Breaking News :

nothing found

मायाजाल (कहानी)

गौरी तिवारी

अचानक दोपहर में लाउडस्पीकर के शोर के कारण घर की खिड़कियों में कम्पन होने लगा, मानो भूकंप आया हो और खिड़कियां आपस में ज़ोर-जोर से टकराने लगी। तभी सीमा बालकनी में जाकर जाकर देखती है कि सड़क पर लगभग 60-70 लोग पटाखे जलाते हुए, किसी की जय-जयकार लगाते हुए कहीं जा रहे हैं और उनके पीछे एक पुष्पों से सजे रथ पर एक व्यक्ति अद्भुत श्रृंगार किए, गले में पुष्पों की माला पहने तथा सिर पर मुकुट पहने बैठा है और उस व्यक्ति के रथ के पीछे कई छोटी बड़ी गाड़ियां साथ चल रही हैं और उन सबके पीछे एक ट्रक है जिसमें 3 बड़े लाउडस्पीकरों में फिल्मी भजन चल रहे हैं जिनकी आवाज़ मधुर की जगह कर्कश है और कानों में चुभ रही है। शोर के कारण सीमा ज्यादा देर बालकनी में खड़ी नहीं रह पाती। तभी कोई धीरे से दरवाजा खटखटाता है, शोर के कारण सीमा को सुनाई नहीं देता, दरवाजा ना खुलने पर आवाज और तेज हो जाती है तब सीमा जाकर देखती है कि अगली गली वाली सरोज जी अपने दोनों बच्चों को लेकर आई हैं।
” भाभी जी आप तो जानती ही हैं, रिंकी और टिंकू के पेपर चल रहे हैं। उसी में आज हमारी गली के बाहर ही कोई कार्यक्रम हो रहा है जिसके शोर के कारण बच्चे पढ़ नहीं पा रहे। क्या ये दोनों 2-3 घंटे आपके यहां रुक सकते हैं?”
“अरे जी जी, इन्हें यहीं छोड़ दीजिए। इसी बहाने नैन्सी भी इनके साथ पढ़ लेगी, कल उसका भी तो पेपर है।”

सीमा बच्चों के साथ बैठकर उन्हें पढ़ा ही रही होती है कि लाउडस्पीकर पर फिल्मी भजन की आवाज़ बंद हो जाती है। वह अपनी उत्सुकता को रोक नहीं पाती और समारोह देखने के लिए एक बार फिर बालकनी में जाती है। उसे लगता है कि शायद कोई ड्रामा कंपनी रामलीला का मंचन कर रही है इसलिए उसकी उत्सुकता और बढ़ जाती है लेकिन भीड़ के कारण उसे ठीक से कुछ दिखाई नहीं देता इसलिए वह बाहर जाकर समारोह में सम्मिलित होने का निश्चय करती है।
जब वह एक गली आगे जाती है तो देखती है कि पूरी सड़क पर फूलों की पंखुड़ियां गिरी हैं, कहीं पटाखों का कूड़ा गिरा है तो कहीं पुष्प मालाएं, जगह जगह दीवारों पर श्री श्री श्री पूजनीय अनंत महाराज जी नाम के व्यक्ति के पोस्टर चिपकाए गए हैं। वह थोड़ा और आगे जाती है तो उसे एक टेंट दिखाई देता है जहां लगभग सैकड़ों लोगों की भीड़ इकट्ठा हुई होती है। सीमा भीड़ से बचते हुए अंदर जाने का प्रयास करती है तो देखती कि बाहर से साधारण दिखने वाला टेंट भीतर से पूरा सजा हुआ है, लगभग 5-6 कूलर लगे हैं और चारों ओर से किसी इत्र की सुगंध आ रही है। एक बड़ा सा गद्देदार आसन है जिसपर रथ पर बैठे व्यक्ति की ही तरह दिखने वाला कोई लंबी दाढ़ी वाला व्यक्ति स्वर्ण मुकुट पहने, रेशमी वस्त्र पहने बैठा है, उसके आसन के सामने 3-4 माइक लगे हैं और कुछ दूरी पर 20-25 कुर्सियां लगी हुई हैं, बाकी जगह दरी बिछाई गई है। वह खाली कुर्सी देख उसपर बैठने ही वाली होती है कि आयोजक समिति का एक सदस्य उसे बैठने से यह बोलकर मना कर देता है कि वह कुर्सी वी.आई.पी लोगों के लिए है, जिन्होंने 250 रुपए का शुल्क देकर पर्ची ली है। यह सुनते ही सीमा उठकर बाहर जाने लगती है तभी महाराज जी ने अपनी काव्यात्मक, मधुर वाणी में प्रवचन प्रारंभ किया –
“साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥
आजकल मनुष्य अपने जीवन का अधिकांश भाग उन वस्तुओं के पीछे भागते हुए व्यतीत कर रहा है जिन्हें वह स्थायी समझ बैठा है, जबकि सत्य यह है कि इस संसार में कुछ भी चिरस्थायी नहीं। धन, प्रतिष्ठा, रिश्ते और यश ये सभी समय के प्रवाह में बह जाने वाली छायाएँ हैं। इनका सबसे बड़ा छल यही है कि वह अस्थायी को स्थायी प्रतीत करवाती हैं और मनुष्य को लोभ और माया में ऐसा उलझा देती हैं कि वह स्वयं को ही भूल जाता है। व्यक्ति घर बनाता है, संपत्ति जोड़ता है, नाम कमाता है, परंतु अपने अंतर्मन की शांति खो देता है। वह संसार की दृष्टि में सफल दिखाई दे सकता है, किंतु भीतर से भय, असुरक्षा और असंतोष से भरा रहता है। कारण यह है कि बाहरी वस्तुएँ मन को क्षणिक सुख तो दे सकती हैं, पर आत्मा को संतोष नहीं। आज ईश्वर ने हमें यहां जनसेवा के लिए भेजा है, मनुष्य को सही मार्ग दिखाने के लिए। इस ब्रह्मांड में तुम्हारा अस्तित्व समुद्र पर उठे उस बुलबुले के समान है जो एक क्षण चमकता है और अगले ही क्षण लहरों में विलीन हो जाता है। कोई अपने महलों पर गर्व करता है, कोई अपने रूप पर, कोई अपनी सत्ता पर। परंतु हमने श्मशानों की राख में राजाओं को मिटते देखा है। हम तुम्हें बाँधने नहीं, मुक्त करने आए हैं। हमने जीवन में कभी कुछ नहीं माँगा। आश्रम, गाड़ियाँ, भवन, ये आयोजन सब भक्तों के प्रेम का भार है, जिसे हम विनम्रता से ढो रहे हैं। ईश्वर हमारे स्वप्न में आए और उन्होंने दुख जाहिर किया कि किस प्रकार आज मनुष्य मोह के जाल में फंस चुका है उसका समस्त जीवन स्वः तक सिमट कर रह गया है। व्यक्ति जब तक सांसारिक सुखों के इस जंजाल से बाहर नहीं निकलता तब तक वह खुद को नहीं जान पाएगा, और ना ही उसे आत्मबोध होगा। आप जितनी दूसरों की सहायता करेंगे उतना आप इस मायाजाल से बाहर निकलेंगे। धन, संपत्ति, आभूषण सब क्षणभंगुर हैं। इसलिए आश्रम में दान किया गया धन वास्तव में आप सबके मोह का विसर्जन होगा। हम तो हमारे भक्तजनों द्वारा दिए गए दान को स्पर्श भी नहीं करते उसके लिए अलग समिति बनी हुई है। हमें सिर्फ उन अतृप्त आत्माओं की चिंता है जो इस मायाजाल के कारण मृत्यु के पश्चात भी भटक रही हैं।”

सीमा इस ढोंग पर हस रही थी कि किस प्रकार एक ओर मायाजाल की बात की जा रही है और वहीं दूसरी ओर कुर्सी पर बैठने के लिए 250 रुपए का शुल्क मांग रहे हैं। उसका इतने में ही मन ऊब गया वह समझ गई कि यहां ईश्वर के नाम पर पाखंड हो रहा है इसलिए वह जाने लगती है तभी टेंट के बाहर निकलते ही देखती है कि भीड़ में तपती गर्मी के कारण एक वृद्ध महिला बेहोश होकर गिर गई, सबका ध्यान ईश्वर के दूत महाराज जी की एक झलक देखने में होता है कोई उस महिला के पास नहीं जाता। तब सीमा उन्हें उठाकर पानी पिलाती है और उनकी बेटी को फोन करके बुलाती है।

घर पहुंचते पहुंचते उसे देर हो जाती है, तब तक तीनों बच्चों की पढ़ाई भी पूरी हो जाती है। रिंकी और टिंकू को उनके घर छोड़कर आने के बाद सीमा आरामकुर्सी पर बैठ जाती है। मानसिक रूप से बहुत थकने के कारण कुर्सी पर बैठे बैठे ही उसकी आंख लग जाती है। देर शाम, आरती की आवाज़ से उसकी नींद टूट जाती है। वह बालकनी में जाकर देखती है कि महाराज जी का प्रवचन समाप्त हो चुका था और दिव्य पुरुष अपनी पलटन के साथ वापस जाने की तैयारी कर रहे थे। किंतु इस बार उनका रथ गायब था, शायद पहले ही चला गया, तभी अचानक वह देखती है कि दिव्य पुरुष अपने अंगरक्षक और ड्राइवर के साथ एक काले रंग की ‘मर्सिडीज’ में बैठकर जाने लगते हैं।
ईश्वर के मानव स्वरुप को देखने के लिए आतुर भक्त उनकी गाड़ी की ओर इस जोश के साथ भाग रहे थे कि एक छोटा बच्चा अपने खिलौने के साथ खेलता हुआ किसी को दिखाई ही नहीं दिया और भक्तों की भीड़ उसे कुचलते हुए आगे बढ़ गई। तभी उसकी मां भय से चीखती हैं “मेरा रोहन गिर गया!!! रुक जाइए,आप सभी रुक जाइए!!! कोई बचाओ मेरे बच्चे को!!”
भगदड़ में उस मां के क्रंदन को सभी ने ठीक उसी प्रकार अनदेखा और अनसुना कर दिया जिस प्रकार नैतिक मूल्यों, अंधभक्ति और भ्रष्टाचार पर दिए गए भाषणों को किया जाता है। भक्तों को अंतिम दर्शन देने के लिए महाराज जी अपनी गाड़ी से बाहर निकलते हैं और एक बेकाबू भीड़ को अपने पास आ देखते हैं तभी उस बच्चे की मां अपने बेटे को गोद में लिए भागती हुई आती हैं और कहती हैं “महाराज जी मेरे बच्चे को बचा लीजिए। इसे आपके आशीर्वाद की जरूरत है, कोई चमत्कार कीजिए महाराज जी! मैंने अपने साथ लाए सारे पैसे दूसरों की भलाई के लिए आपकी संस्था की दानपेटी में दान कर दिए। इसे बचा लीजिए”
दिव्य पुरुष उस स्त्री को अनदेखा कर जल्दी से अपनी गाड़ी में बैठते हैं और उनकी मर्सिडीज पलक झपकते ही भीड़ की नजरों से ओझल हो जाती है।

Read Previous

धर्मचारिणी, तपोधना शबरी

Read Next

धर्म से गिरे, विज्ञान में अटके

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Most Popular