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कॉकरोच जनता पार्टी के ऐलान से सरकार के कान खड़े

भई गति सांप छछूंदर केरी

 

अनिल तिवारी

कमोबेश ‘डिलेमा एक्शन थ्योरी’ के आईने में आभासी मंच पर गठित कॉकरोच जनता पार्टी (जिसके दो करोड़ से अधिक फॉलोअर हो चुके हैं) के मुखिया संस्थापक ने परीक्षाओं में धांधली के खिलाफ आगामी 6 जून को दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर देश के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगने का ऐलान किया है। सोशल मीडिया पर यह मुद्दा छाया हुआ है। इस आंदोलन के निहितार्थों की तलाशा में कुछ कांस्परेसी थ्योरी भी समानांतर रूप से चल रही है। इसके भाव-प्रभाव को लेकर सभी विपक्षी दल जहां दुविधा में हैं, वहीं केंद्र की सरकार सहमी हुई है। आंदोलन प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए गृह मंत्रालय में ताबड़तोड़ बैठकों का दौर जारी है। कॉकरोच पार्टी का ट्विटर हैंडल बंद कर दिया गया है। अन्य तरह की पाबंदियां लगाने पर भी विचार मंथन चल रहा है। सरकार के जिम्मेवार लोग ऊपर ऊपर इसे हवा हवाई बता रहे हैं, लेकिन अंदरखाने भयभीत भी हैं। सच पूछिए तो इस आंदोलन को लेकर सरकार की स्थिति ‘भई गति सांप छछूंदर केरी’ वाली है जिसे न तो उगला जा सकता है न तो निगला जा सकता है। सरकार के संतुलनकारों को यह मालूम है कि अगर आंदोलन को छूट दी जाती है तो सरकार के कमजोर होने का संदेश जा सकता है और अगर बलपूर्वक रोकने की कोशिश की जाती है तो लोग इसे फूहड़ कार्रवाई की संज्ञा देंगे। आम जनता भड़क सकती है।
मालूम हो कि देश में हाल में हुए चुनावों के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम काटे जाने से जन मन में असंतोष फैला है। इस बीच नीट सहित अन्य परीक्षाओं के पेपर लीक होने से युवाओं में और अधिक रोष बढ़ गया। पिछले दिनों माननीय उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा देश के युवाओं को लेकर की गई टिप्पणी ने आग में घी का काम किया। माननीय अदालत ने नकारात्मक रूप से युवाओं को जब कॉकरोच कहा तो इस वर्ग को अच्छा नहीं लगा। महाराष्ट्र (संभाजी नगर) के मूल निवासी तथा वर्तमान में अमेरिका में रह रहे अभिजीत दीपके ने युवाओं की व्यथा को एक सामूहिक मंच प्रदान किया। न्यायाधीश महोदय की नकारात्मक टिप्पणी को सकारात्मक रूप से माथे का मुकुट बनाते हुए कॉकरोच नाम को आगे कर कॉकरोच जनता पार्टी का निर्माण किया। यह प्रयास युवा वर्ग को खूब भाया। पलक झपकते ही आभासी मंच पर इसके दो करोड़ से अधिक फॉलोअर्स हो गए। हालांकि माननीय अदालत ने अपनी टिप्पणी को लेकर सफाई दी लेकिन तीर निकल चुका था।
अब कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत ने भारत आने तथा लोकतांत्रिक तरीके से जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन कर केंद्रीय शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र मांगने का ऐलान किया है। मांग के समर्थन में उनके कार्यकर्ताओं द्वारा हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है। बताते हैं कि लगभग 12 लाख लोगों ने हस्ताक्षर भेज दिया है। अपने वीडियो संदेश में उन्होंने यह आशंका व्यक्त की है कि भारत आने पर सरकार उन्हें गिरफ्तार करवा सकती है, लेकिन कॉकरोच कार्यकर्ता आंदोलन को आगे बढ़ाएंगे। दावा किया जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस, लद्दाख के नेता सोनम वांगचुक सहित अन्य कई संगठनों ने समर्थन दिया है।
इस आंदोलन को लेकर राजनीतिक दलों के विचार अलग-अलग हैं। चूंकि आंदोलन के प्रणेता अभिजीत पूर्व में आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं, इसलिए प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस बेहद चौकन्ना है। अन्ना आंदोलन से गच्चा खा चुकी पार्टी जल्दी बाजी में कोई गलती करने के बजाय छाछ भी फूंक-फूंक कर पीने को तवज्जो दे रही है। इसीलिए जल्दीबाजी में अपने पत्ते खोलने से बच रही है। क्षेत्रीय पार्टियां तेल के धार के हिसाब से पहले भी निर्णय लेती रही हैं, इस मोर्चे पर भी उन पार्टियों के नेता सधी हुई प्रतिक्रिया दे रहे हैं। अलबत्ता यत्र-तत्र बिखरे जन संगठन आंदोलन में सुर मिलाने और शिरकत करने की तैयारी जरूर कर रहे हैं।
देश की सत्ता पर लंबे समय से काबिज भारतीय जनता पार्टी के नेता और कार्यकर्ता इसे हवा हवाई बता रहे हैं। संगठन के एक जिम्मेदार पदाधिकारी ने बातचीत में कहा कि क्षणिक बुलबुले है, अपने आप फूट जायेंगे। पार्टी का कहना है कि आभासी मंच पर जो बढ़-चढ़कर दिखाई बताया जा रहा है जमीन पर उसकी मौजूदगी शून्य है। कॉकरोच जनता पार्टी बिना वैचारिकी के मैदान में एक दिन भी नहीं टिक सकेगी। तेजोमय भारतीय तरुणाई की तुलना बांग्लादेश ,श्रीलंका और नेपाल जैसे देश के जेन-जी से नहीं की जा सकती।
लेकिन सरकार कॉकरोच दल के ऐलान से स्तब्ध है। सरकार के स्तर पर नियंत्रण के लिए हर संभव कोशिश की जा रही है। सरकार भी मान रही है की परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर युवाओं में आक्रोश है। सरकार डैमेज कंट्रोल करने की दिशा में भी लगातार प्रयास कर रही है। सीबीएसई के बड़े पदाधिकारियों को पदों से हटाना, परीक्षार्थियों को मनवांछित परीक्षा केंद्र आवंटित करना, परीक्षा के लिए दोबारा फीस नहीं लेना जैसे कई अहम फैसले लिए गए हैं।
बहरहाल सभी की नजर 6 जून पर लगी है। कॉकरोच जनता पार्टी लोकतांत्रिक तरीके से सरकार की नीतियों का विरोध कर कोई वैकल्पिक ढांचा खड़ा करने में कामयाब होती है या यह एक दिन का जलसा साबित होकर रह जाने वाला है? क्या देश की प्रमुख विपक्षी पार्टियां इस आंदोलन को अपना समर्थन देगी, अथवा ‘इनका उनका’ आंदोलन बताकर खुद तमाशबीन बनी रहेगी? क्या कॉकरोच जनता पार्टी सत्ता विरोधी दलों को एक मंच पर लाने की कोई पहल करेगी? देखने लायक यह भी होगा कि सरकार इस मसले से कैसे दो-चार होती है? डैमेज कंट्रोल में जुटी केंद्र की सरकार क्या शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र लेकर विरोध की आंच को कम करेगी?
ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तर हालांकि आने वाले दिनों में मिलेंगे, लेकिन हर आदमी के मन में एक कौतूहल बना हुआ है कि बिना किसी ठोस वैचारिकी के सरकार के खिलाफ इतना बड़ा संगठन कैसे निर्मित हो गया?
मालूम हो कि इस तरह का जुटान कोई नई परिकल्पना नहीं है। राजनीति शास्त्र में वर्णित ‘डिलेमा एक्शन’ पहले भी बहुत बार परखा और आजमाया गया है। मुख्य रूप से यह अहिंसक प्रतिरोध या सविनय अवज्ञा की रणनीति का ही हिस्सा होता है। इसके तहत प्रदर्शनकारी पीड़ित लोगों का संगठन बनाकर ऐसे कदम उठाते हैं जिसमें सत्ताधारियों के पास केवल दो ही विकल्प होते हैं या तो वह उनकी मांगे मान ले अथवा बलपूर्वक उनका दमन करें। महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों ही स्थितियों में नुकसान सत्ताधारी दल को ही उठाना पड़ता है।
कुछ साल पहले सर्बिया के एक गैर सरकारी संगठन सेंटर फॉर अप्लाइड नान वायलेंट एक्शन एंड स्ट्रैटेजीज के आह्वान पर वहां के लोगों ने बड़ा विरोध प्रदर्शन किया था। प्रदर्शन के दौरान संगठन के लोगों ने बीच चौक पर एक खाली ड्रम रखा था तथा सबको कहा गया कि सभी लोग ड्रम में एक रुपया डालेंगे और डंडे से दो बार ड्रम को पीटेंगे। यह कई दिनों तक चलता रहा। वहां की पुलिस दूर खड़ी होकर तमाशा देखती रही। जब शोरगुल बढ़ने लगा, तो एक दिन पुलिस वह ड्रम उठा कर ले गई। ड्रम उठा कर ले जाती पुलिस का फोटो दुनिया भर में वायरल हुआ था। इसी तरह तुर्की में स्टैंडिंग विरोध प्रदर्शन के लिए भारी तादाद में लोग जुड़े थे। युगांडा का वॉक टू वर्क विरोध भी दुनिया भर में सुर्खियां बटोरा था। पश्चिम एशिया का अरब स्प्रिंग आंदोलन भी इसी तर्ज पर था।
इस तरह के आंदोलन से यदा कदा वैकल्पिक राहें तैयार हुई हैं, लेकिन अधिकांशतः आंधी की तरह आया और तूफान की तरह चला गया वाला मामला ही रहा है। भारत के विभिन्न वर्गों में भिन्न-भिन्न मुद्दों को लेकर रोष है, लेकिन अभी एकता का अभाव है। अगर परीक्षा को ही देखें तो नीट पेपर आउट होने पर केवल नीट के विद्यार्थी ही प्रदर्शन करते हैं, सीबीएसई की धांधली के खिलाफ इसी वर्ग के लोग आगे आते हैं, उत्तर प्रदेश में दरोगा पर्चा लीक मामले में अन्य वर्गों का साथ नहीं मिला था। पीजीटी, टीजीटी शिक्षामित्र आदि अपनी लड़ाई खुद लड़ रहे हैं। ठीक उसी तरह जैसे किसान के मसले पर कामगार शामिल नहीं होते, छात्रों के मसले पर वकील आगे नहीं आते, वकीलों के असंतोष से डॉक्टर अपना सुर नहीं मिलाते आदि आदि। ऐसे में अगर कॉकरोच जनता पार्टी सबको एक मंच पर लाने में कामयाब होती है तो निश्चित रूप से भारत में डिलेमा एक्शन थ्योरी बदलाव की एक नई इबारत लिख सकती है।

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