अनिल तिवारी
धर्म। एक शब्द है, पर मामूली मत समझिएगा इस शब्द को। इस शब्द ने सदियों से मनुष्य के जीवन को दिशा दी है और उसकी गतिविधिओं को नियंत्रित किया है। इस शब्द की खासियत है, कि आप जितने लोगों से पूछेंगे, उसकी उतनी परिभाषा पाएंगे। ऐसा शायद ही हिंदी कोष में कोई और शब्द हो जिसके इतने अर्थ हों।
ईश्वर धर्म के केंद्र में है। हर धर्म के अपने-अपने ईश्वर हैं, उस ईश्वर के मुख से निकले अपने अपने सन्देश, उस तक पहुंचने के अपने-अपने रास्ते। सृष्टि में मौजूद हर तत्व की रचना सबके अपने वाले ईश्वर ने की, उसकी अनुमति के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता, सबके जीवन का उद्देश्य अपने वाले ईश्वर के संदेशों पर चलकर उस तक पहुंचना है। बस यहीं दूसरा शब्द आता है, विज्ञान। यह वो ज्ञान है जो प्रमाण-पत्र मांगता है। सृष्टि में मौजूद रहस्यमयी शक्तिओं को समझना और अपनी समझ को प्रमाणित करना विज्ञान के केंद्र में है। विज्ञान ने जन्म लेते ही पूछा कि ईश्वर को प्रमाणित कर सकते हो ? सवाल लाजमी भी है, हजारों सालों की तलाश पर भी अगर हम उसे साबित नहीं कर पा रहे तो फिर इस तलाश का क्या मतलब ? अगर अपने वाले ईश्वर की आराधना करने से ही सब कुछ हासिल होगा, तो फिर ईश्वर के अस्तित्व को नकारने वाले या दूसरे ईश्वर को मानने वाले इतना कुछ कैसे हासिल कर गए? अगर ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता, तो क्या यह मान लिया जाए की अमेरिका का जापान पर बम गिराना, आतंकवादी संगठनों का लाखों निर्दोषों का कत्ल करना, करोड़ों लोगों को उनके जन्म के आधार पर अछूत कर देना, यह सब ईश्वर की मर्जी थी? अगर जीवन मृत्यु सब पहले से तय है और मनुष्य का इस पर कोई जोर नहीं तो ऐसा क्यों है की आजादी के वक्त जहां मनुष्य की औसतन आयु 35 वर्ष थी, वहीं आज 65 है ? ऐसे न जाने कितने सवाल से विज्ञान ने धर्म की बुनियाद पर प्रहार किया है जिनके जवाब देने में धर्म नाकाम रहा है। पर सवाल पूछना सिर्फ विज्ञान ही नहीं जानता। जाहिर सी बात है की जीव और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को लेकर विज्ञान भी कोई ठोस प्रमाण नहीं दे पाया है। उसके पास कई परिकल्पनाएं हैं, पर वह भी धर्म की मान्यताओं की तरह अप्रमाणित हैं। ईश्वर और जीव की उत्पत्ति पर दोनों कहीं न कहीं अपूर्ण हैं। बुद्ध ईश्वर के होने या ना होने पर शांति से कहते हैं कि मैं बस इतना जानता हूं कि मनुष्य दुखी है। अगर ईश्वर है, तब भी उसके जीवन में दुःख है। अगर नहीं है, तब भी। मैं तो दुःख दूर करने के उपाय बता रहा हूं।
पर धर्म सिर्फ ईश्वर पर ही खत्म नहीं होता। इसके और भी पहलू हैं। सामूहिक त्योहारों के माध्यम से समाज को जोड़ने का जो काम धर्म करता है उसका शायद ही विज्ञान के पास कोई जवाब हो। जो एकता, प्रेम, उत्साह और खुशी दशहरा, क्रिसमस या ईद जैसे धार्मिक त्यौहार ला सकते हैं, क्या वह विज्ञान का ट्रेड फेयर ला सकता है? शायद नहीं। वैसी ही धर्म के (खास तौर पर हिन्दू धर्म के) के आध्यात्मिक पहलू पर शायद ही किसी को आपत्ति होगी। आध्यात्म और योग करने वाले लोगों के जीवन में स्थिरता, संयम और शांति साफ देखी जा सकती है। विज्ञान की खोजों ने दुनिया के एक कोने को दूसरे कोने से जोड़ा है, कई रोगों से मुक्त किया है, कई आपदाओं के कारणों को ढूंढ़ उसे रोकने या उसके प्रभाव को कम करने का काम किया है।
पर, एक पहलू सबसे अहम है। किसी भी समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए स्थिरता चाहिए। यह स्थिरता तभी आ सकती है जब मनुष्य के स्वभाव और उसकी गतिविधिओं को नियंत्रित करने के लिए कोई स्थिर व्यवस्था हो, जिसमें रहने वाले प्रत्येक मनुष्य के लिए भूमिका और जिम्मेदारी पहले से तय हो जिसके अनुरूप वह व्यवहार कर अपनी और समाज की जरूरतों को पूरा कर सके। सदियों से विश्व में और खासकर भारत में धर्म इस सामाजिक व्यवस्था को निर्मित और नियंत्रित करता रहा है। धर्म ही वह माध्यम रहा है जिसके रीती-रिवाजों और संस्कारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी मनुष्य को स्थिर सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप ढालने का कार्य किया व उसकी जरूरतों को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाई। खाना-पीना, रहना, शादी, रिश्तेदारी, पेशा, जमींन-जायदाद जैसी तमाम बुनियादी चीजें इन्हीं व्यवस्थाओं द्वारा तय की जाती रहीं। कहा जा सकता है कि धर्म मनुष्य को सामाजिक दिशा में मोड़ता है। वहीं दूसरी तरफ विज्ञान मनुष्य की जिज्ञासा को बढ़ाने का प्रयास करता है। फलस्वरूप मनुष्य बुद्धिवाद की तरफ बढ़ता है। वह कही-सुनी बातों और बनी-बनायी व्यवस्था के बजाय अपनी बुद्धि पर आश्रित हो जिज्ञासाओं के सागर में तैरने लगता है। इसी क्रम में आगे बढ़ वह दौर आता है जब वह अपनी बुद्धि को दूसरों की बुद्धि से श्रेष्ठ आंकने लगता है और अब वह अपनी दुनिया अपने हिसाब से बनाते हुए उसमे डूब जाता है। वह हर प्रकार की वस्तुओं का उपभोग कर अपनी जरूरतों को बढ़ाता जाता है और इस क्रिया में वह प्रकृति के संतुलन के साथ खिलवाड़ करता है। ऐसी व्यवस्थाएं जो उसकी इस जिः ।सा को रोकने का प्रयास करती हैं, वह उसे र्खा में दी कह उसका विरोध करता है। यानि विज्ञान मनुष्य की जिज्ञासाओं से शुरू होता हुआ उसे समाज से हटकर व्यक्तिवादी बनने की दिशा में मोड़ता है। वह अस्थिरता को जन्म देता है।
कुल मिलाकर कहा जाए तो घर्म और विज्ञान भले ही एक दूसरे के विरोधी प्रतीत हों, पर हैं पूरक । समाज को स्थिरता चाहिए, व्यवस्था चाहिए जो विज्ञान के पास नहीं है पर धर्म के पास है। जैसे-जैसे मनुष्य की समझ विकसित होती है (जिसमें विज्ञान का योगदान अहम है), वैसे-वैसे उस व्यवस्था में बदलाव की भी जरूरत महसूस होती है। चीजें देशकाल परिस्थिति के हिसाब से बदलती हैं। अगर समकालीन परिस्थिति के आधार पर व्यवस्था के खोखले और महत्वहीन तत्वों को नहीं बदला जाए तो वह जड़ता की ओर बढ़ने लगती है जिससे मनुष्य की प्रगति बाधित होती है और शोषण और कुव्यवस्था जन्म लेती है। इसी जड़ता ने हजारों सालों तक महिलाओं और पिछड़ी जातियों का शोषण किया। आवश्यकता इस जडता को तोड व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन करने की है न की व्यवस्था को ही खत्म करने की। जाहिर सी बात है आप एक तरफ नारी सशक्तिकरण और दूसरी तरफ अग्नि परीक्षा, शूर्पणखा की नाक काटना, द्रौपदी का बंटवारा, बुरखा/घूंघट से ढके रखना, चार बीवियां रखना जैसी बातें बहुत देर तक नहीं कर सकते। यह आने वाले वक्त में बदलेंगी। और इस बदलाव का कारण विज्ञान नहीं है, जड़ता है। स्थिरता और अस्थिरता का यह चक्र हमेशा से चला आ रहा है, विज्ञान की शुरुआत से भी पहले, हमेशा चलता रहेगा। एक निश्चित अंतराल के बाद स्थिरता पर प्रहार होगा, अस्थिरता जन्मेगी, कुछ सकारात्मक बदलाव होंगे, अन्धविश्वास और महत्वहीन तत्व हटेंगे, फिर नयी स्थिर व्यवस्था आएगी, फिर एक अंतराल के बाद वही चक्र। विज्ञान और धर्म का सही मिश्रण ही आने वाले वक्त की मांग है धार्मिक विज्ञान/वैज्ञानिक धर्म ।

One Comment
धर्म से गिरे विज्ञान मे अटके शीर्षक आलेख बहुत उच्चकोटि का है।यह आलेख कई बिन्दुओं पर सोचने को मजबूर करता है। वैसे धर्म और विज्ञान दोनों का लक्ष्य समाज ही है। लेकिन मेरा व्यक्तिगत विचार है कि जहां पर धर्म समाज का संपूर्णता में विकास पर बल देता है वहीं विज्ञान एकपक्षीय विकास करता है।