हिमांशु जयहिंद
बहुत लंबे समय से ‘लपूझन्ना’ मेरी पुस्तकों के रैक में पड़ी रही। इस मई माह की गर्मी में जब कहीं बाहर जाने का मन नहीं करता तब घर बैठकर खाली समय में उसे पढ़ने का अवसर मिला। इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मुझे इस बात का अफसोस रह गया, इसे पढ़ना मैं टालता क्यों रहा। संभवतः इसके लेखक अशोक पांडे से मैं उतना रूबरू नहीं था। उनकी ख्याति एक अच्छे अनुवादक की है। जैसे-जैसे उपन्यास के पन्नों से गुजरता गया, उसकी भाषा का रंग निखरता गया। इस उपन्यास के पात्र रामनगर की सड़क पर तेज कदम चलते, खेल के मैदान में खेलते और पिटाई में दोहरे होते दिखने लगे। आपातकाल की पृष्ठभूमि में रामनगर की चल रही जिंदगी में ऐसा कुछ भी नहीं दिखता जो उसके बिना भी घटित न हो रहा हो। हां, कर्मचारियों के अचानक हो जाने वाले ट्रांसफर ही इसका थोड़ा अहसास दिलाते हैं।
उपन्यास के पहले पन्ने पर रामनगर इस तरह दर्ज है: “घर के नजदीक ही एक मंदिर था। लाउडस्पीकर पर सुबह-शाम भजनों का एक घिसा हुआ रिकॉर्ड बजता। रिकॉर्ड की सुई चार या पांच जगह अटक जाती थी। ऐसा होने पर उसमें से ‘चचचचचच’ या ‘गगगगगग’ पर ठहरी हुई आवाज तब तक आती रहती जब तक कि कोई धर्मात्मा सुई को उठाकर आगे-पीछे न रख देता। सामने वाली खिड़की से बाईं तरफ देखने पर तीसेक मीटर दूर मस्जिद की चमकीली मीनार दिखाई देती जहां से दिन में पांच बार अजान आती थी। रामनगर आने से पहले मैं इन धार्मिक आवाजों से अनभिज्ञ था।” आज के उत्तराखंड के पहाड़ों से उतरते ही जिन मैदानी इलाकों में पैर पड़ते हैं उसमें रामनगर भी एक है।
इस छोटे से कस्बे में स्कूल, सरकारी ऑफिस, खेल का मैदान, सिनेमा हॉल, बाजार, बस स्टैंड और जिम कार्बेट पहुंचने का एक रास्ता है। इसमें मुहल्ले हैं जिसमें मुसलमान हैं जो पाकिस्तान और दुश्मन इलाके हैं और हिंदू बच्चे उधर जाने से डरते हैं। इसी मुसलमान मुहल्ले की मस्जिद से सटी पटरी पर मुसलमान बच्चे कुछ न कुछ बेचते रहते हैं। इसी पटरी पर एक बच्ची सकीना ‘खील’ बेच रही है। अशोक पांडे नाम का बच्चा उससे पूछता है- “कित्ते की है?” “तू हिंदू हैगा। तेरे लिए फिरी। उसने एक कुल्हड़ मेरी तरफ बढ़ाया और फुसफु साकर बोली, ‘सकीन हैगा मेरा नाम। सादी करेगा मुस्से?” बस, इस बच्चे को सकीना से प्यार हो जाता है। यह प्यार ही पूरे उपन्यास का मूल कथ्य है।
उपन्यास का नायक लफत्तू पढ़ने से छत्तीस का आंकड़ा बनाये रखता है। एकदम बौडम माना जाने वाला यह नायक अपने पिता और भाई से अधमरा हो जाने की हद तक भार खाता रहता है। लेकिन उसका हम उम्रों के साथ और अशोक पांडे के साथ जो प्यार है. और उसे पहले प्यार का जो अहसास है. उसे पेश करने की जो अदा है वही इस उपन्यास का सूत बन गया है जिसके ताने-बाने पर रामनगर बुना जाता है।
आमतौर पर हिंदी में उपन्यामों को आंचलिक कस्बाई जैसे शब्दों से श्रेणियां बनाने का रिवाज है। ये श्रेणियों किसी भी अच्छे उपन्यास को मार डालने के लिए सबसे अच्छे हथियार है। इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मुझे सबसे पहले इसी बात का डर लगा, इसे यदि ‘कस्बाई’ के धारदार हथियार पर चढ़ाया गया तो इससे बड़ा गुनाह कुछ नहीं होगा। ऐसा कोई भी उपन्यास नहीं हो सकता जो कोई विशिष्ट कच्य लेकर सामने नाहीं आता हो। ‘लपूझन्ना’ में इसकी विशिष्टता काफी गाढ़े रंग में अभिव्यक्त हुई है। इसकी भाषा, इसका भूगोल, यहां के खेल और यहां पलने वाली आकांक्षाएं इतनी सघन होकर सामने आती है जिसके ऊपर-ऊपर से गुजर जाना मुश्किल है। आपको कायपद्य, पुगत्तम और रत्तीपईयां यहां के बच्चों के साथ खेलना पड़ेगा। और, लफत्तू की भाषा को पढ़ना, समझना होगा।
यह उपन्यास रामनगर के बच्चों को जिस तरह की और जिस तरह से शिक्षित किया जा रहा था. उसका एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। शिक्षकों की छात्रों के प्रति बेरहमी और उनकी अपनी कल्पनाशीलता, सृजनशीलता को बच्चों की नजर से जिस तरह से कथा में ढाला गया है, वह शानदार है। इस दौर में रामनगर में अभिभावकों द्वारा अंग्रेजी के महत्व को समझने और अपने बच्चों को उस ओर ले जाने की बेचैनी को इस उपन्यास में पढ़ा जा सकता है।
इस उपन्यास के अंत में इसका पात्र अशोक पांडे जब नैनीताल से कोट, पैंट और टाई में रामनगर उत्तरता है और लफतू से खेल के मैदान में मिलने के लिए जाता है तब लफत्त उसकी टाई और कोट को अपने गंदे हो चुके नेकर, कमीज और चप्पल के ऊपर धारण करता है। इस शानदार दृश्य में रामनगर के प्यार के ऊपर अधबंधी टाई लहराती हुई दिख रही है। प्यार के इस सलोने, बेदाग प्यार को पढ़ते हुए एकबारगी इस बात की और ध्यान जाता है, आखिर यह कब तक चलेगा और बना रहेगा? रामनगर की किशोरावस्था जीवन में जब अगला कदम रखेगी, इस दृश्य का सारा अर्थ अपने विपरीत में बदलता जाएगा। एक त्रासदी जो आम जिंदगी में नियति की तरह बनी रहती है।
बच्चों की दुनिया से बड़ों की कथा कहना, आसान नहीं होता। इस संदर्भ में मुझे मन्नू भंडारी का कथा शिल्प याद आया। अशोक पांडे का कथा शिल्प उनसे काफी अलग है, निश्चित ही संदर्भ अलग है। बेकार मान लिए जाने वाले साइकल, टायरों के पहियों को रामनगर की गलियों में भगाते हुए चलाना, इतना आसान नहीं है। आज के समय में तो और भी मुश्किल। सच् तो यही है कि यह विधा लोग या तो भूल गये हैं या भुला दिये गये हैं।
मेरे यहां के लोहार पुराने पड़ गये लोहे को ठोंक-पीटकर गोल ‘डगरौना’ में बदल देते थे। उन्हें लकड़ी के डंडे के सहारे भगाते हुए चलना न सिर्फ संतुलन भरा चाल बढ़ा देता था. बाद के समय में फुटबाल खेलने की खूबी भी दे देता था। अशोक पांडे इस खेल को उपन्यास में कस्बाई और शहराती जीवन के बीच रखकर इसकी खूबसूरती को नया रंग ही दे दिया है।
अशोक पाण्डे का उपन्यास ‘लपूझन्ना’ हिंदी उपन्यास रचना में एक शानदार उपलब्धि है। यह पढ़ने से छूट गये उन अध्यायों की ओर ले जाती है जिसे हम यूं ही सहज मान लेते हैं लेकिन मन में गहरे पैठकर बने रहते हैं। यह उपन्यास मन के उस गहरे पैठ में पहुंचता है और खुलद को पढ़ने की ओर ले जाता है। इसलिए, इस उपन्यास को जरूर पढ़िए।
