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आगा खान महल के बहाने हिंदी की बातें

गौरी तिवारी
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आज मुझे अपनी बड़ी बुआ (शोभा तिवारी) के साथ आगाखान महल देखने का अवसर प्राप्त हुआ। मूला नदी के किनारे स्थित पुणे के कल्याणी नगर-यरवड़ा क्षेत्र में सुल्तान मुहम्मद शाह आगाखान तृतीय द्वारा 1892 में बनवाया गया यह महल गांधी जी, उनकी पत्नी कस्तूरबा तथा सचिव महादेव भाई देसाई की नजरबंदी के कारण चर्चा के केंद्र में आया था। मालूम हो कि आगाखान स्वयं भी राजनीति और खेल जगत में एक विख्यात नाम थे। आजादी के बाद वर्ष 1969 में आगाखान चतुर्थ ने गांधी जी और उनके दर्शन के प्रति सम्मान के रूप में इस महल को भारत सरकार को दान कर दिया। आगे चलकर वर्ष 2003 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसे स्मारक की मान्यता प्रदान की। स्थापत्य की दृष्टि से यह महल एक रोचक इमारत है जिसमें विभिन्न शैलियों का अद्भुत मिश्रण है। विशाल मैदान के बीच मेहराब बने हैं, महल के परिचरों के रहने के लिए हवादार व्यवस्था है। वर्तमान में गांधी स्मारक समिति द्वारा इसकी देख-रेख की जाती है। मूल महल तथा समाधि स्थल के बीच एक विक्रय केंद्र है जहां खादी वस्त्रों के साथ-साथ गांधी साहित्य भी उपलब्ध है। आम शहरी के लिए मात्र 20 रुपये के शुल्क पर भीड़भाड़ और कोलाहल से अलग यह एक शांति प्रिय स्वच्छ जगह है, यहां आकर मन को सुकून मिलता है साथ ही गांधी के बारे में विशद जानकारी प्राप्त होती है।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 9 अगस्त 1942 से 6 मई 1944 तक गांधी जी अपनी पत्नी और सचिव के साथ यहीं पर कैद थे। उल्लेखनीय है कि कस्तूरबा गांधी तथा महादेव भाई देसाई की मृत्यु इसी महल में कैद के दौरान हुई थी। उनकी समाधियां महल परिसर में ही स्थित है। यह महल गांधी जी के जीवन और विचार का एक सरल स्मारक है।
तीन मंज़िले महल के प्रथम तल पर आठ गैलरियां बनी हैं जिनमें गांधी जी के निजी जीवन से लेकर राजनैतिक कार्यकलापों की संक्षिप्त जानकारी उपलब्ध है जो दर्शनार्थियों को न सिर्फ आकर्षित करती है बल्कि भविष्य के लिए प्रेरणा भी देती है। गैलरी नंबर चार के दाहिनी दीवार पर भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश वायसराय को भेजे गये एक पत्र का मजमून अंकित है जो कि हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में है। गांधी साहित्य से हमें यह पता चलता है कि गांधी जी विदेशी भाषा की जगह भारत की अपनी भाषा को अधिक तवज्जो देते थे। गांधी जी के जीवन के ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब वे भाषा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जताते हैं। अनेक मौकों पर वे कहते हैं कि अनुवाद भाषा का विकल्प नहीं है। उनका स्पष्ट कहना था “हम मूल भाषा में जो बात कहते हैं, हूबहू वह भाव अन्य भाषा में आ ही नहीं सकता”।
भाषा से संबंधित एक वाकया देश की आजादी से महज चार महीने पहले का है। “आगा खान महल में गांधी के 21 महीने”नामक किताब की लेखिका तथा गांधी जी के अत्यंत करीब रही डॉक्टर सुशीला नैयर की डायरी के अनुसार जब महात्मा गांधी ने नई दिल्ली में एक प्रार्थना सभा के दौरान अंग्रेजी के पत्रकारों को ‘बेचारा’ कहा था और उनके भाषा कौशल पर सवाल उठाया था।
गांधी जी हर रोज की तरह प्रार्थना सभा को संबोधित करने पहुंचे थे। कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे थे, जिन पर उन्हें उस दिन बोलना था। गांधीजी चाहते थे कि वह जो बोलें, अखबार वाले उसे उसी रूप में छापें। लेकिन दिक्कत यह थी कि गांधीजी हिंदुस्तानी में बोलते थे और अंग्रेजी के अखबार उसका अनुवाद करते थे। गांधीजी की बोली गई बात और अंग्रेजी के अखबारों में प्रकाशित उसके अनुवाद में काफी अंतर होता था। यह उन्हें स्वीकार नहीं था। 29 मई, 1947 की प्रार्थना सभा में वे अपना भाषण खुद से अंग्रेजी में लिख कर लाए थे। क्योंकि दो जून को लार्ड माउंटबेटन की तरफ से महत्वपूर्ण घोषणा होने वाली थी और उसके बारे में देशवासियों को कुछ महत्वपूर्ण बातें बतानी थी। इसलिए गांधीजी चाहते थे कि अंग्रेजी के अखबार कम से कम आज की उनकी बात सही-सही छाप दें और अनुवाद की गलती न करें। हालांकि, प्रार्थना सभा में गांधी जी ने उस दिन भी हिंदुस्तानी में ही भाषण दिया।
गांधीजी ने अपना भाषण शुरू किया, ‘आज के और दो जून के बीच थोड़े ही दिन रह गए हैं। मैं इस बात की कोई चिंता नहीं करता कि दो जून को क्या होने बाला है या माउंटबेटन साहब आकर क्या सुनाएंगे।’
गांधी ने कहा, ‘अब जो मैं सुनाना चाहता हूं, उस बात पर आ जाऊं, आज मैंने थोड़ा कष्ट किया है। मेरे पास इतना समय कहां कि रोज में अपने भाषण को अंग्रेजी में लिखकर दिया करूं और हमारे अखबार जो अंग्रेजी में चलते हैं, उन्हें तो मेरा भाषण छापने को चाहिए ही। परंतु हमारे अखबारों के संवाददाता उसे अंग्रेजी में किस प्रकार दें, वे बेचारे अंग्रेजी पूरी तरह कहां समझ पाते हैं? वैसे तो वे लोग बीए, एमए होते हैं, लेकिन इतनी अंग्रेजी नहीं जानते कि मैं जो हिंदुस्तानी में कहता हूं उसका सही मतलब अंग्रेजी में समझा सकें, क्योंकि वह भाषा उनकी नहीं है, दूसरों की है’। गांधीजी ने आगे कहा, ‘यहां तो मैं हिंदुस्तानी में कहूंगा, क्योंकि वह तो करीब-करीब मेरी भी और सबकी पूरी तौर से मातृभाषा है। इसीलिए उसमें मैं जो कुछ कहूंगा वह आप सही-सही समझ सकते हैं। यह सुशीला मेरे भाषण को अंग्रेजी में कर तो लेती हैं, क्योंकि वह खासी अंग्रेजी जानती हैं, फिर भी उसमें कमी रह जाती है। इसीलिए आज मैंने थोड़ा समय निकालकर अंग्रेजी में लिख रखा है। यहां मैं उसकी बात को ध्यान में रखते हुए बात कहूंगा। परंतु अखबारों में वही छपेगा, जो मैंने लिख रखा है।’
गांधी अपनी भाषा और अपनी जुबान के समर्थक थे. उनका मानना था कि जो बात जिस भाषा में मूल रूप में कही गई है और जिसमें वह रची-बसी है, उसी में उसका सही अर्थ समझा जा सकता है. उन्होंने कहा, ‘सही बात यह है कि जो चीज जिस भाषा में कही गई, उसी भाषा में उसक माधुर्य होता है। बिशपों ने अंग्रेजी ‘बाइबिल’ की भाषा को बहुत परिश्रम से मधुर बनाया है और वह लैटिन से भी अंग्रेजी में किस तरह मीठी हो गई हैं! अंग्रेजी सीखना चाहने वाले को ‘बाइबिल’ तो सीखनी ही चाहिए,’ गांधी हालांकि किसी भाषा के विरोधी नहीं थे, अंग्रेजी के भी नहीं, अंग्रेजी बोलने और लिखने वालों के भी नहीं, बल्कि वह हर भाषा का समान रूप से सम्मान करते थे। इसलिए वह भाषा के अधकचरे ज्ञान के खिलाफ थे, क्योंकि अधकचरे ज्ञान से भाषा और उसके कथ्य को नुकसान पहुंचने का खतरा वह मानते थे। जैसा कि उन्होंने कहा, ‘मैं अंग्रेजी भाषा का द्वेषी नहीं, लेकिन उसका माधुर्य छोड़ने को तैयार नहीं। क्यों हमारे पास ऐसे कवि नहीं हैं जो वैसी ही मधुरता से उनका अनुवाद कर सकें.’
महात्मा गांधी अंग्रेजी भाषा के अच्छे जानकार थे, उन्होंने विदेश में पढ़ाई की थी, लेकिन वह अपनी भाषा, मातृभाषा के समर्थक थे। वह मानते थे कि कोई भी बात अपनी भाषा में जितने अच्छे तरीके से कही जा सकती हैं, दूसरी भाषा में नहीं। भारत में अंग्रेजी जानने वालों के साथ यही दिक्कत थी। गांधी को यह पसंद नहीं था, गांधी भाषा के संदर्भ में ‘हिंदी’ के बदले ‘हिंदुस्तानी’ शब्द का इस्तेमाल करते थे। हिंदुस्तानी को ही वह मातृभाषा मानते थे, भारत की भाषा मानते थे, गांधी की हिंदुस्तानी में भारत में बोली जाने वाली सभी भाषाएं और बोलियां शामिल थीं। वह इसी भाषा के समर्थक थे।

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