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पर्यावरण (कविता)

गौरी तिवारी

ममता के दामन में
धरा ने हमें समाया है
पेड़ पौधों और जल के सागर से
हमारा ये जीवन सजाया है।

ये ऋण है हमारी धरा का
जो हमे चुकाना है
स्वच्छ,शीतल वायु हेतु
हमें पर्यावरण को बचाना है।

नभ की नीलिमा की छाँव तले
सरिता मधुगान सुनाती है,
पुष्पों की परिमल सदा
मन में उत्साह जगाती है
पवन की मंदित वीणा को
विष का धुआं न बनने देना है,
स्वच्छ, शीतल वायु हेतु
हमें पर्यावरण को बचाना है।

जब-जब मानव भूल गया
प्रकृति का पावन उपकार यहाँ
तब-तब आँधी, सूखा, बाढ़ ने
दिया विनाश का उपहार यहाँ
अब लालच की अंधी दौड़ को
हम सबको दूर भगाना है
स्वच्छ, शीतल वायु हेतु
हमें पर्यावरण को बचाना है।

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