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संस्कृत साहित्य में प्राण वध

रोमन अंग्रेजी में लिखें तो भगत और भारत में एक अक्षर का अंतर है, लेकिन गरीबों मजलूमों के वाजिब हक के लिए आवाज उठाने वालों के लिए शासन सत्ता के गुरुर, भाषा, जंगल न्याय और सजा देने के तौर तरीके में कोई फर्क नहीं है। आम आदमी के लिए किया जाने वाला जन-संघर्ष सरकारों की नजर में गुंडागर्दी ही है। शहीदे आजम भगत सिंह को अंग्रेजों ने फांसी के तख्ते पर लटका कर मारा था। बिहार, भोजपुर के भारत को बिहार की पुलिस ने घेरकर गोलियों की बौछार से ढेर कर दिया है।
यह कोई तुलनात्मक टिप्पणी नहीं है। भगत और भारत की तुलना हो भी नहीं सकती। यहां बात सिर्फ कानून और व्यवस्था के नाम पर किए जाने वाले मानव वध की है।
अंग्रेजी राज के दौरान हर जोर जुल्म के टक्कर में इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाने वाले भगत सिंह अमर क्रांतिकारी हैं। ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिलते देख तब की डरी हुई सरकार ने मुकर्रर तारीख से पहले ही चुपके से देश के प्यारे दुलारे भगत को फांसी पर लटका दिया था। वहीं भारत, आजाद हिंदुस्तान में फेसबुक लाइव पर स्वघोषित विद्रोही है जो सरकार से व्यवस्था में आवश्यक सुधार की मांग करता है। तमाम तरह की सरकारी नौटंकी के बाद बिहार की पुलिस ने भारत को मार गिराया।
इसे लेकर बिहार सहित देशभर में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही है। घटना में शामिल पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया गया है।बिहार के मुख्यमंत्री के निर्देश पर न्यायिक जांच हो रही है। सरकार के वरिष्ठ मंत्री जीतन राम मांझी पुलिस के साथ खड़े हैं तथा पुलिस की कार्रवाई को 100% जायज बता रहे हैं। उनका कहना है चूंकि मृतक ब्राह्मण समाज से है इसलिए वे तमाम अवसरवादी नेता जो पुलिस एनकाउंटर के पक्ष में रहे हैं उनने भी अब पाला बदल लिया है और पुलिस कार्यवाही की निंदा कर रहे हैं।
कुछ हद तक उनकी बातें तार्किक भी है क्योंकि बिहार सहित देश के अन्य हिस्सों में एनकाउंटर को महिमा मंडित करने वाले, एनकाउंटर स्पेशलिस्टों को माला पहनाने वाले भी तो यही लोग हैं। इस घटना को लेकर बहुत कुछ लिखा बोला जा रहा है। हर दल, हर व्यक्ति अपने अपने चश्मे से इस मानव वध पर प्रतिक्रिया दे रहा है। आजाद और लोकतांत्रिक भारत में कानून का राज है। रेयर आप दि रेयरेस्ट में सजा- ए-मौत का प्रावधान है। लेकिन शासन सत्ता के लिए सबसे आसान रास्ता हो गया है एनकाउंटर।
प्राचीन काल से लेकर अंग्रेजों के जाने तक भारत में मानव वध की अनेक घटनाएं इतिहास में वर्णित है। उम्मीद की गई थी की आजादी के बाद पुरानी परिपाटी बंद होगी। नागरिक चेतना का विकास होगा। सरकारें मत्स्य न्याय के तहत होने वाले मानव वध को खत्म कर कानून का राज स्थापित करेगी। दोषियों को कानून के मुताबिक सजा तथा निर्दोष लोगों को मुक्त करने पर जोर देगी। लेकिन जमीनी सच्चाई है कि एनकाउंटर(मानव वध) आज एक सामान्य पुलिसिया व्यवहार हो गया है।
कलरव हिंदी मासिक पत्रिका में 20 वर्ष पहले ‘संस्कृत साहित्य में मानव वध’ विषयक प्रकाशित आलेख जो आज भी प्रासंगिक है पाठकों के लिए प्रस्तुत है।

वर्तमान में हमारे यहां जो हिंदू लॉ के नाम से कानून प्रचलित है उसका सबसे बड़ा आधार याज्ञवल्क्य स्मृति की प्रसिद्ध टीका मीनाक्षरा है। इसके पहले मनु ने समाज में कानून व्यवस्था के लिए विधि का विधान किया था। समय-समय पर ऋषियों द्वारा बनाए गए नियमों को ही कानून मानने की परंपरा रही है। उनके द्वारा दी गई व्यवस्था मानवीय भी रही और लोगों ने उसे बढ़कर लिया और जिया भी। संस्कृत साहित्य में स्मृति ग्रंथों के पूर्व सूत्रबद्ध धर्म सूत्र ग्रंथों की सत्ता मिलती रही है। सूत्रमय धर्मशास्त्रों में वशिष्ठ योग, बोधायन और मनुस्मृति के अलावा लगभग बीस स्मृतियां विभिन्न नामों से संकलित हैं। प्राण वध विषयक विधान के बारे में चर्चा करते समय हम सबसे पहले मनु के धर्म शास्त्र की बात करते हैं। मनु ने अपने शास्त्र में दंड के लिए जो कहा था उसे बाद में भृगु स्मृति में संकलित किया गया। उपस्थ मुदरम जिह्वा हस्तौ, पादौ च पंचमम। चक्षुर्नासा चकरणौ च धनम्देहस्ति थैव च। मनु ने दंड के यही दस स्थान गिनाए हैं जिनमें लिंग, पेट, जीभ, दोनों हाथ, दोनों पैर, आंख, नाक, कान, धन और देह शामिल है।

चोरों और डाकुओं के दमन के लिए मनु ने उन्हें शूली पर लटकाने का निर्देश दिया है। संधिछित्वा तु ए चौर्य रात्रौ कुर्वति तस्करा, तेषां छित्वा नृपौ हस्तौ तिक्ष्णे शूले निवेशयेति। वहीं गांठ काटने वालों के लिए मनु के विधान में दूसरा दंड है। वे कहते हैं कि गांठ कतरने वाले की पहली बार उंगली काट देनी चाहिए।

दूसरी बार उसके दोनों हाथ काट देने चाहिए और तीसरी बार उसका वध करना ही श्रेयस्कर है। चोरों, राजद्रोहियों को प्रश्रय देने वाले को मनु सीधे-सीधे प्राण वध का दंड देते हैं। ग्रामे स्वापि चये केच्चि चौराणाम भक्त दायका, भांडाव कास दास्चैव सर्वस्तान पिघातयेत। आततायी लोगों के लिए सिर्फ एक विधान है प्राण दंड। पुरुषाणाम कुलीनानाम नारीणाम च विशेषतः मुख्यानाम चैव रत्नानाम हरणे वध मरहति। गुरु वा बाल वृद्धौ वा ब्राह्मण व बहुश्रुतम, आततायी मायंतम हन्या देवा विचारयम। इसी तरह बलात्संग के मामले में मनु बहुत कठोर हैं। यथा यो कामा दुष्यैत कन्या स सद्योवध मरहति। इसी प्रकार पापिनी स्त्री के बारे में मनु कहते हैं कि भतीरम लंघये दयातु स्त्री ज्ञाति गुण दर्पिता। तास्वभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहु संस्थिते। अर्थात जो स्त्री अपने बंधु बांधवों, गुण रूप के कारण पति को छोड़ कर अन्य पुरुष के पास जाए तो राजा उसको भारी भीड़ के सामने कुत्तों से फड़वा डाले।

याज्ञवल्क्य स्मृति-याज्ञवल्क्य ने लिखा है, चौरम प्रदाप्या पदंत घात एत विविधैर्य वधे अर्थात चोरों को नाना प्रकार के वधों से तब तक प्रताड़ित किया जाए जब तक उनके प्राण छूट न जाएं। वहीं ऋषि ने बलात्कार आदि के विषय में कहा है कि बंदी ग्राहस्तदा कुंजराणा च हारिणः प्रसह्य घातिनि पत्त्रैव शूला बाजी नारोपयेनरान। अर्थात स्त्री पकड़ने वालों, बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या करने वालों को राजा बिना सोचे समझे हाथी के सामने फेंक कर मरवा डाले।

बोधायन स्मृति- बोधायन स्मृति में व्यवस्था दी गई है कि राजा, भीत, उन्मत, नशे में मस्त पुरुष, स्त्री, बालक, वृद्ध और ब्राह्मण से युद्ध न किया जाए किंतु किसी को कहीं भी कोई आततायी दिखे तो उसे हर काम छोड़कर खत्म करना ही राजधर्म है। आगे कहते हैं कि गुरु की सेज पर गुरु पत्नी का सतीत्व नष्ट करने वाला तपे लोहे पर सोए या जलती लोहे की लाट से चिपक जाए या अपने अंडकोषों और लिंग को काटकर हाथ में लेकर दक्षिण दिशा में जाए और खुद ही मर जाए अथवा अन्य लोग उसे पत्थर मारकर प्राण वध कर दें।

वशिष्ठ स्मृति-वशिष्ठ स्मृति में कहा गया है कि अग्ग्रिदो गर्दस्चैव शस्त्रपाणिर्धनापह, क्षेत्रदारहरश्चैव षडेते आततायिनः । अर्थात आग लगाने वाला, विष देने वाला, धन चुराने वाला, खेत और स्त्री पर कब्जा करने वाला, राज नियमों के विरुद्ध चलने वाला कहीं से भी क्षम्य नहीं है। ऐसे लोगों को जान से मारने का दंड दिया जाना चाहिए। वीरमित्रोदय-वीरमित्रोदय के मुताबिक संधिच्छेद कृतो ज्ञात्वा शूल माग्राहयेतप्रभु, तथा पांथमुखम वृक्षे बाल वृद्धावलंबयेत। अर्थात सेंध मारने वाले को शूली पर चढ़ाने और सरेआम डाका डालने वाले को फांसी पर लटकाने का विधान है।

स्त्री व बच्ची के साथ अनाचार करने वालों के लिए महर्षि व्यास का वचन है कि स्त्री हर्ता लोह सैने दग्धब्यो वैकटाग्निना, नरहर्तुहस्त पादौ छित्वा स्थापस्यश्चतुस्यै। अर्थात स्त्रियों के साथ नियम विरुद्ध कार्य करने वाले को चटाई में लपेट कर जला डालना चाहिए।

वेद में प्राण दंड-यो देवाकृत्वाकृत्वा हरादविदुषोगृहम, वस्सौधारुरिव मातरम च प्रत्यकउपपद्यताम। यदि कोई हिंसाकारी प्रयोग करके अनजान आदमी के घर देह का नाश करे तो जिस प्रकार दूध पीने वाला बछड़ा गाय के पास दौड़ता है उसी तरह हत्या करने वाले जल्लाद को उसकी ओर छोड़ देना चाहिए। अमाकृत्वा पापमानम यस्मेनानि जिंघासती, अस्मानसतस्याम दग्धाग्राम बहुला फटकरीक्रती अर्थात घर के अंदर हानिकारक घातक प्रयोग करके जो दूसरे को मारना चाहता है उसे पकड़े जाने पर पत्थर पर पटककर खत्म कर देना चाहिए। अथर्व वेद के 81 31 11 में कहा गया है कि अद्यामूरीयअतियादुधानो यदिवायुस्त तपः पुरुषस्य, अधासविरैर्दसिभिः वियूयोमामोघयासुधानम इत्याः यदि मैं यातुधान हूं और यदि मैं पुरुष के जीवन को कष्ट देता हूं तो अभी प्राण त्याग दूं और वह दसों इंद्रियों से हीन हो जाए जो मुझे प्राण देने या प्राण लेने वाला बताता है।

कौटिल्य के शास्त्र में प्राण दंड-चाणक्य ने दंड की व्यवस्था में कहा है कि कल्यहनतेपुरुषस्य चित्रोघात अर्थात कलह करते हुए हत्याकारी पुरुष का विशेष चित्र महाराजा चंद्रगुप्त के महामान्य अशोक राज के प्रतिपालक महाराज बिंबिसार के अभिभावक आचार्य विष्णु गुप्त ने जो अर्थशास्त्र संग्रहीत किया है उसमें प्राण वध के कुछ प्रकरण हैं। उनमें से राजनीति की दृष्टि से दाणुकर्मिक और गुप्त कर्णक शोधन प्रकरण इस तरह हैं। सर्वाधिकरणक रक्षण मेखनिसार अर्थात बहुमूल्य रत्नों को चुराने वाले को प्राण दंड। आदसपण मूल्यादति वधः दस पण के मूल्य से अधिक के चोरी करने वाले को प्राण दंड। चोराणाममाभि पधर्षणे चित्रोघात अर्थात चोर को कठिन प्राण दंड। सनरुद्वैषचैव घातः यानि कैद में पड़े हुए पुरुष को कैद में आई हुई किसी स्त्री के साथ व्यभिचार करने पर प्राण वध। मानुपमांसविक्रयेवधः मतलब मनुष्य का मांस बेचने वाले को मृत्यु दंड। इसी तरह शुद्ध और चित्र दंड कल्प प्रकरण में प्राण वध की व्यवस्था थी। जैसे सप्तरात्रा श्यांतः मृते शुद्ध वधः यदि किसी ने दूसरे को घायल किया हो और घायल पुरुष सात दिन के भीतर मर जाए तो इसे प्राण वध दिया जाना चाहिए।

पश्चनांदहेर पहारेदा स तमेव दंडम लभेत अर्थात दूसरे को उकसाने वाले, अन्याय से किसी को कैद करने वाले, छिपकर अस्त्र चलाने वाले उन्हें तत्काल सूली पर लटका दिया जाए। जो लोग इनका अंतिम संस्कार करें अथवा इनको कहीं ले जाएं उनको भी दंडित करने का प्रावधान है। मातृपितृभ्राता आचार्य और संन्यासी की हत्या करने वाले की खाल खींच लेनी चाहिए और उन्हें जलाकर मारना चाहिए।

 

कलरव, नवंबर 2006 के अंक में प्रकाशित। (पृष्ठ संख्या 18-19)

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