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इंदिरा गांधी का 1975 का आपातकालः भारतीय राजनीतिक इतिहास का ‘क्रूर कालखंड’ या ‘स्वर्णकाल’?

नथून शाह गोंड

 

वर्तमान की नरेंद्र मोदी सरकार ने वर्ष 2014 के बाद से देश में कई नई परंपराओं की शुरुआत की है, जिनमें से एक है – ‘संविधान हत्या दिवस’। वर्ष 2024 में शुरू किया गया यह दिवस हर साल 25 जून को मनाया जाता है, क्योंकि इसी तारीख को 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा देश में राष्ट्रीय आपातकाल (Emergency) की घोषणा की गई थी। 1975 से 1977 के कालखंड को संवैधानिक संस्थाओं के पतन और नागरिक अधिकारों के हनन के तौर पर न सिर्फ याद किया जाता है, बल्कि आज के गोदी मीडिया और उच्च पदस्थ तथा प्रभुत्व संपन्न समाज द्वारा इंदिरा गांधी को एक खलनायिका के रूप में पेश किया जाता है। अब सवाल यह उठता है कि क्या इंदिरा गांधी का आपातकाल वाकई एक ‘क्रूर कालखंड’ था या और भी कुछ था? हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। अगर सिक्के का एक पहलू लोकतांत्रिक संस्थाओं का पतन और नागरिक अधिकारों का हनन है, तो आपातकाल का दूसरा पहलू क्या है? अगर 1975-1977 का दौर वाकई क्रूर कालखंड था, तो फिर बहुजन समाज का बौद्धिक वर्ग इसे ‘स्वर्णकाल’ और ‘मुक्तिकाल’ क्यों कहता है?

25 जून 1975 का इतिहास: मुख्यधारा बनाम वंचित विमर्श

भारतीय राजनीतिक इतिहास में 25 जून 1975 की तारीख को सामान्यतः लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन और नागरिक अधिकारों के हनन के तौर पर याद किया जाता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद द्वारा घोषित यह आपातकाल मुख्यधारा के विमर्श में हमेशा ‘काला अध्याय’ कहा गया है।

लेकिन, जब हम इस कालखंड को भारत के सबसे निचले पायदान पर खड़े समाज-आदिवासियों, अनुसूचित जातियों, शोषितों और वंचितों-के चश्मे से देखते हैं, तो एक बिल्कुल अलग और चौंकाने वाला सामाजिक-आर्थिक पहलू उभरकर सामने आता है। शोषित-वंचित समाज के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग इस दौर को ‘स्वर्णकाल’ या ‘मुक्ति का काल’ क्यों मानता है? आइए, इसके गहरे अकादमिक और संरचनात्मक कारणों को समझते हैं।

1. सामंती चक्रव्यूह पर कड़ा प्रहार: 20-सूत्रीय कार्यक्रम और भूमि सुधार

आपातकाल लागू होते ही 1 जुलाई 1975 को इंदिरा गांधी ने ’20-सूत्रीय कार्यक्रम’ की घोषणा की थी। इस कार्यक्रम का प्राथमिक उद्देश्य ग्रामीण भारत में सदियों से जमे सामंतवाद की रीढ़ को तोड़ना था। प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रणब बर्धन ने अपनी पुस्तक *”The Political Economy of Development in India”* में इस दौर के आर्थिक और संरचनात्मक बदलावों का गहरा विश्लेषण किया है।

लैंड सीलिंग एक्ट (भूमि सीमा कानून):

इस दौरान देश के विभिन्न राज्यों में ‘लैंड सीलिंग एक्ट’ को बहुत कड़ाई से लागू किया गया। जिन सामंतों, जागीरदारों और बड़े भूस्वामियों के पास हजारों एकड़ ‘अधिशेष’ (Surplus) जमीन अवैध रूप से थी, प्रशासन ने उसे सीधे अपने नियंत्रण में ले लिया और भूमिहीन दलितों, आदिवासियों तथा अति-पिछड़ों में बांट दिया। जिस शोषित वर्ग के पास पीढ़ियों से आत्मसम्मान के लिए जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं था, उसे रातों-रात मालिकाना हक मिल गया (जिसके लाभार्थियों में मेरे गाँव के दर्जनों परिवार शामिल हैं)। इस सख्त प्रशासनिक कार्रवाई ने ग्रामीण अंचलों में जमींदारों के उस खौफ को काफी हद तक खत्म कर दिया, जो पीढ़ियों से चला आ रहा था।

2. सदियों की गुलामी का अंतः बंधुआ मजदूरी उन्मूलन

भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे काला अध्याय ‘बंधुआ मजदूरी’ रहा है, जहाँ साहूकारों के कर्ज-जाल (Debt-trap) में फंसकर आदिवासी और दलित वर्ग की कई पीढ़ियां बिना मजदूरी के गुलामी करने को मजबूर थीं। इस अमानवीय प्रथा को खत्म करने के लिए आपातकाल के दौरान ही ‘बंधुआ श्रम प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976’ पारित किया गया।

भारत सरकार के तत्कालीन श्रम मंत्रालय और योजना आयोग के ऐतिहासिक दस्तावेज दर्शाते हैं कि इस कानून के तहत न केवल लाखों बंधुआ मजदूरों को सामंती चंगुल से तात्कालिक रूप से मुक्त कराया गया, बल्कि उनके पुनर्वास के लिए सीधे वित्तीय सहायता भी दी गई। अदालत की लंबी प्रक्रियाओं और राजनीतिक हस्तक्षेप के बिना मिली इस त्वरित मुक्ति को शोषित वर्ग ने “लक्षित सामाजिक न्याय” के रूप में देखा।

3. ट्राइबल सब-प्लान और सुदूर वनांचलों तक राज्य की पहुंच

आपातकाल के समानांतर चल रही पांचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-79) के दौरान भारत में पहली बार ‘जनजातीय उप- योजना’ (Tribal Sub-Plan – TSP) की अवधारणा को कड़ाई से लागू किया गया। इसके अंतर्गत बजटीय आवंटन की एक ऐसी मजबूत प्रणाली बनाई गई, जिसमें बजट का एक निश्चित हिस्सा अनिवार्य रूप से केवल आदिवासी क्षेत्रों के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर ही खर्च होना तय हुआ।

जनजातीय मामलों के विशेषज्ञ और पूर्व अनुसूचित जाति/जनजाति आयुक्त डॉ. बी.डी. शर्मा की रिपोर्ट्स के अनुसार, इस दौर में आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए बजटीय आवंटन में जो ऐतिहासिक वृद्धि देखी गई, उसने सुदूर अंचलों व जंगलों में रहने वाले समुदायों तक पहली बार सीधे राज्य की कल्याणकारी योजनाओं को पहुँचाया।

4. सूदखोरी से मुक्ति और न्यूनतम मजदूरी का कानून

ग्रामीण क्षेत्रों में आदिवासियों और अनुसूचित जातियों का सबसे ज्यादा आर्थिक शोषण स्थानीय साहूकारों द्वारा अत्यधिक ब्याज दरों के माध्यम से होता था। आपातकाल के विशेष प्रावधानों के तहत साहूकारों के अवैध और पीढ़ीगत ऋणों को कानूनी रूप से रद्द कर दिया गया। इसके साथ ही, कृषि श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी (Minimum Wages) के नियम बेहद सख्ती से लागू किए गए। चूंकि इस कालखंड में अदालतों की प्रक्रियाएं और विपक्षी राजनीतिक आंदोलन शिथिल थे, इसलिए नौकरशाही ने बिना किसी स्थानीय सामंती या राजनीतिक दबाव के इन फैसलों को धरातल पर उतारा। बड़े-बड़े भूस्वामियों को जेल जाने के डर से गरीब मजदूरों को उचित और पूरी मजदूरी देनी पड़ी।

वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ क्या है?

शोषित-वंचित समाज के बौद्धिक वर्ग द्वारा इस दौर को ‘स्वर्णकाल’ के रूप में रेखांकित करने के पीछे एक गहरा अकादमिक तर्क है। मुख्यधारा का मीडिया, शहरी मध्यवर्ग और राजनीतिक दल जिस ‘नागरिक अधिकार’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की बहस को उठा रहे थे, भारत के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए उसकी प्राथमिकताएं अलग थीं। जिस व्यक्ति को हर दिन भूख, बंधुआ मजदूरी, शारीरिक शोषण और सामंती अत्याचार का सामना करना पड़ रहा हो, उसके लिए ‘सख्त प्रशासनिक व्यवस्था’ वरदान साबित हुई। उनके लिए पेट की भूख, अपनी जमीन पर मालिकाना हक और सामाजिक सुरक्षा ही ‘वास्तविक स्वतंत्रता’ थी।

निष्कर्ष

यही कारण है कि भारतीय राजनीतिक इतिहास का यह कालखंड आज भी विमर्श के दो ध्रुवों-एक तरफ लोकतंत्र की हत्या और दूसरी तरफ सामाजिक न्याय की पराकाष्ठा-के बीच खड़ा दिखाई देता है।

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