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नाम : आजाद, पिताः स्वाधीनता, माता : भारत माता

अनिल तिवारी

सन् 1919 में जनरल डायर ने अमृतसर (पंजाब) के जलियांवाला बाग में कहर ढाया और निहत्थे लोगों को गोलियों से भून डाला। 13 वर्ष की अवस्था में चन्द्रशेखर को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया। 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में चन्द्रशेखर ने भाग लिया और इस विद्रोह के लिए मात्र पंद्रह वर्ष की अवस्था में उसे कठोर सजा सुनाई गई। जज ने जब पूछा-
‘तुम्हारा नाम’
– ‘आजाद’
‘पिता का नाम’
 ‘स्वाधीनता’
– ‘माता का नाम’
– ‘भारत माता’ चन्द्रशेखर ने जवाब दिया।
इस बेअदबी के लिए उसे 15 बेंतों की सजा सुनाई गई। बेंत की हर एक चोट उसकी चमड़ी उधेर देती थी किन्तु उसके मुंह से आह नहीं निकला। बेंत की हरेक चोट पर ‘भारत माता की जय’ की हुंकार सुनाई दी। इस घटना के बाद चन्द्रशेखर तिवारी को देशवासी चन्द्रशेखर आजाद के रूप में जानने लगे। इस घटना के बाद तो जैसे उनकी राष्ट्र भावना को पंख लग गए। उन्होंने अपने आप को आजाद घोषित किया- ‘मैं आजाद हूँ! फिरंगियों मैं तुम्हारे कब्जे में जीते जी नहीं आ सकता।”
आजाद का नाम चन्द्रशेखर सीताराम तिवारी था। उनका जन्म-23 जुलाई 1906 ग्राम-भावरा, जिला-झबुआ, मध्यप्रदेश में हुआ था। उनके पिता-पं. सीताराम तिवारी बड़े धर्म परायण ब्राह्मण थे और माता-जगरानी देवी अपने पुत्र से बहुत स्नेह रखती थी। इनकी प्राथमिक शिक्षा भावरा, उच्च शिक्षा-संस्कृत पाठशाला, वाराणसी में सम्पन्न हुई थी।
पडित जी, चन्द्रशेखर आजाद, 1857 के गदर के बाद गरम दल के संस्थापक प्रथम भारतीय क्रान्तिकारी जिसने ब्रिटिश राज के खिलाफ आजादी के लिए अस्त्र उठाया। एक कर्तव्यपरायण ब्राह्मण जिसका विश्वास था कि दूसरे की भलाई के लिए हथियार उठाना ही देशभक्त सिपाही का धर्म है।
आजाद ने ‘हिन्दुस्तान सोशियलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन’ नाम से क्रान्तिकारी दल का निर्माण किया ‘पूर्ण स्वाधीनता’ इस दल का मुख्य उद्देश्य था। भगत सिंह, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त और राजगुरू चाहते थे कि सामाजिक सिद्धान्त पर आधारित नये भारत का निर्माण हो। आजाद और सहराष्ट्रभक्तों ने ब्रिटिशराज के विरूद्ध कई हिंसक गतिविधियों की योजना बनाई और उसे क्रियान्वित किया। सन् 1926 में काकोरी ट्रेन डकैती और वायसराय के ट्रेन को उड़ाना, सन् 1928 को लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लेने के लिए लाहौर में जॉन पॉयान्ट्ज सांडर्स को गोली मारना आदि के कारण आजाद ब्रिटिश राज को बुरी तरह खटकने लगे। ब्रिटिश पुलिस ब्रिगेड उनके नाम से ही कांप जाती थी। अंग्रेजी पुलिस उन्हें जिन्दा या मुर्दा पकड़ना चाहती थी। आजाद ने प्रतिज्ञा की थी कि वह आजाद रहेंगे और जीते जी कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आयेंगे। उनका कहना था कि जब तक उनके हाथ ‘बमतुलबुकारा (पिस्टल) रहेगा तब तक कोई उन्हें जिन्दा नहीं पकड़ पायेगा।
27 फरवरी 1931 के दिन आजाद सुखदेव, वीरभद्र और पृथ्वीराज से अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद में मिलकर संस्था के कार्य को आगे बढ़ाना चाहते थे। रूस जाने की योजना बनानी थी। रूस में कामरेडों से मिलकर भारत में क्रान्ति को आगे बढ़ाने का कार्यक्रम तय करना था। उस समय वह इलाहाबाद के झूसी एरिया में रहते थे। वीरभद्र तिवारी पूर्ववर्ती संगठन का सदस्य था और पार्क में भी आजाद के साथ था। किन्तु पुलिस के आने से थोड़ी देर पूर्व ही वीरभद्र तिवारी किसी से मिलने जाने का बहाना बनाकर वहां से रफूचक्कर हो गया। तिवारी ने पैसे की लालच में पुलिस की मुखबिरी कर चन्द्रशेखर आजाद को धोखा दिया। चन्द्रशेखर के पार्क में आने के बाद पुलिस ने चारो तरफ से घेर लिया और गोलियां बरसानी शुरू कर दी। सुखदेव, पृथ्वीराज और आजाद घिर गए। सुपरिन्टेंडेंट ने चन्द्रशेखर को अपने दोनों हाथ ऊपर कर के बाहर आने को कहा। आजाद के पिस्टल से निकली गोली सुपरिन्टेंडेंट की बांह को चिरती हुई निकल गई और वह नीचे गिर पड़ा। फिर तो पुलिस ने अंधाधुंध फायरिंग शुरु कर दी। आजाद ने सुखदेव और पृथ्वीराज को कवर देकर बचने का रास्ता बनाया और उन्हें सुरक्षित निकल भागने को मजबूर किया। अकेले जुझते रहे और तीन पुलिस वालों को मार गिराया। एक गोली सनसनाती हुई आई और उनकी जाँघ में धंस गई। पैर बेकार हो गया। वह घायल हो गए किन्तु मुकाबला करते रहे। जब सारी गोलियां खत्म हो गई और बचने या भागने का कोई उपाय नहीं बचा तो अंतिम गोली उन्होंने अपनी कनपटी में उतार ली। जब तक जिया आजाद जिया और मरा तो आजाद मरा। कहते हैं कि बीस मिनट तक किसी पुलिस वाले की हिम्मत नहीं हुई कि उसके मश्त शरीर के पास जायें। सरदार भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव जैसे साहसी और धीर वीर क्रान्तिकारी तैयार करने वाले क्रान्ति गुरू चन्द्रशेखर आजाद भारत माता की गोद में सदा के लिए सो गये। अल्फ्रेड पार्क का वह प्राचीन पेड़ आज भी खड़ा है। आजाद की अचूक निशानेबाजी और अकेले अंग्रेजी फौज को धूल चटाने वाले वीर योद्धा की वीरता की कहानी मूक शब्दों में बयान करता है। वह चाहते तो खुद को बचा सकते थे। किन्तु नहीं, वे एक अच्छे साथी भी थे जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए सुखदेव और पृथ्वीराज की रक्षा की। हरेक हिन्दुस्तानी के दिल में त्याग और बलिदान का एक जज़्बा पैदा किया जो एक मिशाल है और युवा वर्ग के लिए अनुकरणीय भावमय संदेश है अपने लिए जिया तो क्या जिया! अपनो के लिए जियो और मातृभूमि की आन के लिए मरो। वह अंतिम गोली थी जो आजाद के पिस्टल से निकली और आजाद की कनपटी को विदीर्ण करती चली गई। उनकी मरते दम तक आजाद रहने की कसम पूरी हुई। चन्द्रशेखर पहले और अंतिम क्रांतिकारी हुए जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आजाद शामिल हुए और आजाद रहे। यह कतई पसंद नहीं था कि ललमुंहे अंग्रेज बन्दरों की रस्सी में एक क्रान्तिकारी जिंदादिल शेर बँधे और उनके इशारों पर नाचे। उनकी वह आवाज आज भी भारत की फिजाओं में गूंजती है-
“दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे!”
दस साल बाद 1941 में चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह के पदचिन्हों पर चलने वाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने ब्रिटिश राज की नींव हिला दी। आजाद उन तरुणों में से एक थे जो महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित थे और उसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिए किन्तु 1922 में चौरी-चौरा कांड जिसमें 22 पुलिस वाले आंदोलनकारियों द्वारा मारे गए, गांधी जी ने आंदोलन को विराम दे दिया था। देश के नवयुवक जालियांवाले कांड से बेहद क्षुब्ध थे और अंग्रेजों से बदला लेना चाहते थे। वे हिंसा को गलत नहीं मानते थे।
झांसी से 15 कि.मी. दूर सतार नदी के किनारे ओरछा के जंगल में उसने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियां शुरू की। हनुमान मंदिर के पास उसने एक कुटिया बनाई और उसमें पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से भेस बदल कर रहते रहे। वहीं उसने गोली चलाने का अभ्यास किया। वह बहुत अच्छे निशानेबाज हुए और संस्था के साथियों को गोली चलाना सिखाया। पास के गांव धीमरपुरा जो आज आजादपुरा है में बच्चों को पढ़ाने का काम करते रहे और काफी प्रतिष्ठा पाई। बुंदेलखण्ड मोटर गैरेज सदर बाजार से मोटर चलाना सीखा। सदाशिव राव मल्कापुरकर, विश्वनाथ वैशम्पायन, भगवानदास महुर आदि उनके समूह में शामिल हुए। कांग्रेस नेता पं० रघुनाथ विनायक धुलेकर और पं० सीताराम भास्कर भागवत आजाद के करीबी सहयोगी हुए। झांसी चन्द्रशेखर आजाद के लिए सर्व सुरक्षित जगह थी।
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना सचिन्द्रनाथ सान्याल ने 1923 में की गई थी। काकोरी ट्रेन रॉबरी के केश में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्लाह खान, ठाकुर रोशन सिंह और राजेन्द्र लाहिड़ी को फांसी दी गई। सुन्दरलाल गुप्ता और चन्द्रशेखर आजाद वहां से भाग निकले थे और भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू के साथ उन्होंने 1927 में ‘हिन्दुस्तान सोशियलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन’ की स्थापना की थी।
वर्षों के संघर्ष, हत्याओं और आत्मबलिदानों का सिलसिला, अंग्रेजों के छापे, आंदोलनकारियों का प्रदर्शन और अनगिनत कुर्बानियों के बाद आजादी मिली किन्तु चन्द्रशेखर आजाद ने जो राह दिखाई, उस पर चलने वाले गरम दल के आंदोलनकारियों ने दुश्मनों के भीतर जो खौफ पैदा की उससे उनकी रूहें कांपती थीं।

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