श्रीराम का नाम स्मरण आते ही आजीवन उनके द्वारा अपने महत और आदर्श कर्मों के द्वारा स्थापित एक ऐसी आदर्श छवि मनोमस्तिष्क के समक्ष उपस्थित हो जाती है जो हिमालय से भी अनगिनत गुना गर्वोन्नत, समुद्र से भी असीम गुरू गंभीर, मन्दाकिनी से भी निश्छल, पूर्णचन्द्र की ज्योत्स्ना से भी शुभ्र – शीतल, सूर्य के समत्व, तेज- ओज की महिमा से भी सर्वांग परिपूर्ण, धरती के धैर्य से भी अधिक धैर्यशील है। जो विकट से विकट परिस्थितियों में भी “सुखे- दुखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ” के भाव से भी समुन्नत भाव रखने वाले व्यक्तित्व के सभी गुणों से संपन्न है। जिनके चिन्तन मात्र से जीवन आनन्दमय- उत्सवमय हो उठता है। जो स्वयं के जीवन की चरमातीत सफलता को प्राप्त करने के आशा- किरण के अनुभव से गुनगुनाने लगता है। अनादि काल से प्रवाहित होती हुई सनातन संस्कृति-सागर के श्रीराम ऐसे ज्योतिस्तम्भ हैं, प्रकाशपुंज हैं जो अनंत काल से संपूर्ण विश्व को प्रकाशित करते आ रहें हैं और तब तक ज्योतित करते रहेंगे जब तक पंचभूत निर्मित यह जीवनदायिनी प्राणसंपन्ना संमृद्ध पृथ्वी रहेगी। श्रीराम को अपने शील, पराक्रम, जनहितकारी सोच, सुशासन और प्रजा के हित तथा मान को सर्वोपरि मानने के कारण भारतीय समाज में उन्हें जैसी लोकपूजा मिली है,जिस आत्यांतिक हार्दिक- आदर,सम्मान – श्रद्धा की दृष्टि के साथ लोग उनको देखते हैं वैसे संसार के अन्य किसी धार्मिक, सामाजिक व्यक्ति के प्रति आकर्षण युक्त निर्विवादित दृष्टिकोण नहीं मिलता है।“वे भारतीय जीवनदर्शन और भारतीय संस्कृति के सच्चे प्रतीक हैं। भारत ही नही अपितु विश्व के कोटि- कोटि नर -नारी आज भी उनके उच्चादर्शों से प्रेरित हो संकट और असमंजस की स्थितियों में भी धैर्य एवं विश्वास के साथ आगे बढते हुए कर्तव्य का पालन करते हैं।” उनके त्यागमय सत्यनिष्ठ जीवन से केवल स्वदेश के ही नहीं अपितु विदेशों के भी अद्भुत व्यक्तित्व मैक्समूलर, जोन्स, कीथ,ग्रिफिथ, बरान्निकोव ,फादर कामिल बुल्के जैसी अनेक विद्वत विभूतियां आकर्षित हुई हैं।उनके गौरवमय कर्म,आचरण व चरित्र से अनंत सदियों से संपूर्ण मानवता गौरवान्वित होती आ रही है और होती रहेगी।
व्याकरण की दृष्टि से ‘रम’ धातु में घअ् प्रत्यय के योग से ‘राम’ शब्द निष्पन्न हुआ है। ‘रम’ धातु का अर्थ रमण करने से है। वामन शिवराम आप्टे के ‘संस्कृत हिन्दी कोश’ में दिया गया है कि वे प्राणिमात्र में और भक्तजन उनमें रमण करते हैं इसलिए वे राम हैं-“रमते कणे- कणे इति राम:।”
सनातन संस्कृति में सबसे प्राचीन वेद साहित्य को माना जाता है। वैदिक साहित्य में ‘राम’ शब्द का उल्लेख तो मिलता है लेकिन जिस अर्थगर्भी रूप में राम शब्द का प्रयोग वाल्मीकि, तुलसीदास, अध्यात्म रामायण रचनाकार या कंबन प्रभृति रामकथा, रामचरित के मर्मज्ञों ने किया है या आमजन राम को जानते हैं उन अर्थों में नही है, अपितु इतर अर्थ मे यह शब्द प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वेद में केवल दो स्थलों पर ‘राम’ शब्द का प्रयोग मिलता है। एक स्थल पर इस शब्द का अर्थ ‘काले रंग’ से है दूसरे स्थल पर ‘व्यक्ति’ के रूप मे प्रयोग हुआ है। एतरेय ब्राह्मण में भी दो जगहों पर यह शब्द भिन्न अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। शतपथ ब्राह्मण में एक स्थल पर ‘राम’ शब्द आया है जिसका अर्थ प्रसंग के अनुसार ‘आचार्य’ है।
इक्ष्वाकु वंश के राजा दशरथ और महारानी कौशल्या पूर्व जन्म में वैवस्वत मनु और शतरूपा थे जिनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शेषशायी विष्णु ने वरदान स्वरूप आशीर्वादात्मक वचन दिया था कि आपदोनों के पुत्र के रूप में त्रेतायुग में जन्म लूंगा। जैसा की रामकथा में वर्णन मिलता है कि विवाह के दीर्घकाल व्यतीत हो जाने के पश्चात भी महाराज दशरथ की तीनों रानियों को संतान -सुख की प्राप्त नही हो रही थी। इस बात को लेकर जहां पूरा राजपरिवार चिन्तित था वहीं कुलगुरु होने के नाते परमतेजस्वी, वेद- वेदांग के ज्ञाता, वहुविध शास्त्र- शस्त्रों के आचार्य, त्रिकालदर्शी, महातपस्वी ब्रह्मा के मानस पुत्र वशिष्ठ जी भी सोच में पड गए। इस विकट समस्या के निदान हेतु उन्होंने महाराज को मुनिवर विभाण्डक सुत, तपोधना शान्ता के पति श्रृंग ऋषि से कामेष्टि/पुत्रेष्टि यज्ञ कराने का सुझाव दिया। इस यज्ञ के विधिविधान से सफलता पूर्वक संपन्न हो जाने पर उसके हविष्यभाग का सेवन करने के पश्चात उसके प्रभाव से सम्यक अवधि के पश्चात तीनों रानियों की गोद शिशु किलकारियों से गूंज उठी। कौशल्या के श्रीराम कैकेयी के भरत और सुमित्रा को लक्ष्मण और शत्रुघ्न हुए।अध्यात्म- शिखरस्पर्शी कतिपय संतों के अनुसार विष्णु जी कहीं भी शेष, शंख, चक्र के बिना नहीं चलते हैं, जहां भी चलते हैं इनसे सज्जित होकर ही। इनके तीनों अनुज भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न इन तीनों क्रमशः शंख, शेष, चक्र के मानवीय स्वरूप हैं। आधे अंश में श्रीराम और आधे में लक्ष्मण प्रभृति तीनों भ्राता हैं। (श्रीराम जन्मरहस्य, श्रीराम भक्ति अंक-पृ. सं. 13) भगवान शिव तो यहां तक कहते हैं कि भगवान श्रीराम का नाम संपूर्ण मंत्रों का बीजमूल हैं। उसके मेरे सर्वांग में प्रविष्ट हो जाने के कारण ही मुझे हलाहल विष, प्रलयानल ज्वाला या मृत्युमुख किसी से भी कंचित भय नही है- श्रीरामनामामृतमंत्रबीजं, संजीवनी चेनमसि प्रविष्टा:। हलाहलं वा प्रलयानलं वा मृत्योर्मुखं वा विशतां कुतोभीः।। (आनन्द रामायण, जन्मकाण्ड 6/43)
श्रीराम का जन्म गोवर्द्धन पीठ के शंकराचार्य श्री निश्चलानंद सरस्वती और अन्य संतों के अनुसार श्वेतवाराह कल्प के सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के चौबीसवें त्रेता युग में हुआ था जिसका उल्लेख भुसुण्डिरामायण, पद्मपुराण, हरिवंशपुराण, वायुपुराण, विचार पीयूष, सजीवनी रामायण में भी मिलता है। अंकों की गणना के अनुसार उनका जन्म आठ लाख अस्सी हजार एक सौ (880100) वर्ष पूर्व माना जाता है। अपने ‘वास्तव रामायण’ नामक ग्रंथ में प्रख्यात मराठी विद्वान एवं शोधकर्ता डा. पद्माकर विष्णुवर्तक ने इसी समय को उचित माना है। उन्होंने रामायण में उल्लिखित ग्रहस्थिति के अनुसार श्रीराम की जन्मतिथि आधुनिक कालगणना के अनुसार 04 दिसंबर 7323 ईसापूर्व को सुनिश्चित किया है। इसी तिथि को मध्याह्न एक बजकर तीस मिनट से तीन बजे के बीच श्रीराम का जन्म होना मानते हैं।परशुराम को श्रीराम का पूर्ववर्ती और कृष्ण को उत्तरवर्ती कहा जाता है।वैसे भी सामान्य रूप से श्रीराम को त्रेता युग तथा कृष्ण को द्वापर युग का युग पुरूष मानते हैं। वाल्मीकि रामायण में श्रीराम के जन्म की तिथि, ग्रह, नक्षत्रों का उल्लेख करते हुए महाकवि ने लिखा है कि-“……. ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ।।नक्षत्रे अदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पंचसु।ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह।। प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम्। कौसल्याजनयद् रामं दिव्यलक्षणसंयुक्तम्।।” 2 अर्थात बारहवें मास में चैत्र के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र एवं कर्क लग्न में पांच ग्रह जब उच्च स्थान पर थे और सूर्य मेषराशि पर थे तब कौसल्या ने दिव्य लक्षणों से युक्त, सर्वलोकवन्दित जगदीश्वर श्रीराम को जन्म दिया। लेकिन जहां पर वाल्मीकि जी ने बारहवें मास में राम का जन्म माना है वहीं पर अध्यात्म रामायण में सभी ग्रह नक्षत्रों की स्थिति समान बताते हुए दसवें मास में जन्म का उल्लेख मिलता है-“…..दशमे मासि कौसल्या सुषुवे पुत्रमद्भुतम्।। मधुमासे सिते पक्षे नवम्यां कर्कटे शुभे। पुनर्वस्ववृक्षसहिते उच्चस्थे ग्रहपंचके।। मेषं पूषणि संप्राप्ते पुष्पवृष्टिसमाकुले। आविरासीज्जगन्नाथःपरमात्मा सनातनः।।”3 राम का जीवन विस्तार कुल 11000 वर्षों का था- “भयं त्यजत भद्रं वो हितार्थे युधि रावणम्।……दशवर्षसहस्त्राणि दशवर्षशतानि च। यस्यामि मानुषे लोके पालयन् पृथिविमिमाम्।”4 उन्होंने स्वयं देवताओं को शुभाशीष देते हुए कहा कि मै ग्यारह हजार वर्षों तक इस पृथ्वी का पालन करता हुआ मनुष्यलोक में निवास करूँगा। श्रीराम ऐसे दिव्य-भव्य संपूर्ण ब्रह्माण्ड के पुण्यस्वरूप थे कि उनके जन्म के समय संपूर्ण आकाश दिव्य पुष्पों की वर्षा से जगमगा उठा। वे नीलकमलदल के समान श्यामवर्ण के पीताम्बर पहने हुए चार भुजाओं से युक्त थे। उनके नेत्र अरुणकमल के समान, कर्ण कांतिमान कुण्डलों से सुशोभित, हजारों सूर्यों के प्रकाश के समान प्रकाशित सिर प्रकाशमान मुकुट से सुशोभित, केश घुंघुराली अलकावलियों वाले थे। उनके मुखकमल पर हृदयस्थ अनुग्रहरूप चंद्रमा की शीतल पवित्र आभामय चन्द्रिका मुस्कानरूप में छिटक रही थी। कमलदल के समान विशाल करूण रसपूर्ण नेत्र,गला श्रीवत्स मणिमय हार, बैजयन्ती माल से सज्जित, बाहों में केयूर चरणों में नुपूर, चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म विराजमान थे। कौशल्या के उनके रूप स्वरूप पर अभिभूत होने और विस्फारित सजल नेत्रों से देखते हुए यह कहने पर कि हे विश्वात्मन्! आज मेरा परम सौभाग्य है कि मै आपके चरणकमलों का दर्शन कर रही हूँ। आपसे प्रार्थना है कि इस मनोहर मूर्ति के साथ मेरे हृदय में सदैव विराजमान रहें तथा प्राणियों में समान भाव से स्थित आप अपने इस अलौकिक रूप का उपसंहार कर बालरूप धारण कीजिए जिससे आपके सुखद आलिंगन और संभाषण इत्यादि से मैं घोर अज्ञान – तमस को पार कर सकूँ। तब मानव अवतार भगवान ने कहा- “हे माता! आप जो चाहती हैं, वैसा ही होगा। लेकिन इस अवतार के पीछे आपकी तपस्या के साथ ब्रह्मा भी कारक है क्योंकि उन्होंने भी अत्याचारी प्रवृतियों के जन्मदाता और केन्द्र रावणादि निशाचरों का संहार कर पृथ्वी का भार उतारने के लिए प्रार्थना की थी- “अहं तु ब्रह्मणा पूर्वं भूमेर्भारापनुपत्तये। प्रार्थितो रावणं हन्तुं मानुषत्वमुपागतः।।”5 मध्यकालीन संत गोस्वामी तुलसीदास श्रीराम के पावन चरित से इतने अभिभूत थे कि उनके जन्म के समय के रूप स्वरूप का वर्णन करते हुए लिखते हैं – “भये प्रकट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप विचारी।।लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी। भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी।।” 6 यही नही तुलसीदास भी श्रीराम के जन्म का उद्देश्य बताते हुए कहते हैं –“बिप्र धेनु सुर संत हित लिन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।।”7 अर्थात भगवान ने ब्राह्मण, गौ, देवता और संतों के हित के लिए मनुष्य के रूप में अवतार लिया है। उनका दिव्य शरीर किसी कर्मबन्धन के त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थों से नहीं बना। वे अज्ञानमयी, मलिना माया तथा उसके तीनों गुणों सत, रज तम से परे हैं। श्री महाराज दशरथ के चारों पुत्र शील, रूप, गुण के आगार हैं लेकिन इनमें से भी श्रीराम सभी प्रकार से सबसे अधिक सुख देने वाले हैं। “चारिउ सील रूप गुन धामा। तदपि अधिक सुखसागर रामा।।”8 श्रीराम सर्वगुण संपन्न थे। वाल्मीकि रामायण में उनको क्षमया पृथिवीसमः -पृथ्वी के समान क्षमावान, धैर्येण हिमवान इव -हिमालय के समान धैर्यवान, समुद्र इव गाम्भीर्येः-समुद्र के समान गंभीर, सदा एकप्रियदर्शनः – सभी परिस्थितियों में प्रिय दिखने वाले, वाग्मी- सुन्दर वाणी बोलने वाले, बुद्धिमान नीतिमान, श्रीमान-शोभा, कान्ति, लक्ष्मी आदि श्रियों से संपन्न,समः- सुख-दुःख में समान आचरण वाले,द्युतिमान -तेजकान्ति- दीप्ति वाले जिसको देखकर कामदेव भी लज्जित हो जाते हैं। वाल्मीकि रामायण में श्रीराम को शरीर सौष्ठव की दृष्टि से विपुलांस -विशाल एवं चौडे कन्धे वाले,अजानबाहु- विशाल भुजाओं वाले जो सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार दिव्य, प्रतिभावान पुरुष के लक्षण हैं, कम्बुग्रीव- शंख के समान गर्दन वाले, महोरस्कः- चौडे वक्षस्थल वाले, सुललाटः- सामुद्रिक शास्त्र में तीन रेखाओं वाला उन्नत ललाट महापुरुषों का लक्षण बताया गया है, सुविक्रमः-पराक्रमी दुष्ट संहारक, स्निग्धवर्णः, महाहनुः – दिव्यपुरुष के गौरव की प्रतीक विशाल ठुड्ढी वाले, पीनवक्षाः- हृष्टपुष्ट छाती वाले, सुशिराः-सुन्दर शिराओं(मशल्स) वाले, सम विभक्तांगः कहा गया है। वैशेषिक दर्शन में 24 गुण माने गए हैं- रुप, रस, गंध, स्पर्श, संख्या, परिमाण आदि। श्रीराम इन सभी चौबीस उत्तम गुणों से संपन्न हैं, परिपूर्ण हैं –“स च सर्वगुणोपेतः”। वाल्मीकि जी ने एक प्रसंग में नारद मुनि से प्रश्न किया कि “को अन्वस्मिन सांप्रतं लोके गुणवान कश्च वीर्यवान ×××××××××× आत्मवान को जितक्रोधो द्युतिमान को अनसूयकः। कस्य बिभ्याति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे।।” अर्थात वह कौन मनुष्य है जो गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी और दृढव्रत होने के साथ साथ सदाचार से युक्त, जो सब प्राणियों का हितकारक, विद्वान, समर्थ तथा प्रियदर्शन हो। वाल्मिकी जी के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए नारद मुनि कहते हैं-इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न राम मे ये सभी गुण विद्यमान हैं।
अयोध्या में रजक के प्रश्न करने पर लोकमर्यादा की रक्षा हेतु तथा उसके संशय के निवारण हेतु राजा श्रीराम के आदेशानुसार सीता को जब लक्ष्मण वन में छोड़कर आए तो सीता ने वाल्मीकि जी के ही आश्रम में आश्रय लिया और वहीं पर लव और कुश दोनों कुमारों का जन्म हुआ तथा पालन पोषण भी वहीं हुआ, उन दोनों की शास्त्र-शस्त्र,ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा-दीक्षा सब उन्हीं की देखरेख अर्थात संरक्षण में संपन्न हुई थी। इससे तो यह पूर्णतया सिद्ध है कि वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे और श्रीराम के जीवनकाल में ही वाल्मिकी ने रामकथाधारित रामायण नामक आदिकाव्य की रचना संपन्न की थी।
धरती पर चक्रवर्ती सम्राट दशरथ और भारतीय आदर्श नारी के सभी गुणों से संपन्न कौशल्या के सुत रूप में अवतरित होते ही सभी देवी- देवताओं, ऋषि- मुनियों, संतो- तपस्वियों को पता चल गया था कि शेषशायी भगवान विष्णु अयोध्यानरेश के ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम के रूप में जन्म ले चुके हैं। सभी के मन में दर्शनार्थ उत्सुकता और प्यास बढती ही जा रही थी। इस संबंध में शंकर जी सबसे आगे रहते हैं। उन्होंने स्वयं पार्वती जी से चर्चा करते हुए बहुत ही सहजता के साथ यह बात बताई कि प्रभु के दर्शन के लिए मानव रूप में भेष बदलकर वे एक बार बृद्ध आगमी (ज्योतिषी) का रूप धारण कर साथ में कागभुसुण्डि को बालक का रूप देकर साथ में अयोध्या के राजमहल में प्रवेश कर गए और कौशल्या उनकी विद्वता से प्रभावित होकर श्रीराम को उनके गोद में बैठा दी और तन्मयता के साथ हमने उनके अंग- प्रत्यंग को निर्निमेष नेत्रों से निहारते हुए आनन्दपान किया- कागभुसुण्डि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ।।9 (अवध आजु आगमी एक आयो ××× बुढो बडो प्रमानिक ब्राह्मण संकर नाम सुहायो)। इसी प्रकार पूर्व में राजर्षि कहलाने वाले वर्तमान में ब्रह्मर्षि गाधिपुत्र विश्वामित्र के मन भी श्रीराम के दर्शन की तितिक्षा जागृत हुई और यज्ञ, हवन-पूजन में बाधा डालने वाले राक्षसों से मुक्ति पाने के बहाने कुछ दिन तक उनकी संगति का परमसुख प्राप्त करने और श्रीराम जन्म हेतु को चरितार्थ कराने के लिए धर्मात्मा राजा दशरथ के महल में उनको लेने पहुंच गए। मनस्वी नरेश ने महामुनि का स्वागत सत्कार करते हुए उनके सभी आज्ञाओं का पालन का वचन देते हुए निवेदन के साथ उनके आगमन के उद्देश्य को जानने की उत्सुकता व्यक्त की- कर्ता चाहमशेषेण दैवतं हि भवान् मम (वाल्मीकि रामायण)।राजा की जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा कि- असुर समूह सतावहिं मोही। मैं जाचन आयउँ नृप तोही।। अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा।। विश्वामित्र की इस बात को सुनकर उनका हृदय काँपने लगा और अप्रत्याशित मांग को सुनकर उनके मुखमण्डल की आभा ही विलुप्त हो गई। उन्होंने कहा “आप पृथ्वी, गौ, धन और खजाना जितना मांगिए दे सकता हूँ लेकिन प्राण के समान प्रिय हैं किसी को,उनमें भी राम को तो कदापि आपके साथ नहीं भेज सकता।” अंततः कुलगरु वशिष्ठ के द्वारा भविष्य के रहस्य को उद्घाटित करने पर महाराज दशरथ राम और लक्ष्मण को उनके साथ भेजने के लिए तैयार हुए। विश्वामित्र उन दोनों महानिधियों को साथ लेकर चल दिए। रास्ते में ही मुनि का संकेत पाकर राम ने समीप आती हुई ताडका नामक राक्षसी का वध किया। उनकी अद्भुत वीरता से प्रसन्न होकर तथा सुयोग्य पात्र देखकर ‘बला’ और ‘अबला’ (जिनसे न भूख लगती है न प्यास, साथ ही शरीर में अतुलित तेज और बल का समावेश हो जाता है।) नामक अद्भुत विद्याएं दी और अपने सारे दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को राम को सौंप दिया। उसी यात्रा में राम ने यज्ञ में बाधा डालने का प्रयास करने वाले राक्षस मारीच को जहाँ बिना फल वाले बाण का संधानकर सौ योजन दूर समुद्र के उस पार ढकेल दिया वहीं सुबाहु का अग्निबाण से वध कर दिया। इन दोनों घटनाओं से राम का अद्भुत वीरत्व प्रकट हुआ। साथ ही मुनि के मन में दोनों भाईयों के प्रति अटूट स्नेह भी पैदा हो गया और उन्हें पक्का विश्वास हो गया कि ये साधारण राजकुमार न होकर दैवस्वरूप भगवान विष्णु के साक्षात् अवतार हैं। उसके पश्चात आगे बढते हुए रास्ते में सुनसान पडे गौतम श्रृषि के आश्रम में उन्हीं के द्वारा श्रापित शिलारूपा अहिल्या का उद्धार कराकर मिथिला की तरफ विश्वामित्र विशिष्ट दोनों राजकमारों सहित प्रस्थान किए। जब दोनों भाई गुरु की आज्ञा से नगर देखने जाते हैं तो सारे नगरवासी इनकी सुन्दरता में निमग्न हो जाते। युवतियाँ लोकलज्जा के कारण बाहर न निकलकर अपने- अपने घरों के झरोखों से इनको विस्फारित नेत्रों से देखने लगती हैं और इनकी सुन्दरता का बखान करते हुए कह उठतीं हैं- बय किसोर सुषमा सदन स्याम गौर सुख धाम। अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत काम।।10 श्रीराम की मनोहारी छवि के बारे में ऐसा वर्णन मिलता है कि कठोर स्वभाव एवं अपने कोप के लिए विख्यात जब दुर्धर्ष वीर परशुराम ने जब श्रीराम को प्रथम बार देखा तो सबकुछ भूलकर उनके परम सौन्दर्य में ऐसे खो गए कि वे निर्निमेष नेत्रों से अपलक देखते ही रहे। एक जगह ऐसा भी प्रसंग आता है कि युद्ध में राक्षस खरदूषण की सेना के समक्ष जब श्रीराम आए तो उसकी सेना के सभी योद्धा उनके अमित सौंदर्य को देखकर अस्त्र- शस्त्र चलाना ही भूल गये। इस घटना से अचंभित होते हुए उस दल के नेता को स्वीकार करना पडा कि अपने जीवन में आज तक हमने ऐसा सौंदर्य कहीं देखा ही नही है वह साथियों से कहता है- “ “यद्यपि भगिनी कीन्ह कुरुपा। बध लायक नहि पुरुष अनूपा।।” इसीलिए वाल्मीकि का यह कहना “रामो विग्रहवान धर्मः” रंचमात्र भी अतिशयोक्त नही है।
जनकपुर में स्वयंबर प्रकरण में देवों के देव महादेव के पिनाक के श्रीराम के द्वारा भंग किए जाने पर बज्रपात के समान भयंकर ध्वनि होने से जब संपूर्ण पृथ्वी भूकम्प जैसी स्थिति में डोलने लगी, “चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले” (रा.च. मा. पृ. 207) शेष, वाराह, कच्छप कलमला उठे तो परशुराम स्वयंबर उत्सव में उपस्थित होकर क्रोधाग्नि से सबको दहकाने लगे और क्रोध में ही धनुष भंग करने वाले को सहस्त्रबाहु जैसा राक्षस बताने लगे तब भी लक्ष्मण भले ही क्रोधित हो गए लेकिन श्रीराम अपने को दास बताते हुए शान्त भाव से उनकी आज्ञा के बारे पूछ रहे थे। इसी तरह जब राज्याभिषेक के स्थान पर उनके लिए 14 वर्ष के वनवास की घोषणा पिता द्वारा की गई तब भी लक्ष्मण को ही भयंकर क्रोध (लक्ष्मण परमक्रुद्धः) आया, वे शांत भाव से बदलती हुई परिस्थितियों के साक्षी बने रहे। श्रीराम तेजस्वी, सर्वज्ञाता महात्मा की भांति अविकारी भाव से सब त्यागकर वन जाने के लिए उत्सुक दिखाई दे रहे थे और शान्त भाव से कहने लगे – “पिता दिन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड काजू।।” यही नही बहुत ही विनम्र भाव से माता से निवेदन करते हैं-“आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता।।” माता कौशल्या को समझाते हुए कहते हैं कि हे माता मेरे स्नेहवश कभी डरना नहीं, वहां आप के आशीर्वाद से सब आनन्द ही आनन्द होगा –“जनि सनेह बस डरपस भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें।।” 11 वे सबको सम्मान देते थे और ऐसा व्यवहार करते थे कि गुरु, माता- पिता के साथ- साथ सभी सेवक- सेविकाएं भी उनसे अति प्रसन्न रहते थे। उनके वन जाने की सूचना पाते ही सभी आर्तनाद करते हुए महाराज को ऐसे असंगत निर्णय लेने के लिए कोसने लगे –“अबुद्धिर्बत नो राजा जीवलोकं चरत्ययम्। यो गतिं सर्वभूतानां परित्यजति राघवम्।।” 12 कैकेयी की परमप्रिय कुल की माननीया स्त्रियां भी उनके इस आचरण पर प्रश्न उठाने लगीं- “भरत न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जग जाना।।…. केहि अपराध आजु बनु देहू।।”13 यही नही अद्भुत धैर्य के साथ प्रसन्नमना मां का चरण स्पर्श करते हुए वन जाने का आशीर्वाद लिया। वन में पहुंचकर अंतिम जन के प्रतीक निषादराज और केवट से श्रीराम ने जैसा मित्रवत व्यवहार किया वैसा विनम्र, सौम्य व्यवहार कौशल्य संपूर्ण सनातन साहित्य के किसी अन्य नायक के चरित्र में नही दिखाई देता। उनके संपूर्ण जीवन का एक भी ऐसा प्रसंग नहीं मिलता जहां वे मर्यादा से रंचमात्र भी विचलित दिखाई देते हो, प्रतिपल वे सर्वोच्चकोटि के मानव के उत्कृष्ट आचरण का पालन करते हुए दिखाई देतें हैं। वन के दुःसह्य कष्टों से आकुल – व्याकुल हुए बिना उनको भी जीवन का अभिन्न अंग मानकर अद्भुत साहस – पराक्रम के साथ आगे बढते रहतें हैं।आगे बढते हुए श्रीराम जहां काम- क्रोध, इर्ष्या- द्वेष, मद-मत्सर से दूर वाणी- हिंसा से भी निर्मुक्त यति- मुनियों, साधु- सन्यासियों के यज्ञ- हवन,तप -जप में बाधा उत्पन्न करने वाले राक्षसों और आसुरी वृत्तियों का मान मर्दन करते हुए उनका संहार कर अखण्ड यशस्वी और विजेता होने के फलीभूत होने वाले आशीर्वाद को लेते चलते हैं वहीं पर नारद जैसे महामुनियों के मोह के वशीभूत हो शक्तियों का दुरूपयोग करने वाले विभ्रम, मोह को दूरकर यह संदेश भी देते हुए चलते है कि- “बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ वेद पुराना।। दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहि कुमारग पाऊ।।”14 अर्थात जो भी वैराग्य, विवेक, विनय, परम तत्व और वेद पुराण का यथार्थ ज्ञान रखता है वे दंभ, अभिमान और मद नहीं करते हैं तथा कुमार्ग पर पैर भी नहीं रखते हैं।इस समय तक कपटी दशानन सीता का अपहरण कर चुका होता है। सीता के हरण के पश्चात भी उन्होंने क्रोध में अनुचित मार्ग नही अपनाया। यदि राम चाहते तो उसी समय रावण का उसके संपूर्ण कुल सहित विनाश कर सकते थे।लेकिन श्रीराम अपने दुःख में न डूबकर साहस के साथ आगे बढते हुए जन- जन का कल्याण करते हुए सीता की खोज के लिए युक्ति और उपाय के संवाहक हनुमान सहित सुग्रीव को भी ढूंढ लेते हैं और अपने वीरमय आचरण से बालि के त्रास से कंपित, डरे हुए सुग्रीव को प्रभावित कर यह कहकर मित्रता करने के लिए सीता खोज का उपाय करने के लिए – “कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा।। सब प्रकार करिहऊँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई।।”-विवश कर देते हैं। श्रीराम इतने महावीर और धनुष विद्या- विज्ञान में पारंगत थे कि उनका एक बाण ही एक साथ सात- सात साल वृक्षों को छेदता हुआ पर्वत तथा पृथ्वी के सातों तलों को पारकर सीधे पाताललोक में पहुंच गया- “स विसृष्टो बलवता बाणः स्वर्णपरिष्कृतः। भित्वा सालान् गिरिप्रस्थं सप्तभूमिं विवेशः।।”15 इस घटना से पहले जहां रावण के प्रहार से पंखहीन क्षत -विक्षत घायल गिद्धराज का उद्धार किया वहीं पर सुग्रीव से मिलने के पश्चात बालि का वध कर संपूर्ण किष्किंधा का राज्य उनको सौंपकर भयमुक्त किया। जहां सुग्रीव के द्वारा राज्य पाकर सीता – खोज कार्य से विरत दिखाई देने पर उनको भयभीत कर प्रतिज्ञा को याद दिलाना, विभीषण को संदेह किए बिना आश्रय देना, उनके माध्यम से रावण के अमर होने के साथ- साथ अन्य गुप्त रहस्यों को जानने आदि घटनाएं श्रीराम की अभूतपूर्व वीरता सिद्ध करती हैं वहीं पर उनके कुशल नीतिज्ञ होने का भी प्रमाण देती हैं। श्रीराम अद्भुत गुणों के भण्डार थे। उनको न पद का लोभ न राज्य के विस्तार का लोभ, न ही शासन करने की ललक थी। वे प्रतिपल अपने जन्म लेने के, मनुष्य होने के उत्तरदायित्वों के प्रति कटिबद्ध, प्रतिबद्ध और उन्हीं को पूर्णता प्रदान करने में रत दिखाई देते हैं। संपूर्ण आततायियों सहित राक्षसकुल का सर्वनाश कर लंका महाविजय के पश्चात भी शान्त, निराभिमानी, निश्छल ममत्व से परिपूर्ण दिखाई देते हैं। श्रीराम केवल अपनी माताओं, गुरुमाताओं का ही सम्मान नहीं करते अपितु संपूर्ण नारी जाति के प्रति उनके अंतरमन में सदभावना थी। वे सदैव उनके साथ सम्मानजनक आदर का भाव रखते हैं। चाहे अहिल्या हों या शबरी, तारा हो या मंदोदरी सबके प्रति उनके मन में सद्भाव था। जब वे अपने- अपने पतियों बाली और रावण के वध के पश्चात् उनके सामने उपस्थित होती हैं तो सम्मान के साथ उनको समझाते हुए उपदेश देते हुए ही दिखाई देते हैं। जब तारा अपने पति के समीप बैठकर विलाप करती हुई आमरण अनशन करने की बात करती है-….. “तारा करुणं रुदन्ती भर्तुः समीपे सह वानरीभिः। व्यवस्यत प्रायमनिन्द्यवर्णा उपोपवेष्टुं भुवि यत्र वाली।।”16 तब उसे समझाते हुए श्रीराम कहते हैं हे देवि !-“छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।। प्रगट सो तनु तव आगे सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा।।” पंच तत्वों से निर्मित यह शरीर अधम है। जिसके लिए हे देवी ! तुम विलाप कर रही हो वह तो तुम्हारे सामने ही पडा हुआ है। जीव नित्य है। श्रीराम के द्वारा कही हुई ज्ञानमय बातें सुनकर उनका चरण पकडकर वह भगवान श्रीराम से भक्ति का वर मांगने लगी। जिस तरह से बाली का वध कर तारा को समझाते हुए बाली पुत्र अंगद को युवराज और सुग्रीव को किष्किंधा का संपूर्ण राज्य सौंप दिया, उसी तरह से राम ने अन्याय के प्रतीक रावण का उसके सगे- संबंधियों सहित संपूर्ण राक्षस कुल का विनाश कर मंदोदरी को पट्टमहिषी बनाकर और विभीषण को लंका का राज्य सौंपकर निराहंकारी भाव से अयोध्या लौट आए। रावणादि राक्षसों के वध के माध्यम से जन जन को यह संदेश भी दिया कि अन्याय, अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो सत्य तथा धर्म के आगे टिक नही सकते। समय लग सकता है लेकिन धैर्य, सत्य, सुनीति और साहस को साथ लेकर चलते रहेंगे, लडते रहेंगे तो अन्ततः विजय सत्य की ही होगी। उन्होंने अपने राज्यकाल में सदैव सत्य और न्याय को ही प्राथमिकता पर रखा है। उनका रामराज्य एक ऐसे आदर्श शासन का प्रतीक है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति सुखी और सुरक्षित था। उन्होंने एक सर्वगुण संपन्न, प्रजावत्सल के रूप में आमजन के हितों को ही सर्वोपरि रखा। राम सत्याग्रही भी हैं और शस्त्रग्रही भी। उनके जीवन में दोनों का अद्भुत संतुलन है। आवश्यकतानुसार दोनों का आजीवन प्रयोग करते हुए मिलते हैं। “रघुकुलतिलक श्रीराम के अखण्ड साम्राज्य में सर्वत्र सुख- शान्ति की अजस्रधारा प्रवहमान थी। संपूर्ण प्रजा धनजन,समृद्धि से संपन्न थी।”
राम के दो रूप समानान्तर हमारे समक्ष सदैव विद्यमान है पहला मनुष्य रूप अर्थात मानव लीलाधर राम, पुरूषोत्तम राम दूसरा परब्रह्म राम जिसके संबंध गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि “रामनाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार। तुलसी भीतर बाहरेहुँ जौ चाहसि उजियार।।” एक अन्य स्थान पर इसी स्वरूप के विषय में कहा गया है- “सौन्दर्यसार सर्वस्वं माधुर्य बृंहितम्। ब्रह्मैकद्वितीयं तत् तत्त्वमेकं द्विधा कृतम्।।” ब्रह्मलीन स्वामी करपात्री जी के शब्दों में “श्रीराम अनन्तकोटि ब्रह्मांडों के अधिष्ठान स्वप्रकाश परब्रह्म स्वरूप हैं। वे ही सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि बाह्य ज्योतियों तथा श्रोत्र, नेत्र, मन, बुद्धि, चित्त, जीव, दैव आदि आन्तर ज्योतियों के भी ज्योति हैं।” राम के मानव स्वरूप को उद्घाटित करते हुए परम रामभक्त श्रद्धेय स्वर्गीय हनुमान प्रसाद पोद्दार जी का यह कथन –“राम का जीवन त्यागमय जीवन है, राम सबका आदर करते हैं इसीलिए वे बडे हैं ××× राम जो करते हैं दूसरों के लिए करते हैं, मेरे कारण किसी को क्लेश नहीं हो इसका वे सदा ध्यान रखते हैं।” अक्षरशः सत्य है। राम के जीवन की गाथा मनुष्य के जीवन की मंत्रकथा है “मंत्रो विजयमूलं हि संज्ञाभवति राघवः।” वर्तमान में जो भी प्राणी राम के जीवन का संपूर्णता में मनसा, वाचा, कर्मणा और तन से अनुगमन करते हुए जीवन को चरितार्थ करेगा यश – कीर्ति, सुख- समृद्धि,शान्ति-सौम्यता सबके सब स्वयं चलकर उसके पास आयेंगे, किसी की बाट खोजने की आवश्यकता ही नही पडेगी।
संदर्भ सूची-
1- हिन्दी विश्वकोश पृ. 97 राम प्रसाद त्रिपाठी, नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी।
2- श्लोक सं-8,9,10 पृ. 68 18वां सर्ग बालकाण्ड वाल्मिकी रामायण।
3- श्लोक सं-13,14, 15 पृ. 23 तृतीय सर्ग बालकाण्ड, अध्यात्म रामायण।
4- श्लोक सं-28,29 पृ. 62 पन्द्रहवां सर्ग वाल्मीकि रामायण।
5- श्लोक सं-31 पृ. 24 तृतीय सर्ग बालकाण्ड अध्यात्म रामायण।
6- दोहा सं 191 छंद-1पृ. सं. 154 बालकाण्ड रामचरित मानस रामायण।
7- दोहा सं 192 पृ. सं. 155
8- दोहा सं197 चौपाई सं 3 पृ. सं. 159 वही।
9- दोहा सं 195 चौपाई सं. 2पृ. सं. 158 वही।
10- दोहा सं. 220पृ. सं 177 वही।
11- दोहा सं. 52 चौपाई सं. 4 पृ. सं. 327अयोध्याकाण्ड रामचरित मानस।
12- श्लोक सं. 5 पृ. सं. 243 बीसवां सर्ग अयोध्याकाण्ड वाल्मीकि रामायण।
13- दोहा सं. 4चौपाई 3 पृ. सं. 323 अयोध्याकाण्ड रामचरित मानस।
14- दोहा सं. 45 चौ. 3पृ. सं. 583 अरण्यकाण्ड वही।
15- श्लोक सं. 4 पृ. सं. 705 बारहवां सर्ग किष्किंधाकाण्ड वाल्मिकी रामायण।
16- श्लोक सं. 26 पृ. सं. 729 बीसवां सर्ग वही।
डॉ. जयशंकर राय
लखनऊ
संपर्क सूत्र- 6394192 621
