Breaking News :

nothing found

कस-बल ढीले पड़े तो साथ आये चीन और अमेरिका

वैश्विक चुनौतियों के मद्देनजर भारत को चाहिए नई तरकीब

अनिल तिवारी
————

कूटनीति में जब बात की तासीर बदलने लगे तो माना जाता है कि परदे के पीछे कोई नया जाल बुना जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति चिनफिंग की हालिया मुलाकात के बाद मीडिया में छपी तस्वीरों में जो बनावटी मुस्कान दिख रही है वह सबूत है की राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं होता,न तो नफरत और ना ही प्रेम। यहां केवल सत्ता संघर्ष ही सर्व प्रमुख होता है। कुछ दिन पहले तक चीन को सबक सिखाने, 100% तक टैरिफ लगाने और क्या-क्या अन्य आरोप लगाने वाले ट्रंप के बोल बदल गए और साझा समृद्धि की दुहाई देने लगे। वहीं दूसरी तरफ महामारी करोना को चीनी वायरस कहे जाने का दंश झेल चुके चिनफिंग ने ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के नारे पर कदमताल करने की रजामंदी दी है।

राजनीति में खासकर विश्व राजनीति में हृदय परिवर्तन के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। लेकिन ताइवान के मुद्दे पर क्या चीन और अमेरिका की तनातनी, एक दूसरे को देख लेने की धमकी के बीच अचानक बदले सुर के निहितार्थों को तलाशने के लिए हमें खाड़ी युद्ध से उपजे हालातो को ठीक से डिकोड करना होगा। इसराइल और ईरान के मध्य छिड़े युद्ध में जब अमेरिका कूदा तो उसे यह उम्मीद थी कि जिस तरह पलक झपकते वेनेजुएला का मामला फतह कर लिया कुछ उसी अंदाज में एक दो हफ्ते में सीमित सैन्य अभियान चलाकर बाजी मार लेगा। लेकिन वहां दाग उल्टा पड़ गया। जैसे-जैसे समय बीता, अमेरिका की बेचैनी बढ़ती जा रही है।

हम सभी जानते हैं कि अमेरिकी जनता सबसे पहले अपने खुद का हित चाहती है। जिस तरह वहां की सरकार, अमेरिका फर्स्ट का नारा लगती हैं इसी तरह वहां की आबादी, “सारी सुख सुविधाएं पहले मुझे” का गीत गाने की शौकीन रही है। इतिहास में जब कभी उनके उपभोग में कोई कमी आई उन्होंने सब कुछ सर पर उठा लिया। पेट्रोल की कीमत अमेरिका में भी बढ़ रही है। महंगाई से वहां की जनता भी उतना ही त्रस्त है जितना दुनिया के अन्य हिस्सों में। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव भी जल्दी ही होना है। ट्रंप सरकार को यह डर है कि अगर समय रहते अमेरिकी जनता को अपेक्षित सुख सुविधाएं सहनीय स्थिति में नहीं उपलब्ध कराई गई तो इसका मतदान में उल्टा असर हो सकता है। अमेरिका आज दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार देश है। अमेरिका पर आज लगभग 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज है। ऐसे में अगर ट्रंप ईरान का मसला जल्द से जल्द नहीं सुलझाते हैं तो उनका कद राजनीतिक रूप से बौना हो जाने का डर है।

दूसरी तरफ चीन भी हतप्रभ और निरुपाय खड़ा है। अमेरिका ने जब वेनेजुएला को कब्जा कर लिया तब चीन किनारे खड़ा होकर तमाशा देखता रहा। ईरान युद्ध के शुरू होने के बाद चीन का पत्ता लगभग खाड़ी देशों से भी साफ हो गया है। ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने के कारण महंगाई बढ़ी है और उत्पादन लागत 25 प्रतिशत से अधिक बढ़ गई है। चीन में युवा बेरोजगारी इस समय शीर्ष पर है। विदेशी पूंजी के पलायन से रियल एस्टेट क्षेत्र भी नकारात्मक हो गया है। चीन की स्थानीय सरकारों ने विकास की होड़ में अत्यधिक कर्ज लिया लेकिन आज उसे पूंजी से कोई कमाई नहीं हो रही है। चीन के कई एक शहरों में सरकारी कर्मचारियों को भी लंबे समय से वेतन नहीं मिल पा रहा है।

खाड़ी युद्ध के कारण चीन और अमेरिका दोनों के कस-बल ढीले हो रहे हैं। दोनों की अकड़ सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी समस्या को देखकर न सिर्फ ढीली हुई है बल्कि गलबहियां करने को भी प्रेरित किया है। यह मधुर मिलन दो ताकतवर देशों का नहीं बल्कि दो जख्मी दरोगाओं का एक दूसरे को सहलाने संभालने के लिए गिर कर समझौता करने का मौका भी है।

मालूम हो कि आज अमेरिका और चीन दोनों मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लगभग 44% हिस्से को प्रभावित करते हैं। विश्व व्यापार, तकनीकी विकास, उर्जा बाजार, वैश्विक निवेश, वित्तीय संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक निर्णय पर इन दोनों देशों का प्रभाव है। विश्व अर्थव्यवस्था के संदर्भ में देखें तो अमेरिका और चीन के बीच तनाव कम होने से सबसे पहले वैश्विक बाजारों को राहत मिलेगी। इससे महंगाई पर भी नियंत्रण संभव हो सकेगा। लेकिन यह एक पक्ष है इसका दूसरा पक्ष यह है कि यदि दोनों महाशक्तियां वैश्विक व्यापारिक नियमों और आर्थिक नीतियों को अपने हितों के अनुसार तय करने लगे तो छोटा देशों की आर्थिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विश्व धीरे-धीरे दो महा शक्तियों के प्रभाव वाले ढांचे की ओर बढ़ सकता है। अगर ऐसा होता है तो भारत जैसे देशों के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि भारत हमेशा सामूहिक वैश्विक नेतृत्व का समर्थक रहा है।

एक अच्छी स्थिति यह है कि भारत ना तो अमेरिका खेमे में में है और न हीं चीन के प्रभाव क्षेत्र में। भारत में रणनीतिक स्वायत्तता की नीति रही है। क्वॉड और ब्रिक्स जैसे मंच पर भारत की सक्रिय भूमिका है। भारत चीन का पड़ोसी देश है और दोनों देशों के बीच सीमा विवाद हैं साथ ही व्यापारिक संबंध भी है। यही कारण है कि अमेरिका और चीन की बढ़ती निकटता भारत के लिए केवल बाहरी घटना नहीं बल्कि रणनीतिक मूल्यांकन का भी विषय है। भारत की शक्ति उसकी युवा आबादी लोकतंत्र और डिजिटल क्षमता में निहित है जबकि चीन विनिर्माण, निर्यात और पूंजी निवेश में आगे है। भारत ने चीन प्लस वन की नीति को एक अवसर के रूप में देखा है। अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन के विकल्प के रूप में भारत की ओर बढ़ने का संकेत भी दिया है।

बहरहाल दुनिया के दो दारोगाओं की इस हालिया मुलाकात के बाद आशंका व्यक्त की जा रही है कि अमेरिका और चीन मिलकर दुनिया को अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में बांटने का प्रयास कर सकते हैं। तो क्या दुनिया एक बार फिर घूम फिर कर उस बिंदु पर पहुंचने की ओर अग्रसर है जब विश्व राजनीति को महाशक्तियां अपनी उंगलियों पर नचाती थी? हालांकि प्रश्न का मुकम्मल उत्तर तो भविष्य के गर्भ में छिपा है लेकिन भारत जिस तरह से यूरोपीय संघ अफ्रीकी देश आसियान देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है, इससे एक अच्छा संकेत मिलता है। भारत को बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के लिहाज से अपने संकल्पों को मजबूत करना होगा तथा नए मानक गढते हुए क्षमता को विस्तार देना होगा। क्योंकि सवाल यह नहीं कि अमेरिका और चीन क्या करेंगे? प्रश्न यह है कि भारत कैसे निपटेगा। इसका सीधा जवाब यही है कि “बिल्ली के भाग्य से सीकहर (दही दूध रखने का पात्र) टूटेगा” यानी चाईना प्लस वन नीति के तहत भारत एक दिन वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनेगा के ख्वाब जाल से बाहर निकाल कर भारत को विश्व हालात के मद्देनजर अपनी नीतियों को पुनरसमायोजित करना चाहिए।

Read Previous

‘लपूझन्ना’: अंधेरे दौर में चमकते सितारों की कथा

Read Next

आगा खान महल के बहाने हिंदी की बातें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Most Popular