मानक भाषा के निर्माण में उनका योगदान आधारशिला के समान है। द्विवेदी जी साहित्य को समाज-सुधार का माध्यम मानते थे, उनके साहित्यिक चिंतन में नैतिकता, उपयोगिता और सामाजिक उत्तरदायित्व का विशेष महत्व है। उन्होंने स्त्री-शिक्षा, जातिगत संकीर्णता, रूढ़िवाद, अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया। उनके लेखों में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि वे भारतीय समाज को जाग्रत और शिक्षित देखना चाहते थे। उनके लिए साहित्य का उद्देश्य केवल सौंदर्य-सृष्टि नहीं था, बल्कि मनुष्य को अधिक विवेकशील और संवेदनशील बनाना भी था। यही कारण है कि द्विवेदी युग का साहित्य समाज-सुधार और राष्ट्रीय जागरण से गहराई से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

द्विवेदी युग भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उभार का काल था। अंग्रेज़ी शासन के कारण भारतीय समाज राजनीतिक दासता और आर्थिक शोषण का शिकार था, ऐसी परिस्थितियों में साहित्य राष्ट्रीय चेतना का माध्यम बन रहा था। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने प्रत्यक्ष राजनीतिक विद्रोह के स्थान पर सांस्कृतिक और वैचारिक जागरण को अधिक महत्व दिया। उन्होंने स्वदेशी, आत्मनिर्भरता, शिक्षा और राष्ट्रीय गौरव पर बल दिया। उनके साहित्य में भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा सम्मान दिखाई देता है। उनकी प्रेरणा से हिंदी कविता में राष्ट्रभावना का विस्तार हुआ। मैथिलीशरण गुप्त की “भारत-भारती” जैसी कृतियाँ इसी राष्ट्रीय चेतना की उपज थीं। हिंदी साहित्य अब केवल श्रृंगार और दरबारी भावुकता तक सीमित नहीं रहा; वह राष्ट्र की पीड़ा, जनता की आकांक्षाओं और स्वतंत्रता की चेतना का स्वर बनने लगा।

द्विवेदी जी केवल कविता, कहानी, आलोचना आदि को ही साहित्य मानने के विरुद्ध थे। वे अर्थशास्त्र, इतिहास, पुरातत्व, समाजशास्त्र आदि विषयों को भी साहित्य के ही दायरे में रखते थे। वस्तुतः स्वाधीनता, स्वदेशी और स्वावलंबन को गति देने वाले ज्ञान-विज्ञान के तमाम आधारों को वे आंदोलित करना चाहते थे। इस कार्य के लिये उन्होंने सिर्फ उपदेश नहीं दिया, बल्कि मनसा, वाचा, कर्मणा स्वयं लिखकर दिखाया। उन्होंने वेदों से लेकर पंडितराज जगन्नाथ तक के संस्कृत-साहित्य की निरंतर प्रवहमान धारा का अवगाहन किया था एवं उपयोगिता तथा कलात्मक योगदान के प्रति एक वैज्ञानिक दृष्टि अपनायी थी। उन्होंने श्रीहर्ष के संस्कृत महाकाव्य नैषधीयचरितम् पर अपनी पहली आलोचना पुस्तक ‘नैषधचरित चर्चा ‘ नाम से लिखी (1899), जो संस्कृत-साहित्य पर हिन्दी में पहली आलोचना-पुस्तक भी है। फिर उन्होंने लगातार संस्कृत-साहित्य का अन्वेषण, विवेचन और मूल्यांकन किया। उन्होंने संस्कृत के कुछ महाकाव्यों के हिन्दी में औपन्यासिक रूपांतर भी किये, जिनमें कालिदास कृत रघुवंश, कुमारसंभव, मेघदूत , किरातार्जुनीय प्रमुख हैं और यह हिंदू समाज के थे। संस्कृत, ब्रजभाषा और खड़ी बोली में स्फुट काव्य-रचना से साहित्य-साधना का आरम्भ करने वाले महावीर प्रसाद द्विवेदी ने संस्कृत और अंग्रेजी से क्रमश: ब्रजभाषा और हिन्दी में अनुवाद-कार्य के अलावा प्रभूत समालोचनात्मक लेखन किया। उनकी मौलिक पुस्तकों में नाट्यशास्त्र(1904 ई.), विक्रमांकदेव चरितचर्या(1907 ई.), हिन्दी भाषा की उत्पत्ति(1907 ई.) और संपत्तिशास्त्र(1907 ई.) प्रमुख हैं तथा अनूदित पुस्तकों में शिक्षा (हर्बर्ट स्पेंसर के ‘एजुकेशन’ का अनुवाद, 1906 ई.) और स्वाधीनता (जान, स्टुअर्ट मिल के ‘ऑन लिबर्टी’ का अनुवाद, 1907 ई.)। द्विवेदी जी ने विस्तृत रूप में साहित्य रचना की। इनके पद्य के मौलिक-ग्रंथों में काव्य-मंजूषा, कविता कलाप, देवी-स्तुति, शतक आदि प्रमुख है। गंगालहरी, ॠतु तरंगिणी, कुमार संभव सार आदि इनके अनूदित पद्य-ग्रंथ हैं।

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