अनिल तिवारी
राम नाम की लूट के लिए भारी-भरकम बजट से संवारे सजाए जा रहे अयोध्या मंदिर में राम के नाम पर लूट किए जाने की दुखद खबरें इन दिनों सुर्खियों में है। उत्तर प्रदेश सरकार मामले की बिना कोई प्राथमिकी दर्ज किये लुटेरों को धर-दबोचने के लिए विशेष जांच दस्ता (एसआईटी) का गठन किया है। मुख्यमंत्री ने जब से यह ऐलान किया है कि अपराधियों को बख्शा नहीं जाएगा, जांच दल धुएं के सहारे अपराध की आग तक पहुंचने की सरकारी नौटंकी कर रहा है। क्योंकि जांच दल को पता है कि उसे जिस आग को पकड़ने का जिम्मा दिया गया है, उस पर हाथ रखते ही उसके खुद के झुलसने की संभावना बराबर है। चूंकि मामला बड़ा है, इसलिए इसमें बड़े-बड़ों की संलिप्तता की आशंका है। वर्षों से मंदिर के चढ़ावे की देखरेख मे लगे चंपत राय, गोपाल राव, अनिल मिश्र आदि पदाधिकारियों की जड़े बहुत दूर-दूर तक पसरी हुई हैं। चंपत राय सरीखे पदाधिकारीगण जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पवित्र संस्कारों से संस्कारित हैं, उन्हें चढ़ावा चोरी जैसे अपवित्र आचरण के लिए दोषी ठहराना न सिर्फ कठिन है बल्कि आज की तारीख में राष्ट्रद्रोह जैसा भी हो सकता है। इसीलिए हर दिन मामले को लेकर नए-नए नैरेटिव गढ़े जा रहे हैं।
मामले में जो कुछ भी ब्लैक एंड व्हाइट दिख रहा है वह यह कि एसआईटी संदिग्ध लोगों से लगातार पूछताछ कर रही है। मंदिर ट्रस्ट से जुड़े पदाधिकारी को अयोध्या न छोड़ने की हिदायत दी गई है। ड्राइवर टीनू यादव के ठिकानों सहित कई स्थान से भारी रकम की बरामदगी उजागर हुई है। चोरी की घटना के उजागर होने के बाद से राम मंदिर में आने वालों की संख्या में कमी आई है वही चढ़ावे की रकम में 72% की गिरावट दर्ज की गई है। पहले जहां प्रतिदिन 18 से लेकर 25 लख रुपए तक चढ़ावे में आता था अब वह घटकर 5 लाख के नीचे आ गया है।
देश के विपक्षी दल लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ का आरोप लगाते हुए स्वच्छ और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। सरकार के संतुलनकर ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’ के लिए अलग-अलग ढंग से कवायद कर रहे हैं। सरकारी पक्ष की और से यह भी कहा जा रहा है कि जिन लोगों को अवसर नहीं मिला वो षड्यंत्र कर रहे हैं।
आरंभिक चरणों में अयोध्या राम मंदिर आंदोलन के हीरो रहे बजरंग दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय कटियार चोरी का आरोप लगा रहे हैं। मंदिर आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने वाले पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह अपने मुंह पर ताला डाले हुए हैं। उनका कहना है कि अगर वह मुंह खोलेंगे तो बड़े लोग उनका बड़ा नुकसान कर सकते हैं। अयोध्या के स्थाई साधु संत करोड़ों की बंदर-बांट से हतप्रभ हैं। अपनी गाढ़ी कमाई का कुछ हिस्सा अपने आराध्य श्री राम को देने वाली भोली भाली जनता ठगी सी है, और हर जम्हाई के साथ ऊपर आसमान की ओर देखकर पूछ रही है कि ‘हे भगवान, आपकी अयोध्या में, मंदिर के अंत:पुर में यह क्या हो रहा है? मर्यादा पुरुषोत्तम राम के अयोध्या की मर्यादा को तार तार करने वाले आखिर कौन हैं?
भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं,भाषाई विविधता या सांस्कृतिक विरासत से नहीं होती,बल्कि उसकी गहरी धार्मिक चेतना और आस्था से भी होती है। यहां मंदिर केवल पूजा- अर्चना के स्थल नहीं हैं,बल्कि समाज की भावनाओं,विश्वासों और सांस्कृतिक निरंतरता के केंद्र भी हैं। करोड़ों लोग अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए मंदिरों में दान,दक्षिणा,चढ़ावा और सेवा अर्पित करते हैं।यह दान केवल आर्थिक लेन-देन नहीं होता,बल्कि भक्त और भगवान के बीच विश्वास का एक आध्यात्मिक सेतु होता है। यही कारण है कि जब किसी धार्मिक संस्था,ट्रस्ट या मंदिर के प्रबंधन को लेकर प्रश्न उठते हैं,तब मामला केवल प्रशासनिक या आर्थिक नहीं रह जाता,बल्कि सीधे- सीधे आस्था,विश्वास और जवाबदेही से जुड़ जाता है।
भारतीय लोकमन एक कहावत है “राम-राम जपना,चढ़ावे का माल अपना।” यह कहावत किसी धर्म, देवता या आस्था का उपहास नहीं करती,बल्कि उन प्रवृत्तियों पर व्यंग्य करती है जो धर्म और नैतिकता की बात तो करती हैं, किंतु व्यवहार में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व से दूर दिखाई देती हैं। आज जब अयोध्या राम मंदिर से करोड़ों श्रद्धालुओं का चढ़ावा चोरी की बात निकली है,तब यह कहावत कुछ असहज किंतु आवश्यक प्रश्न भी खड़े करती है।
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था।यह स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े जन आंदोलनों में से एक था। 500 वर्षों तक चले संघर्ष,सामाजिक विमर्श, राजनीतिक बहसों और न्यायिक प्रक्रिया के बाद जब मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ, तब देश के कोने-कोने से लोगों ने इसे अपनी व्यक्तिगत आस्था का विषय मानकर सहयोग दिया। गाँवों से लेकर महानगरों तक,भारत से लेकर विदेशों तक,करोड़ों लोगों ने आर्थिक और भावनात्मक रूप से इस अभियान में भागीदारी की। किसी ने एक रुपया दिया,किसी ने लाखों रुपये का दान किया।अनेक श्रद्धालुओं ने सोना,चाँदी,हीरे,मोती और बहुमूल्य रत्न अर्पित किए। कई परिवारों ने पीढ़ियों से संभालकर रखे गए आभूषण रामलला को समर्पित कर दिए। महिलाओं ने अपने विवाह के गहने तक दान कर दिए। बुजुर्गों ने अपनी जीवनभर की बचत का हिस्सा भगवान के चरणों में अर्पित किया। यह केवल आर्थिक योगदान नहीं था,बल्कि श्रद्धा,समर्पण और विश्वास की अभिव्यक्ति थी।
मंदिर आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि इसमें समाज के हर वर्ग की भागीदारी दिखाई दी। गरीब,मध्यमवर्गीय और संपन्न सभी ने अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दिया।यही कारण है कि मंदिर से जुड़ा प्रत्येक संसाधन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के विश्वास का प्रतीक है। लोगों ने यह मानकर दान दिया कि उनका योगदान भगवान राम के भव्य मंदिर और उससे जुड़े धार्मिक-सांस्कृतिक उद्देश्यों की पूर्ति में लगेगा। भारतीय संस्कृति में दान और चढ़ावे की परंपरा अत्यंत प्राचीन है।मंदिरों को सदियों से समाज ने केवल पूजा स्थलों के रूप में नहीं,बल्कि लोककल्याण के केंद्र के रूप में भी देखा है।इतिहास गवाह है कि अनेक मंदिरों ने शिक्षा, चिकित्सा, सामाजिक सहायता और सांस्कृतिक संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। श्रद्धालु जब मंदिर में चढ़ावा चढ़ाते हैं,तब वे केवल धन नहीं देते, बल्कि संस्था के प्रति अपना विश्वास भी सौंपते हैं।यही विश्वास किसी भी धार्मिक संस्था की सबसे बड़ी पूँजी होता है।यही कारण है कि जब चढ़ावे में प्राप्त बहुमूल्य वस्तुओं, आभूषणों और रत्नों के संबंध में किसी प्रकार की अनियमितता,चोरी अथवा अभिलेखीय विसंगतियों की चर्चा सामने आती है,तो समाज में स्वाभाविक रूप से चिंता उत्पन्न होती है।
जांच में पता चला है कि चढ़ावे में प्राप्त मूल्यवान वस्तुओं के रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति को लेकर पारदर्शिता अपेक्षित स्तर की नहीं है। जांच एजेंसियों की भूमिका को लेकर भी प्रश्न उठने लगे। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आरोप,जांच और न्यायिक निष्कर्ष तीन अलग-अलग चरण होते हैं। केवल आरोपों के आधार पर किसी संस्था या व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। साथ ही जब मामला करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा हो,तब उठ रहे प्रश्नों को केवल अफवाह कहकर खारिज कर देना भी उचित नहीं माना जा सकता। जन विश्वास बनाए रखने के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों अनिवार्य हैं।
राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं,बल्कि राष्ट्रीय भावना, सांस्कृतिक चेतना और सभ्यतागत स्मृति का प्रतीक है।इसीलिए उससे जुड़े प्रत्येक निर्णय,प्रत्येक व्यवस्था और प्रत्येक संसाधन पर समाज की निगाह है। श्रद्धालु यह जानना चाहते हैं कि उनके द्वारा समर्पित धन और बहुमूल्य वस्तुओं का संरक्षण किस प्रकार किया जा रहा है,उनका लेखा-जोखा कैसे रखा जा रहा है,क्या स्वतंत्र ऑडिट की व्यवस्था है,क्या समय-समय पर सार्वजनिक रिपोर्ट जारी की जाती है तथा क्या चढ़ावे का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित और सत्यापित रूप में उपलब्ध है। ये प्रश्न किसी धर्म, व्यक्ति या संस्था विशेष के विरोध में नहीं हैं।वास्तव में ये प्रश्न उन करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास की रक्षा से जुड़े हैं जिन्होंने राम मंदिर निर्माण को अपना व्यक्तिगत और सांस्कृतिक दायित्व मानकर सहयोग दिया था।लोकतांत्रिक समाज में पारदर्शिता को अविश्वास का प्रतीक नहीं,बल्कि विश्वास को और अधिक मजबूत करने का माध्यम माना जाता है।यहीं पर राम मंदिर निर्माण और उसके संचालन से जुड़ी प्रबंधन व्यवस्था तथा प्रबंधन समिति की भूमिका चर्चा के केंद्र में आ जाती है।किसी भी बड़े धार्मिक संस्थान की विश्वसनीयता केवल उसकी भव्यता से निर्धारित नहीं होती।उसके प्रशासनिक मानक,वित्तीय अनुशासन और जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।यदि प्रबंधन व्यवस्था पारदर्शी,व्यवस्थित और उत्तरदायी दिखाई देती है, तो श्रद्धालुओं का विश्वास स्वतः बढ़ता है।यदि कहीं अस्पष्टता या सूचना का अभाव दिखाई देता है,तो प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है।
जब किसी संस्था को जनता का व्यापक समर्थन और संसाधन प्राप्त होते हैं,तब उसके साथ जवाबदेही भी जुड़ जाती है।श्रद्धालु यह अपेक्षा करते हैं कि मंदिर से जुड़े सभी आर्थिक और प्रशासनिक कार्य पूर्ण पारदर्शिता के साथ संचालित हों।यदि कहीं कोई शिकायत या संदेह उत्पन्न होता है, तो उसका समाधान तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर किया जाए। यही किसी भी प्रतिष्ठित संस्था की साख को मजबूत करने का सबसे प्रभावी तरीका है।भारत का संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था यह स्पष्ट करती है कि कोई भी संस्था कानून से ऊपर नहीं है।चाहे वह धार्मिक संस्था हो,सामाजिक संगठन हो, राजनीतिक दल हो अथवा कोई बड़ी कॉरपोरेट इकाई -सभी के लिए कानून समान है। इसलिए यदि किसी प्रकार की शिकायत सामने आयी है,तो जांच एजेंसियों को न्याय और मर्यादा की रक्षा हर हाल में करनी चाहिए।
किसी संस्था के विरुद्ध जांच का उद्देश्य दोषी ठहराना नहीं,बल्कि सत्य तक पहुंचना होता है। यदि सब कुछ व्यवस्थित और पारदर्शी है, तो जांच संस्था की विश्वसनीयता को और मजबूत कर सकती है।यदि कहीं कोई त्रुटि या अनियमितता है, तो उसका सामने आना भी आवश्यक है।यही कानून के शासन का मूल आधार है।दुर्भाग्य से समाज में अक्सर दो चरम स्थितियां देखने को मिलती हैं।एक वर्ग बिना किसी निष्कर्ष के ही आरोपों को सत्य मान लेता है।दूसरा वर्ग केवल भावनाओं के आधार पर हर प्रश्न को साजिश घोषित कर देता है।दोनों ही दृष्टिकोण स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श के लिए उचित नहीं हैं।सत्य तक पहुंचने का मार्ग तथ्यों,प्रमाणों और निष्पक्ष जांच से होकर गुजरता है।
भगवान श्रीराम भारतीय संस्कृति में मर्यादा,न्याय और सत्य के सर्वोच्च प्रतीक माने जाते हैं।रामराज्य की अवधारणा केवल धार्मिक भावना नहीं,बल्कि सुशासन का आदर्श भी है।रामराज्य का अर्थ ऐसी व्यवस्था से है जहां शासन पारदर्शी हो,न्याय निष्पक्ष हो और जनता का विश्वास सर्वोपरि हो। वहां राजा स्वयं भी नैतिक जवाबदेही से मुक्त नहीं था। यही कारण है कि भगवान राम आज भी केवल धार्मिक श्रद्धा के विषय नहीं,बल्कि आदर्श शासन और नैतिक नेतृत्व के प्रतीक माने जाते हैं।यदि राम के नाम पर निर्मित किसी संस्था या व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग उठती है,तो उसे विरोध के रूप में नहीं,बल्कि रामराज्य के आदर्शों के अनुरूप सुधार की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।आखिर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का जीवन स्वयं सत्य,मर्यादा और उत्तरदायित्व का संदेश देता है।
चलते चलते
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दिल्ली के स्कूल आफ एक्सीलेंस खिचड़ीपुर के कक्षा 9 के विद्यार्थियों को ‘राम’ शब्द को लेकर वाक्य बनाने का टास्क दिया गया था। बच्चों ने लिखा था
1- मर्यादा पुरुषोत्तम राम अयोध्या के राजा थे।
2- राम दशरथ के बड़े पुत्र थे।
3- राम न्याय प्रिय राजा थे।
4- राम ने रावण को मारा।
5- राम ने शंबुक का वध किया था।
गौरी ने राम को लेकर एक कहावत लिखा था,
“राम के चिरई, राम के खेत।
खाऽल चिरई भर भर पेट”।।
