लोकतंत्र यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति का अधिकार
अनिल तिवारी
जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा घोषित राष्ट्रीय आपातकाल की 51वीं बरसी भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण आत्मनिरीक्षण का अवसर है। सत्ता की लालसा में संविधान को बंधक बनाने और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचलने के उस काले अध्याय से यह सबक मिलता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता सर्वोपरि है।
उन 21 महीने के दौर में ‘आंतरिक अशांति’ का हवाला देकर विपक्ष के हजारों नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंट दिया गया और नागरिकों के जीने के अधिकार सहित सभी मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे। यह काल हमें याद दिलाता है कि तानाशाही की शुरुआत हमेशा असहमति की आवाजों को दबाने से होती है।
आपातकाल के दौरान न्यायपालिका पर दबाव बनाया गया और कार्यपालिका को असीमित शक्तियां दे दी गई। हालांकि, इसके बावजूद नागरिकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने उस दमनकारी शासन का डटकर विरोध किया। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन ने यह साबित कर दिया कि भारत की जनता तानाशाही को कभी लंबे समय तक स्वीकार नहीं कर सकती। आज जब हम इस घटना को याद करते हैं, तो इसे मात्र एक राजनीतिक इतिहास के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह एक चेतावनी है कि संवैधानिक संस्थाओं—विशेषकर न्यायपालिका, चुनाव आयोग और स्वतंत्र मीडिया—की स्वायत्तता की रक्षा कितनी आवश्यक है।
हमें ठहर कर देखना चाहिए की संविधान से प्राप्त नागरिकों के अधिकार की रक्षा करने में संस्थाएं किस स्तर तक सक्षम हुई है। सामाजिक आर्थिक राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, धर्म, उपासना, विश्वास, भाईचारा और अवसर की समता के लिए क्या-क्या किया जा रहा है? शासन सत्ता का रवैया क्या है?
देश में आपातकाल की घोषणा से पहले हमारे दादाजी सरकार के आलोचकों में से एक थे। दिन प्रतिदिन समाज जीवन में संघर्ष के नाम पर बढ़ रही अराजकता का वह बार-बार जिक्र करते थे, और दिल्ली की कुर्सी पर बैठी पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुत्री को कोसते भी थे। उसी दौरान वर्ष 1976 में इलाहाबाद में कुंभ का आयोजन हुआ था। उस कुंभ में हमारे दादाजी परिवार जनों के साथ कल्पवास करने गए थे। एक महीने की तीर्थयात्रा से लौटने के बाद अचानक उनके सुर बदले हुए थे। सरकार के इंतजाम से वे काफी गदगद थे। उनका कहना था कि मेला में लाखों श्रद्धालुओं के लिए स्तरीय सरकारी इंतजाम था। हर काम समय पर हो रहा था। तय दाम पर वाजिब तौल के साथ वस्तुएं बाजार में उपलब्ध थी। चारों तरफ साफ सफाई के व्यापक इंतजाम थे।चोरी छीना-झपटी के मामले प्रकाश में नहीं आए। आने-जाने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध थे। ट्रेनें भी समय से चल रही थी।
उस दौर के कई एक अध्ययनों में यह निष्कर्ष निकल कर आया था कि 1972-73 के बाद से देश में सरकारी मनमानी, सामाजिक अराजकता, कालाबाजारी, कोटा परमिट राज, आदि के कारण कानून व्यवस्था बद से बदतर हो रही थी। भारत की जीवन रेखा कही जाने वाली रेलवे ट्रेन कई-कई घंटे की देरी से चलती थी। पुलिस थानों में आम आदमी के लिए कोई सुनवाई नहीं थी। सेठ साहूकार कालाबाजारी में लिप्त थे तथा मनमाने दाम पर वस्तुओं का क्रय विक्रय कर रहे थे। घट-तौली के मामले बढ़ गए थे।
बताते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इस स्थिति पर काबू पाने के लिए पहले से ही विचार कर रही थी। पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर के साथ संवाद के दौरान इंदिरा गांधी ने कहा भी था कि भारत की जनता की दीर्घकालिक भलाई के लिए एक शार्ट ‘शाक ट्रीटमेंट’ की जरूरत है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उनकी संसद सदस्यता रद्द किए जाने के बाद बिना मंत्रिमंडल को विश्वास में लिए आनन-फानन में आपातकाल की घोषणा कर दी गई थी। संवैधानिक संस्थाओं के अधिकार सीमित कर दिए गए। विरोध की आवाज को दबाया गया और बड़े नेताओं को जेल खाने में डाल दिया गया।
हालांकि आपातकाल के दौरान प्रचलित बुराइयों पर बहुत हद तक नियंत्रण भी हुआ। कानून व्यवस्था को लेकर तब के लोग अंग्रेजी राज से तुलना भी करते थे। लेकिन कानून व्यवस्था की आड़ में अनेक संवैधानिक संस्थाओं का गला घोंटा गया। इसी दौरान इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी के पांच सूत्री कार्यक्रम के तहत नसबंदी का अभियान चलाया गया जिसमें बड़े पैमाने पर जबरदस्ती नसबंदी की गई। न्यायपालिका पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश की गया। मीडिया को नियंत्रित किया गया। लेकिन तत्कालीन सरकार को जल्दी ही समझ में आ गया कि भारत की लोकतांत्रिक जनता बहुत दिनों तक तानाशाही को बर्दाश्त नहीं कर सकती। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने आम चुनाव की घोषणा कर दी। उसे चुनाव में इंदिरा गांधी बुरी तरह पराजित हुई। उत्तर भारत से कांग्रेस का सुपड़ा साफ हो गया था।
अब अगर पिछले एक दशक की प्रमुख घटनाओं का लेखा-जोखा करें तो देश में नोटबंदी, जीएसटी, करोना महामारी, सीमा पर उन्माद,धार्मिक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, पश्चिम एशिया के देशों में युद्ध तथा शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त धांधली से देश की जनता को परेशानी उठानी पड़ी है। सरकार ने बहुत हद तक मीडिया को भी एक पक्षीय खेमे में खड़ा करने का रास्ता तैयार किया है। देश के विपक्षी दल केंद्रीय जांच एजेंसियों और चुनाव आयोग की भूमिका तक पर सवाल उठाते रहे हैं। जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की मंडी लगाकर खरीद-बेच से भी जनता के अधिकारों को चोट पहुंचा है जो स्वस्थ लोकतंत्र के लिए नुकसानदायक है। करोड़ों लोगों के आस्था के केंद्र मर्यादा पुरुषोत्तम राम के मंदिर से चढ़ावा चोरी के मामले से भी लोगों मे सरकार के प्रति विश्वास कमजोर हुआ है।
ऐसे में आपातकाल की 51वीं बरसी पर यह संकल्प लेने की आवश्यकता है कि देश में फिर कभी सत्ता के अहंकार के आगे संविधान और लोकतंत्र की बलि नहीं चढ़ाई जाए। असली लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार का सम्मान करने से ही कायम रहता है।
