गौरी तिवारी
इन बेनाम गलियों में,
घूमे वह किसी बंजारे-सा,
तपती ग्रीष्म की किरणों में,
भटके वह किसी प्यासे-सा।
है खोज उसे उस मार्ग की,
जहाँ सत्य उसे साकार मिले,
इस क्षणभंगुर जगत के पार,
उसे अविनाशी आत्म का द्वार मिले।
जग रमा हुआ वैभव में था,
वह शून्य में अर्थ निहार रहा,
सब बाँध रहे थे स्वप्न नए,
वह बंधनों के पार विचार रहा
है खोज उसे उस मार्ग की,
जहाँ प्रतिस्पर्धा न हो वैभव की ,
जहाँ मौन स्वयं उद्घोष बने,
और त्याग हो अहम का।
जब नगर में उत्सव मनाए जाते,
वह वन के सन्नाटे चुनता था,
जब दीप महलों में जलाए जाते,
वह आत्मदीप प्रज्वलित करता था।
है खोज उसे उस मार्ग की,
जो ले जाए आत्मबोध की ओर,
जहाँ मिट जाए सीमित “मैं”,
और अनुभूति हो अपार की।
मृगतृष्णाओं के मरुस्थल में,
वह अमृत-निर्झर खोज रहा,
क्षणभंगुर सुख के कोलाहल में,
अनहद का स्वर खोज रहा
है खोज उसे उस मार्ग की,
जिसका अंत ही आरंभ बने,
जहाँ कण-कण में ब्रह्म दिखे,
और भक्ति ही ईश्वर प्राप्ति का साधन बने।
अब त्याग चुका वह नाम सभी,
न यश का मोह, न भय कोई,
निज अंतर के निर्मल आकाश में,
जीवित रहा सिर्फ सत्य ही
है खोज उसे उस मार्ग की,
जो शव से शिव की ओर जाये,
जहाँ अहम् का अंतिम कण मिटे
और मानव ब्रह्म में विलीन हो जाए।
