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Category: विचार

विचार
भारतीय राजनीतिक आकाश के सूरज हैं गांधी

भारतीय राजनीतिक आकाश के सूरज हैं गांधी

अनिल तिवारी   आज भारतीय समाज के कुछ लोग इस गीत, "दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल" को लेकर गांधी पर निशाना साधते हैं। क्या गांधी

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मजदूर दिवस विशेष

मजदूर दिवस विशेष

फिर गुलामी जैसी स्थिति में फंसता जा रहा मजदूर ----- अनिल तिवारी ------- शोषण के खिलाफ लंबे अरसे से ओढ़ रखी चुप्पी तोड़कर कामगार जब एनसीआर की सड़कों पर बगावत का झंडा लेकर उतरे तो

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जीत का फार्मूला बन गई है मुफ्त की रेवड़ी ?

जीत का फार्मूला बन गई है मुफ्त की रेवड़ी ?

अनिल तिवारी ----------- देश में जब भी कोई चुनाव आता है तो आधी आबादी को और अधिक सशक्त करने का दावा करते हुए तरह-तरह की रेवड़िया बांटने का दौर शुरू हो जाता है। इस रेस

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शेर और शहर 

शेर और शहर 

गौरी तिवारी मानव सभ्यता का निरंतर विकास हुआ है, भले ही उसकी गति धीमी हो किंतु निरंतर विकासशील रही है। लेकिन इसी विकास की चकाचौंध में भागते लोग एक स्वार्थी और हिंसक शेर के समान

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धर्म और स्त्री

धर्म और स्त्री

वर्षा सिंह   धर्म का इस्तेमाल स्त्री के खिलाफ एक हथियार की तरह हुआ। धर्म में स्त्री को एक सामान्य मनुष्य की तरह नहीं बरता गया बल्कि उसके इर्दगिर्द बंधनों के बेड़े खींचे गए। जन्म

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अंबेडकर, गांधी, टैगोर और हिंदी

अंबेडकर, गांधी, टैगोर और हिंदी

(अंबेडकर जयंती पर विशेष) "पैरों में जूता भले ही ना हो लेकिन पास में किताब अवश्य होनी चाहिए।"   स्तालिन ने एक बार कहा था, "भाषा एक माध्यम है, औजार है जिसके जरिए एक-दूसरे का

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बुलावा आया तो सब सामान छोड़कर चली गई आशा ताई

बुलावा आया तो सब सामान छोड़कर चली गई आशा ताई

मद्धिम पड़ गई चांदी की चमक गौरी तिवारी -------- महान संगीतकार नौशाद ने एक साक्षात्कार में कहा था कि गायिकी में अगर लता मंगेशकर सोना हैं तो आशा भोसले चांदी। दोनों की अपनी-अपनी अहमियत है।

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देवी और श्रृंखला की कड़ियां

देवी और श्रृंखला की कड़ियां

गौरी तिवारी     मैं एक स्त्री हूं हां, हां , मैं एक साधारण मनुष्य हूं मत कहे ये समाज सम्मानित कर देवी ना ही गिरा दे आसमान से कह कर दानवी क्योंकि मैं भी

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विकास और विडम्बना

विकास और विडम्बना

गौरी तिवारी   बदलाव एक धीमी प्रक्रिया है किन्तु हर बदलाव अपने साथ विकास लेकर आता है। विकास शब्द सुनते ही हमारे मन में एक उजली, प्रगतिशील और उन्नत दुनिया की छवि उभरती है। ऊँची-ऊँची

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साधो, देखो जग बौराना!

साधो, देखो जग बौराना!

गौरी तिवारी   कितनी सुखद अनुभूति होती है , जब रात्रि के दूसरे पहर अपने घर की छत पर बैठकर श्वेत चांदनी की चादर ओढ़े चंद्रमा को देखते हैं या फिर टिमटिमाते सितारों के समूह