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मॉडर्न बेड़ियाँ (कहानी)

गौरी तिवारी 

 

संध्या का अंधेरा धीरे-धीरे घर की खिड़कियों पर उतर रहा था। बैठक में रखे टेलीविज़न की रोशनी कमरे में गंभीरता बिखेर रही थी। सोफ़े पर बैठे विनोद समाचार चैनल पर प्रसारित एक विशेष रिपोर्ट देख रहे थे, समाचार वाचक बता रहा था कि किस प्रकार तालिबानियों द्वारा अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया गया है तथा उनके शासन के बाद टेलीविज़न पर प्रतिबंध लगा दिया, सिनेमा हॉल बंद करवा दिए गए, चोरी करने पर हाथ काटने की सज़ा का ऐलान किया गया, महिलाओं पर अनेक नए प्रतिबंध लगाए गए। कहीं लड़कियों की उच्च शिक्षा पर रोक थी, कहीं उनके अकेले बाहर निकलने पर पाबंदियाँ थीं, तो कहीं उनके जीवन के निर्णयों का अधिकार स्वयं उनसे छीन लिया गया था। बाहर वह बिना किसी पुरुष के साथ नहीं निकल सकती, स्त्रियों का सड़क पर हंसना मना था, वह बाहर कुछ बोल नहीं सकती, अच्छे कपड़े नहीं पहन सकती, श्रृंगार पर प्रतिबंध था, यदि वह अपने पति के अत्याचार से परेशान होकर घर छोड़कर जाएं तो उन्हें जेल भी हो सकती है, अदालत में एक स्त्री की गवाही एक पुरुष की गवाही की आधी मानी जाएगी, आदि और यदि इनमें से कोई भी कानून या नियम तोड़ा गया तो सजा स्वरूप उन्हें कोड़ों द्वारा मारा जाएगा। रिपोर्ट में कुछ अफ़ग़ानी महिलाओं का साक्षात्कार दिखाया जा रहा था। बुर्के में होने के कारण जिनकी आँखें जाली रूपी कपड़े से ढकी हुई थी, उनकी आवाज़ में अधूरे सपनों की उदासी दिखाई दे रही थी।

विनोद ने एक गहरी साँस ली और दुख मिश्रित स्वर में अपनी पत्नी से कहा, “कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि इक्कीसवीं सदी में भी महिलाओं को इस प्रकार की यातनाएँ सहनी पड़ रही हैं। शिक्षा और स्वतंत्रता तो हर मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है।”
उनकी पत्नी रसोईघर में रात के भोजन की तैयारी करते हुए कहती हैं, “बिल्कुल सही कह रहे हैं आप, हमें तो उनके बारे में सोचकर भी दुख होता है कि आखिर ऐसी स्थिति में वहां स्त्रियां कैसे जीवनयापन करती होंगी।”

तभी विनोद, सुनीता को आवाज़ देते हुए कहते हैं – “ज़रा ए.सी. का रिमोट देना।” सुनीता सब्जियां काटना छोड़कर किचन से बैठक में आती हैं और विनोद के सामने वाले टेबल पर रखा हुआ ए.सी का रिमोट उन्हें पकड़ाते हुए वहां रखा चाय का कप भी ले जाती हैं। उनके वहां से जाते ही विनोद एक बार फिर आवाज़ देते हैं “एक गिलास पानी देना…” सुनीता एक बार फिर किचन का काम छोड़कर विनोद को पानी देने आती हैं जो उसके ठीक दायीं ओर रखा हुआ होता है।

उसी समय उनकी बेटी अपेक्षा अपने कमरे से निकलकर बैठक में आ गई। उसके हाथ में प्रतियोगी परीक्षा की एक पुस्तक थी। वह पढ़ाई में अत्यंत मेधावी थी और भविष्य में अफसर बनना चाहती थी। विनोद ने उसे देखकर पूछा, “बेटा, तैयारी कैसी चल रही है? तुम्हें अच्छे विश्वविद्यालय में प्रवेश लेना है।”
अपेक्षा ने मुस्कराकर उत्तर दिया, “जी पापा, तैयारी अच्छी चल रही है।”

कुछ क्षणों तक कमरे में शांति रही। फिर उसने साहस जुटाकर कहा, “पापा, कल मेरी दोस्त सिमरन का जन्मदिन है। कल मेरे सारे दोस्त उसके घर जाएंगे। क्या मैं भी जा सकती हूँ?”
उसके शब्द सुनते ही विनोद का चेहरा बदल गया। उनके स्वर में अचानक कठोरता आ गई –
“नहीं,” उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “दोस्तों के घर जाना अच्छी बात नहीं होती…और वैसे भी सिमरन का घर तो बहुत दूर है। आजकल मौसम भी ठीक नहीं है और अकेले उतनी दूर जाना सुरक्षित भी नहीं है।”

अपेक्षा चुप रह गई। उसने धीरे से कहा, “लेकिन पापा, हम सब साथ में जाएंगे उसके घर और दिन में ही जाने का सोचा है… ज्यादा देर नहीं रुकेंगे। और अगर आप चाहें तो आप ही मुझे उसके घर छोड़ने चलिएगा और वापस भी आपके साथ आ जाऊंगी।”
“मैंने जो कह दिया, वही अंतिम है,” विनोद ने बात काटते हुए कहा।
अपेक्षा के होंठों पर आए शब्द वापस लौट गए। वह जानती थी कि अब कोई तर्क व्यर्थ था। उसी समय उसका छोटा भाई आरव नए कपड़े पहनकर अत्यंत उत्साहित दिखाई दे रहा था।

“पापा, मैं आदित्य, अनुराग और तुषार के साथ रोहन की बर्थडे पार्टी में उसके घर जा रहा हूँ।”
विनोद ने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा, “ठीक है लेकिन ध्यान रखना और फ़ोन साथ रखना।”
आदित्य प्रसन्न होकर तेज़ कदमों से घर के बाहर निकल गया।

कुछ समय पश्चात विनोद अपेक्षा को अपने पास बुलाकर उससे देश में चल रही घटनाओं के बारे में बात करते हैं तथा शतरंज भी खेलते हैं। तभी सुनीता उन दोनों के पास आकर विनोद से कहती हैं –
“पेपर खत्म होने के बाद अपेक्षा को भरतनाट्यम सीखने के लिए डांस क्लास से जुड़ना चाहिए। आप क्या कहते हैं?”
“अपेक्षा भरतनाट्यम सीखकर क्या करेगी? डांस तो घर पर भी कर सकती है उसके लिए कोर्स करने की क्या जरूरत है? बाकी अगर उसका मन है तो कोई बात नहीं, अगले हफ्ते जाकर भरतनाट्यम के लिए हम किसी डांस क्लास का पता करेंगे।”

अपेक्षा की दृष्टि अनायास अपने पिता पर टिक गई, वह जानती थी कि पिछले 3 वर्षों से उसे उसके पिता कभी संगीत सीखने के लिए, कभी कंप्यूटर सीखने के लिए कभी कुछ सीखने के लिए भेजते ही रह गए, लेकिन आजतक वह दिन नहीं आया। उसके पिता कभी सामने से मना भी नहीं करते हैं लेकिन घर या बच्चों को लेकर अपनी पत्नी सुनीता द्वारा दिए गए सुझावों को वह इस प्रकार नजरअंदाज कर देते हैं जैसे उन्होने कुछ कहा ही न हो और वे सुझाव अर्थहीन हों। यदि एक ही चीज़ के लिए उनसे बार-बार कहा जाए तब अकारण ही उन्हें क्रोध आने लगता है, फिर सुनीता या अपेक्षा दोनों उनसे अपने मन की बात डर के कारण नहीं कह पाते। विनोद कभी क्रोध नहीं करते लेकिन उनकी आवाज़ की गंभीरता, ऊंचा स्वर और कभी उनकी आँखें लाल हो जाना अक्सर सुनीता और अपेक्षा के मन में एक अनजाना भय उत्पन्न कर देता, जिसके कारण वो दोनों विनोद से अपने मन की बात कहने में हिचकिचाते थे। कभी घर पर मेहमान आ जाएं तो जब तक मेहमान चले नहीं जाते तब तक सुनीता का घर रसोई की दीवारें ही बन जाती, और रही बात अपेक्षा की… वह एक अच्छे विद्यालय में पढ़ती थी, घर पर उसे सबका स्नेह भी मिलता था लेकिन फिर भी कई बार उसे अपनी रुचि, अपने स्वप्नों को दबाना पड़ा एक अनजाने के डर के कारण।।।।

अपेक्षा के मन में एक तीखा प्रश्न जन्म ले चुका था, वह प्रश्न शब्दों में व्यक्त नहीं हुआ, पर उसकी आँखों में स्पष्ट दिखाई दे रहा था। क्या बंदिशें सिर्फ वही होती हैं जिसे सरकार या शासन लागू करे? या जब सामने से कोई व्यक्ति ज़ाहिर करके किसी चीज़ पर प्रतिबंध लगाए? क्या वो अदृश्य रेखाएं बंदिशे नहीं होती जिसे बड़ी सरलता से बिना कठोरता व्यक्त किए एक स्त्री के जीवन में खींचा जाता है?

वह अंदर वाले कमरे की ओर लौट गई। खिड़की के पास खड़े होकर उसने बाहर फैले अंधकार को देखा। सड़क पर वाहन चल रहे थे, लोग अपने-अपने गंतव्यों की ओर जा रहे थे। दुनिया गतिशील थी, पर उसे लगा जैसे उसके चारों ओर मकड़ी के जाले दिखाई देने लगे उसे ऐसा प्रतीत होने लगा मानो वह एक अदृश्य जाल में फंसती जा रही है, उसके हाथ पैर सुन्न पड़ गए हैं उसके कंठ से आवाज़ नहीं निकल रही, वह कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पा रही।

बैठक में समाचार अभी भी चल रहा था। स्क्रीन पर अफ़ग़ानिस्तान की स्त्रियां दिखाई दे रही थी, जिनकी आवाज़ में स्वतंत्रता की आकांक्षा झिलमिला रही थी। अपने कमरे में खड़ी अपेक्षा को लगा कि उन स्त्रियों और उसके बीच की दूरी हजारों किलोमीटर अवश्य है, किंतु उनके प्रश्न एक जैसे हैं। अंतर केवल इतना है कि एक की बेड़ियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं और दूसरी की बेड़ियाँ आधुनिकता, प्रेम और संरक्षण के आवरण में छिपी रहती हैं।

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