गौरी तिवारी
शहर के एक छोटे निजी चिकित्सालय में उस दिन असामान्य भीड़ थी, किसी को बुखार था, कोई खाँसी से परेशान था, कोई पेट दर्द से कराह रहा था। उन्हीं मरीजों के बीच एक दस वर्षीय बालक भी अपने माता-पिता के साथ बैठा था। उसके शरीर में न बुखार था, न खाँसी, न कोई ऐसा रोग जो दिखाई दे। फिर भी उसका चेहरा पीला पड़ गया था, आँखें लाल थीं, होंठ सूखे हुए थे और हाथ काँप रहे थे।
डॉक्टर ने मुस्कुराकर बच्चे से पूछा, “बेटा आपका क्या नाम है?”
“अभिनव”
“क्या तकलीफ़ है आपको?”
अभिनव की माँ की आँखें भर आईं, अभिनव की जगह वह जवाब देते हुए कहती हैं –
“सर, हमारा बेटा तीन दिन से खाना नहीं खा रहा। रात भर जागता रहता है। किसी से बात नहीं करता। कभी-कभी उसे सांस लेने भी परेशानी होती है”
डॉक्टर ने बच्चे की नब्ज़ देखी, आँखें देखीं और धीमे स्वर में बोले, “इस तरह रोग के बारे में पता नहीं चल पाएगा, खून की जांच करवानी पड़ेगी।”
डॉक्टर ने उनसे कहा कि जब तक रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक आराम करना होगा और खाने के साथ जूस भी पीना होगा। कुछ दवाइयां देते हुए कहते हैं “यदि रिपोर्ट आने से पहले अभिनव को बुखार आता है तो आप एक-एक गोली दिन में तीन बार उसे दे दीजिएगा, उसे आराम मिल जाएगा”
जून की उस उमस भरी शाम में अभिनव के घर के पास वाले सबसे पुराने पार्क में लगा लोहे का खाली झूला तेज़ हवा के कारण इस प्रकार हिल रहा था जैसे वह किसी अदृश्य हाथ की स्मृति में आगे-पीछे डोल रहा हो। कभी इसी पार्क में शाम होते ही बच्चों का शोर आस पास के घरों तक सुनाई देता, कोई एक दूसरे के पीछे भागता, कोई कबड्डी खेलता, कोई पेड़ पर चढ़कर आसमान को छूने का प्रयास करता। अब वही पार्क शांत था। घास पर बच्चों के पैरों के निशान नहीं, केवल सूखे पत्तों की परत थी। दूर बेंच पर बैठे वृद्ध गहरी साँस लेकर कहते हैं, “लगता है शहर से बचपन कहीं चला गया है।” उनके पास बैठे दूसरे वृद्ध सज्जन कहते हैं, “बचपन गया नहीं है, बस जेबों में कैद हो गया है।”
एक साधारण मध्यमवर्गीय घर में दस वर्षीय अभिनव अपने कमरे में बैठा था। कमरे की खिड़की खुली थी, बाहर बारिश की हल्की सोंधी सुगंध तैर रही थी, पर उसकी आँखें चमकती स्क्रीन पर जमी थीं, जिसमें रंग लगातार बदल रहे थे, विभिन्न प्रकार की ध्वनि बाहर आ रही थी। उसकी माँ रसोई से पुकारते हुए कहती हैं, “अभिनव डॉक्टर ने आराम करने के लिए बोला है न! फोन छोड़कर लेट जाओ।”
उसने बिना सिर उठाए कहा, “बस पाँच मिनट।” यह पाँच मिनट पिछले कई महीनों से उसके घर में सबसे लंबा समय बन चुका था।
अभिनव हमेशा से ऐसा नहीं था, कभी वह बहुत चंचल था, स्कूल से लौटते ही बैग फेंककर नीचे भाग जाता। बारिश में भीगना, मिट्टी में फिसलना, दादी से कहानियाँ सुनना, पढ़ना और जल्दी सो जाना, यही उसकी दिनचर्या थी।
उसकी दादी जब से किसी काम से लंबे अंतराल के लिए गांव गयी थी, तब से जब भी वह अपने माता-पिता से उसके साथ खेलने के लिए या कहानी सुनाने के लिए कहता, उसके माता-पिता उसके हाथ में फोन पकड़ा देते ताकि वह परेशान न करे और चुपचाप एक जगह बैठा रहे। अभिनव उदास हो, उसका जन्मदिन हो या उसे चोट लगी हो, हर समय उसके हाथ में फोन रख दिया जाता। उसके दसवें जन्मदिन पर उन्होंने उसे एक महँगा स्मार्टफोन उपहार में दिया। उस दिन घर में बहुत खुशी थी। रिश्तेदारों ने तस्वीरें खींचीं, केक कटा, और अभिनव की आँखें चमक उठीं। किसी ने नहीं सोचा कि उसी दिन उसके हाथ में एक ऐसी चीज़ आ गई है जो धीरे-धीरे उसके समय, उसकी नींद, उसकी पढ़ाई और उसके मस्तिष्क पर अधिकार जमा लेगी।
अभिनव की मां कमरे में आकर देखती हैं कि मना करने के बावजूद अभिनव फोन नहीं रखता और ना ही आराम करता है। वह उसके हाथ से मोबाइल फोन छीनकर ले जाती हैं और कहती हैं कि जब-तक वह 2 घंटे आराम नहीं करेगा उसे फोन नहीं मिलेगा।
मुश्किल से 15 मिनट हुए होते हैं कि अभिनव के सिसकने की आवाज़ आती है, सरला घबराकर उसके पास जाकर देखती हैं कि कहीं बुखार तो नहीं हो गया, सब सामान्य पाने पर पूछती हैं, “अभिनव क्या हुआ बेटा?”
अभिनव सिसकते हुए जवाब देता है “बहुत तेज़ पेट दर्द हो रहा है मां, नींद भी नहीं आ रही”
सरला यह सोचकर कि शायद भूख की वजह से अभिनव का पेट दर्द हो रहा हो, उसके लिए ओट्स बनाकर ले आती हैं। अभिनव अपनी मां से कहता है “मां प्लीज़ थोड़ी देर के लिए फोन दे दीजिए, आप तो जानती हैं न कि मैं बिना कार्टून देखे खाना नहीं खाता।”
सरला कहती है “फोन पर कार्टून देखने से अच्छा आओ हम तुम्हें बंदर और मछ्ली की कहानी सुनाते हैं”
“नहीं मुझे भूत वाला कार्टून देखना है”
“अच्छा कोई बात नहीं, हम भूत के सच्चे किस्से बताते हैं तुम्हें”
“नहीं मां रहने दीजिए, मन नहीं है मेरा”
अभिनव ने 3-4 कौर खाने के बाद यह कहकर खाना छोड़ दिया कि उसके गले से निवाला नीचे नहीं जा पा रहा।
कुछ समय पश्चात संध्या में अभिनव के पिता ऑफिस से वापस घर आते हैं, उनके हाथ में कागज़ देखकर सरला पूछती हैं – “रिपोर्ट आ गई क्या?”
“हां”
“मुझे अभिनव की बहुत चिंता हो रही है, उसने सुबह से ठीक से कुछ खाया भी नहीं है और न ही आराम किया है।”
“दवाई दी थी तुमने?”
“नहीं, क्योंकि बुखार नहीं आया, पेट दर्द हो रहा था लेकिन उसने सुबह से कुछ अच्छे से खाया नहीं था इसलिए पेन किलर नहीं दिया। देखी रिपोर्ट? क्या लिखा है उसमें? सब ठीक तो है न?
“मुझे वही तो समझ नहीं आ रहा, रिपोर्ट में सब सामान्य लिखा है।”
सरला और संजय बात कर ही रहे होते हैं कि तभी फोन की घंटी बजती है। अभिनव की दादी सरला और संजय से अभिनव की तबियत के बारे में पूछती हैं, फिर अभिनव से बात करती हैं, उससे कहती हैं “बच्चा जल्दी से ठीक हो जाओ फिर हम तुम्हें कुछ दिनों के लिए अपने साथ गांव लेकर चलेंगे।”
अभिनव उदासीनता से जवाब देता है “जी दादी”
उसके मुख पर उदासी देखकर उसकी दादी कहानी सुनाती हैं लेकिन उनकी कहानी बीच में ही काटते हुए अभिनव कहता है कि उसका मन नहीं है कहानी सुनने का, वह बाद में बात करेगा और फोन रख देता है। अपनी दादी का फोन काटते ही अभिनव (टेम्पल रन) खेलने लगता है। फिर आधे घंटे बाद वह कमरे के बाहर जाकर अपने पिता से मिलता है और उनसे बात करता है। उसके पेट दर्द ठीक होने पर उसके माता-पिता के चेहरे पर संतोष की झलक दिखाई पड़ती है।
संजय अपनी पत्नी सरला से कहते हैं ” हमने सुबह का अपॉइंटमेंट ले लिया है, कल अभिनव की रिपोर्ट डॉक्टर को दिखानी पड़ेगी।”
अगले दिन सुबह जल्दी उठकर तीनों उसी निजी चिकित्सालय में जाते हैं। डॉक्टर रिपोर्ट पढ़कर कहते हैं कि जांच में तो सब ठीक दिखा रहा है, अभिनव को कोई रोग नहीं है। फिर वह पूछते हैं कि कल चिकित्सालय से जाने के बाद अभिनव ने क्या किया। सरला जब सारी बातें बताती है तब डॉक्टर अभिनव को अपने पास बुलाते हैं और पूछते हैं, “बेटा तुम्हे क्या खेलना पसंद है?”
“अंकल मुझे फोन में टेंपल रन खेलना बहुत पसंद है”
“अच्छा, आप कहानियां पढ़ते हो?”
“नहीं, दादी जब घर पर थी तब वही मुझे कहानी सुनाती थी, अब तो मुझे छोटा भीम और बेन टेन देखना सबसे ज्यादा पसंद है”
अभिनव के जवाब सुनकर डॉक्टर समझ गए कि असल रोग क्या है। वह उसके माता-पिता से कहते हैं कि अभिनव को कोई बीमारी नहीं है अपितु उसके मन को रोग है। वह मोबाइल फोन की स्क्रीन तक सिमट कर रह गया है और जब उसे फोन न मिले तब उसे लगने लगता है कि उसे बुखार है, पेट दर्द अथवा कोई अन्य रोग है। डॉक्टर संजय और सरला को सतर्क करते हुए तथा समझाते हुए कहते हैं कि आज के समय में अपनी व्यस्तता के कारण माता-पिता अपने बच्चों को समय नहीं देते, एक वर्ष का बच्चा जब रोता है तो उसके माता पिता उसे चुप करवाने के लिए उसके हाथ में फोन दे देते हैं, तबसे ही यह आदत बच्चों में बढ़ने लगती है।
सरला पूछती है “सर, इसकी कोई दवा नहीं है? यदि उसे फिर कभी साँस लेने में तकलीफ हो या पेट दर्द हो या फिर चक्कर आए तो हम क्या करेंगे?”
इसपर डॉक्टर कहते हैं, “इस रोग की दवाई परिवार में है। अभिनव को मोबाइल फोन की जगह अपना समय दीजिए, उसके साथ खेलिए, बातें कीजिए, किताबें पढ़िए, यदि उसका कोई प्रश्न है तो गूगल की जगह आप उसके प्रश्नों का समाधान बताइए, उसके साथ टहलने जाइए। भरपेट भोजन और अच्छी नींद से उसके चेहरे का पीलापन और आँखों का लालपन भी ठीक हो जाएगा।”
डॉक्टर को धन्यवाद ज्ञापित कर वे तीनों वापस घर चले जाते हैं।
उस दिन घर पहुंचते ही उसके माता पिता ने अपना मोबाइल फोन एक झोले में रख दिया, उन्होंने अभिनव को कहानी सुनाई, फिर शाम को वे तीनों पार्क भी गए। पहले दिन अभिनव बिल्कुल शांत था लेकिन दूसरे दिन वह अपने दोस्तों के साथ पार्क में खेलने लगा। उस दिन के बाद से उसके पिता उसके लिए जो भी किताबें लाते अभिनव कुछ ही दिनों में पढ़ लेता, उसकी मां उसे कभी भूत की कहानियां, कभी नैतिक मूल्यों की कहानियां सुनाती। अभिनव के चेहरे पर वापस पहले वाली मुस्कान और चंचलता आ गई। अब यदा कदा उसके माता-पिता उसे कहानी सुनाना या उसके साथ पार्क जाना भूल भी जाते हैं तो वह स्वयं उनके पास बैठकर उन्हें पढ़ी हुई किताबों के बारे में बताने लगता है।
