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निराश आँखें (कविता)

गौरी तिवारी 

 

भूख ज्वालामुखी का लावा बन,
दरिद्र के जीवन को तपाती है
सूनी थाली की मौन व्यथा
हर संध्या आँसू गाती है
नन्हीं आँखें जब रोटी ढूँढ़ें,
माँ अश्रुपूर्ण नेत्र झुका लेती
खाली हाथों की लाचारी
अपनी ही ममता पर संशय करती।

सड़क किनारे तिरपालों का
छोटा-सा एक संसार बसा,
धूप, पवन और वर्षा से ही
जिसका हर दिन रहता घिरा
धरती सेज और नभ है छत,
नींद समेटकर बैठी रहती
पिता की आशाहीन, थकी निगाहें।

पिता सुबह से साँझ तक
श्रम की अग्नि में जलते हैं
स्वेद के हर मोती
मिट्टी में जा मिलते हैं
कठोर हाथों के छालों में
जीवन का इतिहास लिखा,
फिर भी घर के चूल्हे ने
यदा-कदा ही रोटी देखा।

बस्ते की मधुर प्रतीक्षा में
नन्हे सपने रोते हैं,
ईंटों, पत्थरों के जंगल में
अपने बचपन को खोते हैं
हँसी, पिंजरबद्ध पंछी बन
पंख खोलने से डर जाती
माँ की सूनी आँखों में बस
एक प्रार्थना शेष रह जाती।

जहां एक ओर त्यौहारों में
उत्सव के स्वर गूँज रहे,
वहीं झोपड़ियों के बुझते चूल्हे
एक ही प्रश्न पूछ रहे
कैसा यह संसार, जहाँ
श्रम का कोई मोल नहीं,
जिसने जग का भार उठाया,
उसके हिस्से खुशियों का भोर नहीं।

फिर भी आशा की छोटी लौ
हर तूफान से लड़ जाती,
हर ठोकर के बाद मनुज की
हिम्मत फिर से जाग जाती है
आँधी लाख दिशाएँ रोके,
विश्वास नहीं टूट पाता है
सूखी डालों पर भी देखो
नव पल्लव फिर आ जाता है
इसी सहारे निर्धन मानव
जीवन पथ पर चलता है।

आओ ऐसा संसार रचें हम,
जहाँ न भूख सताए फिर
हर श्रमिक को प्रतिफल मिले
नयन न आँसू बरसाए फिर
रोटी, शिक्षा और सम्मान
हर मानव का अधिकार बने।

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