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प्रकृति

गौरी तिवारी 

 

भोर क्षितिज की दहलीज़ पर
चुपके से दीप जलाती है,
नींद भरे वन के आँगन में
धीरे-धीरे गीत सुनाती है।

किरणें नन्हीं बालिकाएँ बन
ओस-मोती चुनती जातीं,
सूनी पगडंडी के पर
स्वर्णिम चादर बिछाती।

नदी कहती, चलना सीखो,
रुकना जीवन की रीति नहीं।
पर्वत हँसकर कहने लगता,
धैर्य बिना कोई जीत नहीं।

पवन बांसुरी लेकर निकला,
वन-वन मधुर तराने गाता।
पत्तों की छोटी-सी टोली
उसकी धुन पर झूमती जाती।

पेड़, गंभीर तपस्वी बनकर
पौधों को समझाता रहता,
ऊँचा वही, जो झुककर भी
सबका भला करता

पेड़ों की डाली हर्षित होकर
पक्षी को घर दे देती है,
अपने छोटे-से जीवन में
दूसरों को स्वर देती है।

पुष्प, रंगों का अनुपम विस्तार लिए,
बनाते मृदु सुगंध का मधुर विधान
कोमल पंखुरियों की आभा में,
झिलमिल करते नव विहान
प्रकृति-रूप के इस वैभव में,
सौंदर्य स्वयं साकार, विमल है।

साँझ थकी गृहिणी बनकर
दिन का आँगन समेट रही,
तारों के छोटे दीपक लेकर
रात की चौखट पोंछ रही।

चाँद श्वेत दीपक-सा नभ में,
शीतल आभा बिखराता है।
तारों की निर्मल टोली संग,
रजनी-रूप सजाता है।

धरती करुणामयी माँ बन
हर ऋतु को हँसकर अपनाती,
घाव छिपाकर अपने मन के
सबको हरियाली दे जाती।

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