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धर्मचारिणी, तपोधना शबरी

 डा. जयशंकर शेरपुरवासी

शबरी का जन्म भीलों की उपजाति शाबर समुदाय में श्रीराम से बहुत पहले हुआ था। इनका असली और मूल नाम श्रमणा था। शाबर समुदाय में उत्पन्न होने के कारण इनको शबरी के नाम से लोग पुकारते थे। बाद में चलकर यही नाम इनकी पहचान बन गया। इनके पिता का नाम अज और माता का नाम इन्दुमति था। ये अपने माता -पिता की एकल कन्या संतान थी। इनके पिता अपने समुदाय के मुखिया थे। यह बचपन से ही स्वभाव में सुशील, दयालु प्रकृति की थी। इनके अंदर सेवा भाव कूट -कूट कर भरा हुआ था। एकमात्र संतान होने के नाते इनका पालन-पोषण बहुत ही दुलार-प्यार के साथ हो रहा था। जैसे -जैसे उम्र बढती गई इनका रूप लावण्य निखरता गया। इनको प्रकृति,पशु -पक्षियों और अन्य मासूम जीव-जंतुओं से बहुत लगाव था। ये जहां पर पक्षियों के झुण्ड को देखती थी वहीं पर कभी बैठकर कभी खडा होकर घंटो उनसे बातचीत करती रहती थी। किशोरावस्था तक पहुंचते -पहुंचते इनका स्वभाव अन्य हम उम्र लडकियों से एकदम भिन्न दिखाई देने लगा। जिस तरह से अन्य लडकियां इस उम्र में साज-सज्जा, रूप-श्रृंगार या अन्य स्त्री जनित व्यवहार में रूचि लेती थी उसके ठीक उलट इनका रहन -सहन और दिनचर्या थी। हंसी -ठिठोली से दूर एकांत शांत वातावरण में रहना इन्हें ज्यादा पसंद था। सात्विक भाव से अपने कुल देवता -देवी की पूजा अर्चना में इनका मन ज्यादा रमता था। ये शुरू से मन-कर्म-वचन और काया से इतनी पवित्र थी कि कभी-कभी बैठे-बैठे आकाश को निहारते-निहारते उसी में खो जाती थी और घंटों उस समाधि अवस्था में हंसती और मंद-मंद गति से मुस्कुराती रहती थी। उनकी इस अवस्था को देखकर ऐसा लगता था जैसे कोई शक्ति अदृश्य रूप में इनके सामने खडी हो और तन-मन की सुध- बुध खोकर उसी के मिलन में ये डुब गई हों। इनके माता -पिता इनकी इन गतिविधियों और असामान्य व्यवहार को देखकर चिन्तित रहने लगे। एक दिन पति -पत्नी दोनों ढूंढ़ते- ढूंढ़ते भूत-वर्तमान तथा भविष्य की गणना करने में प्रवीण, प्रकाण्ड, विद्वान आचार्य के पास पहुँच कर उनसे अपनी कन्या के बारे में बताकर उसके भविष्य को जानने के बारे उत्सुकता प्रकट किया। इनकी चिंता को समझते हुए आचार्य ने बताया कि कन्या के जीवन में वैराग्य योग प्रबल है। सांसारिक जीवन, मोह -माया तथा कामनाओं से आजीवन विरक्ति भाव का योग है। यदि आप लोग इसका घर परिवार बसाना चाहते है तो तत्काल सुयोग्य वर -घर का चुनाव कर विवाह कर दीजिए, हो सकता है आप दोनों की इच्छा के अनुकूल यह बात बन जाए और सांसारिक जीवन तथा उसकी गतिविधियों में इसका भी मन रमण करने लगे। श्रमणा के पिता बिना समय गंवाए ही अनुकूल वर -घर का चयन कर विवाह की तैयारी में जुट गए। विवाह के अवसर पर वर पक्ष, स्व पक्ष के लोगों, नातेदारों -रिश्तेदारों को दावत देने के लिए एक नया बाड़ा बनवाकर उसमें अनगिनत पशु -पक्षियों को इकठ्ठा कर बंद कर दिया। एक दिन श्रमणा को बाडे के करीब ही बैठाकर मां उसका केश बना रही थी कि सामने बाड़े में कुलबुलाते निरीह नेत्रों से देखते हुए विभिन्न पशु -पक्षियों  को देखकर मां की तरफ चेहरा कर उनसे पूछा कि मां इतने जीवों को इकट्ठा कर बाड़े में क्यों रखा गया हैं? मां ने बहुत प्यार से उसके पीठ पर थपकी देते हुए बताया की तुम्हारे विवाह में दावत देने के लिए। उस समय तो श्रमणा मां की बात को सुनकर शर्माते हुए केश बनवाने में लग गई। लेकिन उसकी जिज्ञासा शान्त नही हुई। पिताजी को एकांत में पाकर बाड़े में बन्धक बनाकर रखे गए जीवों के बारे में पूछा। पिता का उस संबंध में यह उत्तर सुनकर कि ‘तुम्हारे विवाह के दिन इनकी बलि दी जाएगी और सभी के मांस से अतिथियों को दावत दी जाएगी।’ श्रमणा ने उस समय पिता की बात पर कोई प्रतिक्रिया तो नही व्यक्त किया। लेकिन उस ग्यारह बारह वर्ष की कन्या के मन में अजीब तूफान खड़ा हो गया। अनेक तरह के प्रश्नों की बौछार शुरू हो गई। एक कन्या के विवाह में इतने निरीह जीवों का वध?, इसका औचित्य क्या है?, इससे ईश्वर कुपित होंगे, या प्रसन्न?, किसी को प्रसन्न करने के लिए किसी का बध उचित है?,बाद में यह सोचकर और उलझ गई कि उसके विवाह में इतने निरीह जीवों के बध की क्या जरूरत है, ऐसे अप्राकृतिक, निर्दयी, अन्याय पूर्ण कृत्य किए बिना विवाह संस्कार संभव नही है। ऐसा करना तो महापाप होगा और जब मेरे निमित्त होगा तो मै भी इस पाप की सहभागिनी बनूंगी। यह विचार कर वह कांप उठी और मन ही मन दृढ़ निश्चय किया कि ऐसा अन्याय वह कभी नही होने देगी। इस संबंध में युक्ति ढूढ़ने लगी, निदान भी मिल गया। विवाह से एक दिन पूर्व वाली रात को जब माता पिता, सेवा सुश्रूषा में लगे सेवक, विवाह की तैयारी में जुटे लोग सभी गहरी निद्रा में डूब गए तब धीरे से उठकर सबकी नजरों से बचते हुए दबे पांव से चलकर बाड़े तक पहुंचकर एकबार चारो तरफ नजर घुमाई। जब उसे यह विश्वास हो गया कि कोई भी देख नही रहा है तब धीरे से बाडे का दरवाजा खोल दी। दरवाजा खुलते ही कुछ ही पलों के अंदर बंधक सारे पशु -पक्षी  बिजली की स्फूर्ति के साथ सिर पर पांव रखकर भाग गए। बाड़े को खाली देखकर सकून और संतोष की गहरी और दीर्घ श्वांस लेते हुए जब दरवाजा बंद करने लगी तब लगा कि उसकी इस हरकत को कोई देख रहा है। आगामी सुबह के परिणाम को सोचते हुए उसे घर- गांव से निष्क्रमण करने में ही भलाई लगी। निर्बंध किए गए जीवों की भांति सारे संबंधों से अपने को निर्बंध करते हुए श्रमणा भी तीव्र कदमों से चलते हुए अंधेरे में डुब गई।

तेज कदमों से भागते हुए सूरज के डूबने तक गांव से बहुत दूर जा चुकी थी। अब उसे भूख का अनुभव हो रहा था। जंगल में ही कंदमूल: फल से क्षुधा को तृप्तकर वहीं विश्राम करने लगी। अर्धरात्रि के बाद जैसे ही नींद खुली पुनः अनिर्दिष्ट यात्रा पर निकल पड़ी। कई दिनों तक चलते- चलते एक ऐसे अरण्य में पहुंची जहां चारों तरफ से उसकी नाक में हवा में घुली हुई यज्ञ धूमाग्नि की सुगंध बार- बार श्वास के साथ प्रवेश कर रही थी। वहां के वातावरण से शांति- पवित्रता के अनायास अनुभव से समझ गई कि इस हरेभरे छतनार, कचनार वृक्षों से संपन्न वन के बीच में कोई न कोई बहुत विशाल ऋषियों, तपस्वियों का संकुल होगा। इनके निवास के कारण यह स्थान गतिमान जल के स्रोत से भी अवश्य संपन्न होगा। यह सब सोचकर यहीं निवास करना श्रमणा को सुकर लगा। प्रथम रात्रि में छुप -छुपाकर इस स्थान के निरीक्षण में उसे विशालकाय बहुत दूर में प्रसरित ऋषियों के आश्रम, नजदीक में ही कलकल-छलछल करती हुई उद्दाम परन्तु शांत भाव से प्रवाहित होती हुईं तपस्विनी सम नदी भी दिखाई दी।इससे कुछ ही दूरी पर पार्श्व में अवस्थित विशालकाय स्वच्छ जलापूरित  पम्पासरोवर  भी था। वहीं संकुल के बीचोंबीच सर्वोच्च श्रेष्ठ संकुल अभिभावक ऋषि का ध्वज सज्जित आश्रम भी उसने पहचान लिया। यह स्थान ही उस समय दंडकारण्य नाम से अभिहित किया जाता था। बहुत अल्प समय में वहां के कोने -कोने की जानकारी कर, वातावरण की और गतिविधियों तथा दैनिक चर्या से अतिसूक्ष्म भाव से भलिभांति परिचित होकर श्रमणा प्रतिदिन ब्रह्ममुहुर्त से पहले ही स्नानादि करके नदी के तरफ जाने वाले रास्ते को झाड़-बुहार कर स्वच्छ कर, ऋषि संकुल के मध्य में ढेर सारे प्रस्फुटित, खिले हुए फूल पलाश के पत्तलों में रखकर और यज्ञ में प्रयोग हेतु छोटे- छोटे गठ्ठरों में बांधकर पतली- पतली, छरहरी, सूखी लकडियां रख करके ऋषियों के आवागमन से पूर्व वह जाकर घास-फुंस से बनाई गई अपनी झोपडी में विलुप्त हो जाती थी। पूरे दिन सोती या झोपडी में बैठकर ऋषियों के द्वारा उच्चरित मंत्रों को सुनकर सीखे गए आधे-अधूरे मंत्रों का मनसा जाप करती रहती थी और संध्या वन्दना के बाद ऋषि संकुल में जैसे- जैसे शान्ति होती जाती थी वैस ही वैसे उसकी दैनिक चर्या प्रारंभ हो जाती थी। सभी ऋषि प्रतिदिन स्नान रास्ते, यज्ञ परिसर की साफ-सफाई, पूजा के पुष्प तथा यज्ञ हेतु लकडियों को देखकर एक दूसरे से बिना कुछ प्रश्न किए केवल उत्सुकता भरी नजरों से जानना चाहते थे कि इनमें से कौन त्यागी, परिश्रमी, अति पुरूषार्थी है जो सबके जागने से पहले इतना सब कुछ कर देता है। यह सबकुछ ऋषिकुल महर्षि श्रेष्ठाचार्य मतंग के लिए भी पहेली बना हुआ था। निर्धारित समय से पूर्व उठकर कई दिनों से इस गुत्थी को सुलझाने में लगे हुए थे। एकदिन दैवीय प्रकाश से आपूरित अल्प वस्त्रों से अपने शरीर को छुपाए कन्या को जाते हुए देखकर उसको रूकने का संकेत किया। डरी- सहमी कन्या ऋषि गुरू के मन को पढकर कांपते हुए टूटे- फूटे शब्दों के माध्यम से घर से भागी हुई, अन्त्यजा, मूढ, निम्न जाति शबर कुल में जन्मी, बेसहारा होने का अपना परिचय दिया। अधम अधम ते अधम अति नारी,तिन्ह मंह मै मतिमंद अघारी। अभी यहां कब से किस कारण से कहां वास करने, कैसे भरण पोषण करने आदि के बारे में पूछ ही रहे थे कि कुछ ही क्षणों में सौ से ज्यादा अन्य ऋषि उपस्थित हो गए और इसके बारे में तरह-तरह की बाते करने लगे। अन्त्यजा, निम्न जाति की होने की बात आचार्य से सुनकर कुछ तो अत्यंत आग बबूला हो उठे और इसे चोरिनी, अपराधिनी, ऋषि संकुल को भ्रष्ट करने का आरोप मढते हुए कठोरतम दंड देकर हिंस्र पशुओं के सामने फेंकने की बात कहने लगे। लेकिन आचार्य ने सबको समझाकर शांतकराकर दया भाव दिखाने की बात कही। यही नहीं जब उन्होंने इसी संकुल के एक कोने में श्रमणा को रखने की जब बात कही तो उन्हीं पर अधिकांश ऋषियों ने प्रश्नों की बौछार कर दी। अंतत: आचार्य ने सबको शांत कराकर उसी परिसर में एक कोने में अवस्थित कुटिया में श्रमणा को रहने के लिए मना लिया। उसी के बाद श्रमणा शबरी बन गई। आयु बढ़ने के कारण आचार्य की अशक्तता जैसे- जैसे बढती गई वेसे ही वैसे उनके प्रति उसका सेवा-समर्पण भाव भी बढ़ता गया। ऋषिराज के शरीर छोड़ने की बात सोचकर वह सिहर उठती थी, आखिरकार समय व्यतीत होने के साथ वह पल भी आ गया। ऋषि जैसे- जैसे अंतिम सांसों की तरफ बढ रहे थे वैसे ही वैसे शबरी की आंखों से अश्रुओं की झड़ी-लड़ियों में बदलती गईं।अपने को मजबूत करते हुए उसने पूछा कि आचार्य श्री एक पिता को तो मै बहुत पहले छोड़ कर आ गई थी क्या दूसरे पिताश्री भी मुझे अनाथ करके चलें जाएंगे, अब जीवन का क्या आधार होगा? मुझे भी साथ ले चलिए, अब इस जीवन का कोई अर्थ नहीं है। शबरी के आर्त क्रंदन को सुनकर अपनी निकलने को आतुर श्वासों को रोककर समझाते हुए कहने लगे, पुत्री धैर्य के साथ अपना कर्म करते हुए अपनी मौन तपस्या निरंतर बनाए रखो, एक दिन जगत के आधार प्रभु श्रीराम तुमसे मिलने चलकर अवश्य आएंगे और मोक्ष प्रदान करेंगे। भिलनी परम तपस्विनी,शबरी जाको नाम।गुरू मतंग कहकर गये,तोहिं मिलेंगे राम।। ऋषि को देह त्याग किए हुए अनगिनत वर्ष बीत गए और वह अहर्निश प्रभु की प्रतीक्षा में लगी रही। प्रतिदिन झोपड़ी को साफ कर,फूल-मालाओं से सजा कर झोपड़ी तक आनेवाले सभी रास्तों को झार- बुहारकर,तोड़ कर लाए गए फलों में से चखकर मीठे- मीठे फल-मूलों को टोकरी में रखकर प्रभु की प्रतीक्षा करती रही। अनगिनत वर्षो की प्रतीक्षा में जब कभी नैराश्य का भाव दस्तक देने लगता था तो दूसरे पितृतुल्य गुरूदेव की बात- स्मरण कर पुनः भजन करने लगती थी। उसे सूर्य- चन्द्रमा के प्रतिदिन आने-जाने की सत्यता से ज्यादा अटूट विश्वास गुरूदेव के कथन पर था। शरीर अपनी गति के अनुसार तो अशक्त हो ही रहा थ। अब आंखों से भी धुंधला दिखाई देने लगा। इस परिवर्तन से उसको एक चिंता होने लगी कि यदि प्रभु इसी बीच आ जाएंगे तो कैसे सुस्पष्ट उनके अंग- प्रत्यंग को निहार सकेगी? प्रतीक्षा का अंत हुआ, वह घड़ी भी आ गई। एक बृद्ध सज्जन ने दौड़ते हुए आकर सूचना दी कि शबरी माता दो दिव्याभा से पूर्ण अवतारी राजकुमार तुम्हारी कुटिया के बारे में पूछते हुए आ रहें हैं। इतना सुनते ही उसकी आंखें विशेष चमक से भर गई, अंग-प्रत्यंग नवस्फूर्ति से भर उठे, आंखों से अश्रु पुष्प की पंखुडियों से झरने लगे। शबरी झोपड़ी में सब कुछ व्यवस्थित कर रास्ते को आंचल से पोछते हुए बाहर बिजली की गति से भागी और चारों तरफ आंखें फाड़-फाड़कर निहारने लगी, ईश्वरीय सुंगंधपूरित वायु के झोकों की महक को पीते हुए, छाया युक्त अलौकिक प्रकाश के आगमन से समझ गई कि प्रभु ही आ रहें हैं। दोनों नेत्रों को दोनों हथेलियों से ढककर प्रार्थना कर ही रही थी कि शिर पर शीतल स्पर्श का अनुभव हुआ। आंख खुली तो सामने साक्षात् प्रभु भ्राता लक्ष्मण के साथ खड़े थे। जिस तिथि को राम आए थे और शबरी से मिले थे वह फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की शुभ सप्तमी तिथि थी। प्रभु को देखते ही गला रूंध गया, आंखों से अश्रु की बहती हुई धारा रूकने का नाम नही ले रही थी, मूर्तिवत स्तम्भित शबरी को ठिठका देख राम के यह कहने पर कि मां कुछ जलपान भी कराओगी अथवा खडा ही रखोगी। संकुचित भाव से शर्माते हुए, आईए-आईए इस अनुनय भरे आग्रह के साथ झोपड़ी की तरफ त्वरित गति से भागी। झोपड़ी में आसन देकर प्रभु और उनके अनुज लक्ष्मण जी का पैर धोने के पश्चात दोनों महतजनो को धुल- पोछकर एक- एक कन्दमूल- फल को चख- चख कर आंचल से हवा करते हुए खिलाने लगी। कुछ देर पश्चात संकोच के साथ पूछने लगी कि कुटिया को ढूंढ़ने में ज्यादा कष्ट तो नहीं हुआ, जानते हो राम तुम्हारी तब से प्रतीक्षा कर रही हूँ जब तुम जन्मे भी नही थे, यह भी नहीं जानती थी कि तुम कौन हो?, कैसे दिखत हो? क्यों आओगे मेरे पास? बस इतना पता था कि कोई पुरूषोत्तम आकर मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा। एक बात बताऊं प्रभु, मुझे मार्जारी भक्ति ज्यादा सहज लगती है इसी लिए उसी को अपनाया, जैसे उसका बच्चा निश्चिन्त भाव से बैठा रहता है कि मां है न…मै भी निश्चिंत थी कि एक दिन तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना। पुनः कहने लगी…बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी रहती है न राम ….कहां सुदूर उत्तर के तुम, कहां घोर दक्षिण की मैं, तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की अंत्यज भीलनी, तुम क्यों मेरे पास आते, जरूर कोई न कोई आने का महत् उद्देश्य होगा। भीलनी माँ शबरी की बात को सुनकर राम मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। जैसे ही राम को अवसर मिला कहने लगे-माँ भ्रम में मत पडो, राम रावण का वध करने नहीं आया है, रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से बाण संधान कर ही कर सकता है। कहे रघुपति सुन भामिनी बाता,मानहु एक भगति कर नाता। राम हजारों कोस चलकर इस गहन वन में तुमसे केवल मिलने के लिए आया है मां, ताकि सहत्रों वर्षों के बाद भी जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खडा करे तो इतिहास चिल्लाकर उत्तर दे कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिलकर गढा है,जब कोई भारत की परंपराओं पर उंगली उठाये, तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि ‘नहीं यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहां एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षारत एक वनवासिनी से भेंट करने हेतु चौदह वर्ष का वनवास भी स्वीकारता है,’ राम वन में बस इसलिए आया है ताकि ‘जब युगों का इतिहास लिखा जाए तो उसमें अंकित हो कि शासन /प्रशासन और सत्ता जब पैदल चलकर वन में रहने वाले समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे तभी वास्तविक रामराज्य आएगा।’…आज महर्षि मतंग की भविष्यवाणी सत्य हो गई और पूर्ण हो गई शबरी की साधना।  पूर्ण संतुष्ट होकर उसने अंत में राम को  सलाह देते हुए बताया कि यहां से नीचे की तरफ कुछ दूर जाने पर हनुमान मिलेंगे और वह वानरराज सुग्रीव से मित्रता का माध्यम बनेंगे तथा सुग्रीव से मित्रता होने पर ही सीता की खोज का मार्ग प्रशस्त होगा। राम के प्रस्थान के लिए उठते ही शबरी माता स्वयं को योगाग्नि में भस्म करके सदा के लिए उन्हीं के चरणों मे लीन हो गई और मोक्षधाम चली गई।

 

लेखकडा. जयशंकर शेरपुरवासी
               वर्तमान मे निवास लखनऊ
                 संपर्क सूत्र– 6394192621

 

 

संदर्भ ग्रंथ

  1.  वाल्मीकि रामायण ।
  2. कम्ब रामायण ।
  3. आध्यात्म रामायण ।
  4. रामचरित मानस ।
  5. रामानन्द सागर निर्मित रामायण सीरियल ।

 

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