गौरी तिवारी
रोहन सातवीं कक्षा का विद्यार्थी था। उसका स्वभाव अत्यंत चंचल तथा मिलनसार था, उसमें एक अच्छी बात थी कि वह हमेशा दूसरों की मदद करना चाहता था। लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमी यह थी कि वह बिना पूरी जानकारी के ही खुद को सबसे समझदार समझने लगता था। किसी को कुछ पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती, रोहन खुद ही सलाह देने पहुँच जाता। उसकी यह आदत विद्यालय और घर के आसपास, दोनों जगह मशहूर थी।
एक दिन स्कूल की छुट्टी के बाद रोहन अपने दोस्तों के साथ घर लौट रहा था तभी रास्ते में एक वृद्ध सज्जन हाथ में एक पर्ची लिए इधर-उधर भटक रहे थे। उन्होंने किसी से पूछा “मैक्स हॉस्पिटल किस तरफ़ पड़ेगा? मुझे अपने दोस्त से मिलने जाना है।”
सामने वाले व्यक्ति ने उनसे कह दिया कि उन्हें अस्पताल का मार्ग नहीं पता, रोहन भी यह सब सुन रहा था, उसने अस्पताल का नाम बहुत पहले अपने पापा को कहते हुए सुना था लेकिन वह वहाँ कभी गया नहीं था। फिर भी बिना सोचे तुरंत बोला, “आइए बाबा मैं आपको छोड़ देता हूं, मुझे रास्ता अच्छी तरह पता है।” इसपर वृद्ध सज्जन कहते हैं
“कोई बात नहीं बेटा, हम किसी और से पूछ लेंगे।”
” अरे नहीं बाबा, मुझे सही रास्ता पता है। यहां से ज्यादा दूर नहीं है हॉस्पिटल, 2 गली छोड़कर ही है।”
दोस्तों ने धीरे से कहा, “रोहन, अगर रास्ता नहीं पता है तो किसी से पूछ लेते हैं।” लेकिन रोहन ने हँसते हुए कहा, “तुम लोगों को क्या पता! मैं रोज़ इसी तरफ़ आता-जाता हूँ।”
वह दादाजी को लेकर चल पड़ा। आधे घंटे तक वे गलियों में घूमते रहे। आखिरकार एक मेडिकल स्टोर वाले ने बताया कि अस्पताल तो बिल्कुल दूसरी दिशा में था और वहाँ तक पहुँचने में अब काफी समय लग जाएगा।
वृद्ध सज्जन थक चुके थे। उन्होंने गहरी साँस लेते हुए कहा,
“बेटा, अगर तुम्हें रास्ता नहीं पता था, तो किसी से पूछ लेते। मुझे देर हो गई।”
रोहन को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने उनसे माफी मांगी। फिर किसी से सही रास्ता पूछकर वह वृद्ध सज्जन स्वयं अस्पताल गए और रोहन को वापस उसके विद्यालय तक छोड़ कर आए।
ऐसे ही एक हफ्ते गुज़र गए, कुछ दिन बाद विज्ञान की परीक्षा थी। अवकाश के समय विद्यार्थियों का एक समूह एक प्रश्न पर चर्चा कर रहा था। राहुल ने पूछा, “रोहन, पौधे भोजन कैसे बनाते हैं?” रोहन ने बिना किताब देखे आत्मविश्वास से कहा,
“तुम इतनी जल्दी भूल गए, कल ही तो मैम ने बताया था कि पौधे मिट्टी से अपना भोजन बनाते हैं।”
उसके सारे दोस्तों ने उसकी बात पर विश्वास करके परीक्षा में उन्होंने वही उत्तर लिख दिया। जब उत्तर-पुस्तिकाएँ मिलीं, तो उन सभी के अंक कट गए। सही उत्तर था कि पौधे सूर्य के प्रकाश, जल और कार्बन डाइऑक्साइड की सहायता से प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन बनाते हैं।
राहुल उदास होकर बोला,
“रोहन, तुमने तो कहा था कि यही सही उत्तर है।”
रोहन को दादाजी का थका हुआ चेहरा और अपने दोस्तों के कटे हुए अंकों के बारे में सोचकर बुरा लगा। वह अपनी सीट से उठा और बोला, “मैम, मेरी गलती थी। मुझे सही उत्तर नहीं पता था, फिर भी मैंने आत्मविश्वास के साथ सबको गलत उत्तर ही बता दिया।
रोहन की बात सुनकर अध्यापिका उसे समझाते हुए कहती हैं कि गलती करने से बड़ा दोष उसे न मानना है और आज रोहन का अपनी भूल स्वीकार करना, सीखने की पहली सीढ़ी चढ़ने जैसा है। फिर अध्यापिका सभी विद्यार्थियों को संबोधित करती हैं ” बच्चों जैसे एक आधे भरे हुए घड़े को हल्का-सा हिलाने पर उसका पानी तुरंत छलकने लगता है और पूरा भरा घड़ा हिलाने पर उसमें से बहुत कम पानी बाहर निकलता है। ठीक वैसे ही अधूरा ज्ञान केवल स्वयं का ही नहीं, बल्कि दूसरों का भी नुकसान कर सकता है। इसलिए बिना पूरी जानकारी के सलाह देना या मार्गदर्शन करना उचित नहीं।
उस दिन के बाद रोहन ने एक नियम बना लिया। यदि किसी बात की पूरी जानकारी न हो, तो वह साफ़ कह देता, “मुझे नहीं पता, चलो किसी जानकार से पूछते हैं।” धीरे-धीरे उसकी इसी आदत ने उसे सबका विश्वासपात्र बना दिया।
