गौरी तिवारी
एक कली थी जन्मी फाल्गुन में
मुख पर तेज, अधरों पर मुस्कान लिए,
दुखों की थी घोर घटा, उन कष्टों में,
आई सम्पन्नता, घर में खुशियाँ जहान लिए।
पर घर की चौखट ने धीरे से
उसके पंखों को तौल लिया,
“कन्या है” कहकर समाज ने
हौसले तोड़ने का प्रयास किया।
फिर भी आँखों में वह अपने
नीले अम्बर का ध्यान किए,
जलती रही वह मौन अग्नि-सी
मन में उज्ज्वल स्वप्न लिए।
अग्नि-पथों पर चलकर उसने
खुद को कुंदन-सा ढाला था,
हर कठिनाई को हँसकर
अपने साहस से टाला था।
कठिन, तूफानी काल में भी
वह अक्षर-अक्षर गढ़ती थी,
हर परीक्षा में अव्वल आकर
नई मिसालें रचती थी।
एक दिवस वह घर से निकली
अपनी पहचान बनाने को,
बंधन की जर्जर दीवारों पर
नव चेतन-दीप जलाने को।
लोगों ने कितने प्रश्न किए,
मर्यादा तक के शूल दिए,
किन्तु नयन में ज्वाला लेकर
उसने सब अवरोध सहे।
धीरे-धीरे उसकी वाणी
जनमन की हुंकार बनी,
चेतनाहीन हर स्त्री की
वह सशक्त झंकार बनी।
जिसे समझा था दुर्बल सबने,
वह पर्वत का साहस निकली,
जिसे दबाने जग उतरा था,
वह भविष्य की आभा निकली।
फिर उसने उन स्त्रियों हेतु
एक नया अभियान रचा,
जिनके हिस्से केवल आँसू,
अपमान और अवसाद बचा
“सृजन” नाम से दीप जलाकर
उसने उन्हें नव संसार दिया,
टूटी हुई असंख्य स्त्रियों को
जीने का एक आधार दिया।
वहाँ किसी की चुप्पी को भी
उसने भाषा देना सीखा,
भीतर जमी हुई पीड़ाओं को
एक नई आशा देना सीखा
जो स्त्रियाँ भय में जीती थीं,
अब निर्भय होकर चलती थीं,
“सृजन” की महफूज़ बाहों में
अपनी तकदीर बदलती थीं।
अब वह सिर्फ बेटी बनकर
घर की चौखट तक सीमित नहीं,
उसकी दृष्टि में जागृत व्यक्ति
अब किसी सत्ता से भयभीत नहीं।
वह प्रश्न भी है, उत्तर भी है,
संघर्षों की हुंकार भी है,
पुरुष-वर्चस्वी युग के विरुद्ध
उठता हुआ उद्घोष अपार भी है।
अब जब फाल्गुन फिर आता है
आँगन दीपों से भर जाता,
उस कन्या की गाथा सुनकर
हर घर साहस से भर जाता
चेतना जागृत होगी जब स्त्री में
तभी अपना अस्तित्व पहचानेगी
समाज के छल की दीवरों को
नवयुग ला जड़ से ढहाएगी।
