साहित्य का उद्देश्य सिर्फ घटनाओं का वृत्तांत प्रस्तुत कर समाज का चित्रण करना ही नहीं होता, अपितु मनुष्य के भीतर अचेतन संवेदनाओं को जागृत करना भी होता है। जो साहित्य समय के साथ अपना अर्थ खो दे, वह इतिहास का विषय बन सकता है, किंतु जो प्रत्येक युग में मनुष्य को अपने भीतर झाँकने के लिए विवश करे, वही कालजयी कहलाता है। पंडित चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ जिनका जन्म 7 जुलाई, 1883 को हुआ था, हिन्दी साहित्य के प्रख्यात साहित्यकार थे। हिन्दी साहित्य के ऐसे विरल रचनाकार हैं, जिनकी रचनाएं विचारों की दृष्टि से अत्यंत व्यापक और जीवनमूल्यों की दृष्टि से अनुपम हैं। उन्होंने मनुष्य को किसी आदर्श प्रतिमा के रूप में नहीं, अपितु उसकी समस्त दुर्बलताओं, संभावनाओं और नैतिक संघर्षों के साथ देखा। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में उपदेश कम और जीवन का सत्य अधिक दिखाई देता है। उनके साहित्य को ध्यान से पढ़ने पर अनुभव होता है कि यदि प्रेम स्वार्थ से मुक्त हो जाए तो वह त्याग बन जाता है, यदि जिज्ञासा भय से मुक्त हो जाए तो वह ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करती है, और यदि विवेक आडंबर से मुक्त हो जाए तो वह मनुष्य को सच्ची आस्था तक पहुँचा देता है। उनकी प्रसिद्ध कहानी “उसने कहा था” तथा निबंध “बच्चा बच गया” और “घड़ी के पुर्ज़े” तीनों ही उत्कृष्ट साहित्य प्रतीत होते हैं।
हिन्दी कहानी के इतिहास में “उसने कहा था” का महत्त्व केवल इस कारण नहीं है कि उसे आधुनिक कहानी की आधारशिला माना जाता है, बल्कि इसलिए भी कि उसने प्रेम को बाहरी आकर्षण से निकालकर आत्मिक गरिमा प्रदान की। ‘उसने कहा था’ कहानी का शीर्षक ही मन में कई प्रश्न उत्पन्न करता है जैसे किसने कहा था? क्या कहा था? और किस से कहा था? ये प्रश्न पाठक के मन में जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं जिनके कारण वह कहानी के प्रारंभ से लेकर अंत तक बंधा रहता है। कहानी के जो कथानक और देशकाल परिस्थिति की बात की जाए तो इसके कथानक को तीन भागों में बांटा गया है। कथानक का प्रारंभिक भाग लहनासिंह के बचपन को लेकर चला है, जिसमें उसका परिचय एक सिक्ख बालिका से होता है और बाल स्नेह का सहज अंकुर उसके हृदय में फूटता है। कथानक के दूसरे भाग या मध्य भाग में लहनासिंह सूबेदारनी से भेंट होने और उसके पति और पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए कहने पर मन ही मन अपने कर्त्तव्य का संकल्प करता है। इसके बाद कथानक का तीसरा भाग युद्ध क्षेत्र में घटता है, जहाँ लहनासिंह अपनी चतुरता से जर्मन लैफ्टिनेन्ट को समाप्त कर देता है और सिक्ख रेजिमेन्ट को बचाता है। सूबेदारनी के पुत्र बोधासिंह और पति हजारासिंह की रक्षा करता है और इस प्रकार अपने प्राण देकर सूबेदारनी के कहे वचन का पालन करता है। रोचक बात यह है कि कहानी के दूसरे भाग में वह वचन के पालन करते हुए दिखाया जाता है किन्तु वचन क्या था वह तीसरे भाग में ही पता चलता है जब वह मृत्यु शय्या पर स्मृतियों में खो जाता है। यह कहानी प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान की है अर्थात 1914-15 के आस पास का मान सकते हैं और कहानी के संवादों से पता चलता है कि यह कहानी अमृतसर की है। कहानी में देश और काल के बीच घटित होने वाले चित्र हमारे सामने इस प्रकार रखे हैं कि मानो वे हमारी आँखों के सामने ही दिखाई दे रहे हों। अमृतसर के ताँगे वालों का चित्रण, फ्रांस और बेल्जियम की युद्ध-भूमि, खाई, खन्दक वहाँ की कड़ाके की सर्दी सभी कुछ का वर्णन बड़ा यथार्थ और सजीव है। इस कहानी का नायक लहना सिंह प्रेम को अधिकार के रूप में नहीं, उत्तरदायित्व का रूप मानता है। उसके जीवन का सबसे बड़ा सत्य वह वचन है, जो बाल्यकाल की सहज बातचीत में जन्म लेता है। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, जीवन युद्धभूमि तक पहुँच जाता है, पर वह एक वाक्य उसके भीतर दीपक की लौ की तरह जलता रहता है।
लहना सिंह का प्रेम भारतीय सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधि प्रेम है। वह प्रिय को पाने की उत्कंठा से अधिक उसके विश्वास को निभाने की चिंता करता है। यही कारण है कि जब उसे अपने जीवन और अपने वचन में से किसी एक को चुनना पड़ता है, तो वह बिना किसी द्वंद्व के अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देता है। उसके लिए प्रेम स्मृतियों का संग्रह नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का निर्वाह है। इस प्रकार कहानी यह स्थापित करती है कि प्रेम का सर्वोच्च रूप अधिकार में नहीं, बल्कि समर्पण में निहित है। पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी यहाँ बलिदान का महिमामंडन नहीं करते, बल्कि यह दिखाते हैं कि सच्चा बलिदान कभी प्रदर्शन नहीं करता। बिन कुछ कहे बिन जताए लहना सिंह अपनी अंतिम श्वास तक अपना वचन निभाने का प्रयास करता है। लहना सिंह का चरित्र मौन नैतिकता का प्रतीक है, उसकी वीरता युद्ध जीतने में नहीं, बल्कि अपने भीतर के मनुष्य को जीवित रखने में है।
आज के समय में जब प्रेम का अर्थ प्रायः अधिकार और तात्कालिक आकर्षण तक सीमित होता जा रहा है, “उसने कहा था” हमें स्मरण कराती है कि प्रेम का वास्तविक सौंदर्य पाने में नहीं, निभाने में है। विश्वास की रक्षा, वचन की गरिमा और दूसरे के सुख के लिए स्वयं का त्याग, यही इस कहानी की मूल संवेदना है। इसी कारण यह कहानी एक युग विशेष की कथा न होकर प्रत्येक युग की आवश्यकता बन जाती है।
पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी की विशेषता यह है कि वे मनुष्य के भीतर प्रेम का दीप जलाकर वहीं नहीं रुकते। वे जानते हैं कि केवल प्रेम ही पर्याप्त नहीं है; प्रेम को जीवित रखने के लिए मनुष्य के भीतर निष्कपटता और जिज्ञासा भी बची रहनी चाहिए। यही विचार उनकी दूसरी महत्त्वपूर्ण रचना “बच्चा बच गया” में नए रूप में विकसित होता है। “बच्चा बच गया” में प्रवेश करते ही गुलेरी की लेखनी का स्वर बदल जाता है। यहाँ वे युद्धभूमि के वीरत्व का नहीं, जीवन की सहजता का आख्यान रचते हैं। यह निबंध केवल एक बालक की कथा नहीं है, बल्कि उस बालमन की रक्षा का घोष है, जिसे समाज, शिक्षा और कृत्रिम संस्कार अनेक बार अनजाने में नष्ट कर देते हैं। लेखक का व्यंग्य शिक्षा पर नहीं, बल्कि उस शिक्षा पर है जो बालक को प्रश्न पूछने से पहले उत्तर रटाना सिखाती है, जो उसकी कल्पना को अनुशासन के नाम पर बाँध देती है और उसकी सहज हँसी को मर्यादा के बोझ तले दबा देती है। बालक निर्मल अवस्था का प्रतीक है। बालक के भीतर छल नहीं होता, प्रदर्शन नहीं होता, गणित नहीं होता। उसकी दुनिया विश्वास, कौतूहल और सहज इच्छाओं से बनी होती है। लेखक इसी सहजता को बचाए रखना चाहता है, क्योंकि वही आगे चलकर मनुष्य को संवेदनशील और सृजनशील बनाती है। निबंध का अंतिम प्रसंग अत्यंत अर्थपूर्ण है। अनेक घटनाओं के बाद जब इनाम के रूप में बालक सहज भाव से लड्डू माँग बैठता है, तब लेखक के मुख से जैसे अनायास निकल पड़ता है, “बच्चा बच गया।” यह केवल मिठाई की माँग नहीं है। यह उस निष्कपट मन की घोषणा है जिसे संस्कारों की कठोरता, बड़ों की औपचारिकता और शिक्षा की कृत्रिमता भी समाप्त नहीं कर सकी। यदि वह लड्डू माँग रहा है, तो इसका अर्थ है कि उसके भीतर अभी भी इच्छाएँ निष्कलुष हैं, जिज्ञासा जीवित है और जीवन के प्रति सहज आकर्षण बना हुआ है, उसका बालमन जीवित है। गुलेरी इस छोटे-से प्रसंग के माध्यम से अत्यंत बड़ा सत्य उद्घाटित करते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य बालक को समय से पहले बड़ा बना देना नहीं, बल्कि उसे एक अच्छा मनुष्य बनने तक उसका बचपन सुरक्षित रखना है।
यहीं से गुलेरी की साहित्य-दृष्टि एक नया आयाम ग्रहण करती है। जो लेखक बालक की सहज जिज्ञासा की रक्षा करना चाहता है, वही आगे चलकर मनुष्य के विवेक की रक्षा का भी पक्षधर बन जाता है। यही विचार उनके प्रसिद्ध निबंध “घड़ी के पुर्ज़े” में अपने सबसे प्रखर रूप में सामने आता है। “घड़ी के पुर्ज़े” वस्तुतः धार्मिक पाखंड से अधिक उस मानसिकता पर व्यंग्य है, जो धर्म को कुछ लोगों की निजी जागीर मानती है। लेखक उस तर्क का विरोध करते हैं जिसके अनुसार सामान्य मनुष्य को केवल धर्माचार्यों की बात माननी चाहिए, पर धर्म के रहस्यों को जानने या उन पर प्रश्न करने का अधिकार नहीं है। इस मानसिकता को स्पष्ट करने के लिए वे घड़ी का अत्यंत प्रभावशाली रूपक प्रस्तुत करते हैं। यदि कोई मनुष्य घड़ी देखकर समय जान सकता है, यदि कोई घड़ीसाज़ उसके पुर्ज़ों को खोलकर समझ सकता है, तो धर्म को समझने और उसके सिद्धांतों पर विचार करने का अधिकार केवल कुछ विशेष व्यक्तियों तक सीमित क्यों हो? क्या जिज्ञासा केवल इसलिए अपराध बन जाती है कि उसका संबंध धर्म से है? गुलेरी का यह प्रश्न केवल धर्माचार्यों से नहीं, बल्कि हर उस व्यवस्था से है जो विचार के स्थान पर अंधानुकरण की अपेक्षा करती है।
चंद्रधर शर्मा गुलेरी यहाँ धर्म का खंडन नहीं करते, वे धर्म के नाम पर विवेक का प्रयोग न करने का विरोध करते हैं। उनके अनुसार श्रद्धा तब तक सार्थक है, जब तक वह तर्क से भयभीत नहीं होती। जिस सत्य को प्रश्नों से खतरा हो, वह सत्य नहीं, केवल आग्रह हो सकता है। इसलिए वे पाठक को यह विश्वास दिलाते हैं कि जिज्ञासा आस्था की शत्रु नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी सहचरी है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि “बच्चा बच गया” और “घड़ी के पुर्ज़े” वस्तुतः एक ही विचार के दो रूप हैं। पहले निबंध में लेखक बालक की सहज जिज्ञासा को बचाने की बात करते हैं, दूसरे में उसी जिज्ञासा को वयस्क मनुष्य का अधिकार घोषित करते हैं। यदि बचपन में प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति मर जाएगी, तो बड़ा होकर मनुष्य सत्य की खोज कैसे करेगा? इस प्रकार गुलेरी के यहाँ बालमन केवल भावुकता का विषय नहीं, बल्कि ज्ञान और विवेक की पहली पाठशाला बन जाता है।
यही कारण है कि गुलेरी का साहित्य पाठक को केवल भावुक नहीं बनाता, बल्कि उसे सोचने के लिए भी विवश करता है। वे चाहते हैं कि मनुष्य प्रेम करना भी सीखे, प्रश्न करना भी सीखे और सत्य को स्वीकार करने का साहस भी रखे…
यदि इन तीनों रचनाओं को एक साथ रखकर देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि गुलेरी किसी एक विधा या विषय के लेखक नहीं हैं, बल्कि मनुष्य के संपूर्ण व्यक्तित्व के शिल्पी हैं। वे मनुष्य के हृदय, उसकी बुद्धि और उसके आचरण, तीनों को संस्कारित करना चाहते हैं। “उसने कहा था” में वे प्रेम को निःस्वार्थ त्याग की ऊँचाई तक ले जाते हैं; “बच्चा बच गया” में वे मनुष्य के भीतर के निष्कपट बालक को बचाए रखने का आग्रह करते हैं; और “घड़ी के पुर्ज़े” में उसी मनुष्य को यह साहस देते हैं कि वह श्रद्धा के साथ-साथ विवेक का भी सम्मान करे। गुलेरी की साहित्य-दृष्टि का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह है कि वे आदर्शों की स्थापना उपदेश देकर नहीं करते। वे कोई उपदेश नहीं देते, न ही नैतिकता का बोझ पाठक पर डालते हैं। वे केवल एक सैनिक, एक बालक और एक घड़ी का रूपक सामने रखते हैं, और इन्हीं साधारण प्रतीकों से असाधारण जीवन-दर्शन का निर्माण कर देते हैं। यही एक बड़े साहित्यकार की पहचान है कि वह सामान्य अनुभवों में भी सार्वकालिक सत्य खोज ले।
उनकी भाषा भी इस दृष्टि से विशिष्ट है। उसमें विद्वत्ता है, पर विद्वत्ता का अहंकार नहीं, व्यंग्य है, पर कटुता नहीं, करुणा है, पर भावुकता का अतिरेक नहीं। उनके शब्द पाठक को चमत्कृत करने के लिए नहीं, बल्कि उसके अंतर्मन को स्पर्श करने के लिए आते हैं। इसलिए उनकी रचनाएँ केवल पढ़ी नहीं जातीं, अनुभव की जाती हैं।
